खोज एवं संवाद की संकल्पना - Discovery and Communication Concept

खोज एवं संवाद की संकल्पना - Discovery and Communication Concept


गांधी ने अपने सम्पूर्ण जीवन को सत्य के साथ प्रयोगों की संज्ञा दी। आधुनिक विश्व के इतिहास में संभवतः वे एकमात्र ऐसे विचारक है, जिन्होंने व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जीवन के दोनों क्षेत्रों में समान रूप से सत्य को कर्म की कसौटी माना। उनके लिए सत्य न तो पूर्ण रूप से अमूर्त है न ही मात्र भौतिक एवं तत्कालीन वस्तुस्थिति द्वारा परिसीमित । उनकी दृष्टि में सत्य एक स्तर पर शाश्वत जीवन मूल्यों का पर्याय है तथा दूसरे स्तर पर सामाजिक, सामयिक, वैयक्तिक और राजनीतिक सरकारों को समझने का अर्थपूर्ण माध्यम सत्याग्रह · आत्मानुभूति और संयोग की कला है। सत्याग्रही कभी प्रतिपक्षी को कष्ट नहीं देता, वह स्वयं कष्ट सहन करता है। सत्याग्रह का बल दुःख उठाने में है। दूसरों को कष्ट पहुँचाने से सत्य का उल्लंघन होता है। संदेह, शंका और अविश्वास उससे कोसों दूर है। धांधली, अधीरता और वाचालता उसके समीप नहीं फटकते। गांधी अक्सर डैनियल, सुकरात, प्रहलाद और मीरा का उदाहरण दिया करते थे,

जिन्होंने अपने विरोधियों के प्रति किसी प्रकार की दुर्भावना नहीं रखी। सत्याग्रह किसी एक पक्ष की विजय और दूसरे पक्ष की पराजय नहीं चाहता। उसका हेतु केवल एक ही है कि सत्य की विजय हो और असत्य विलीन हो जाए। समन्वीय ही सत्याग्रह का आशय है, ताकि दोनों पक्षों का एक सा कल्याण हो। परंतु गांधी अपनी सहूलियत के लिए सत्य को नापने का गज छोटा भी नहीं करना चाहते। इसमें किसी प्रकार की सौदेबाजी नहीं होती। सत्याग्रह में संख्या का महत्व नहीं, बल्कि गुणों का महत्व है। वह कहते थे कि सत्याग्रह की क्षमता सत्याग्रहियों की संख्या पर नहीं बल्कि उनके गुणों पर निर्भर करती है। संख्या, तो बुजदिल के लिए प्रसन्नता का विषय हो सकता है, शूरवीर, तो अकेला ही लड़ने में शूरवीरता पाता है। सत्य को स्पष्ट करते हुए गांधी ने उसे चेतना की ध्वनि कहा। सत्य की दृष्टि से, अन्तर्मन की स्वीकृति शाश्वत मूल्य के अनुसरण हेतु प्रेरित करती है। गांधी ने अनेक अवसरों पर ईश्वर को सर्वोच्च विधि एवं सर्वोच्च शक्ति के के रूप में परिभाषित किया। वस्तुतः ये नामकरण समयानुसार न्याय के ही प्रमाण है। गांधी के अनुसार व्यवहार में सापेक्ष सत्यों की उपलब्धि द्वारा शाश्वत पूर्ण सत्य की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है। सापेक्ष सत्य अर्थात सापेक्ष न्याय की प्राप्ति पूर्ण न्याय की ओर इंगित करती है।


गांधी ने जब सामाजिक कार्यकर्ता के साथ ही समाचार पत्रों का सम्पादन शुरू किया तो उन्होंने इसके लिए आदर्श निर्धारित किए थे। वे चाहते थे कि विश्वर की सभी पत्र-पत्रिकाएं इन आदर्शों को निभाकर निकले। उन्होंने कहा जब पत्र मालिकों को लगे कि उन आदर्शों को निभाना कठिन हो रहा है तो उन्हें पत्र-पत्रिकाएं बंद कर देना चाहिए। वे जिन बातों को पत्र-पत्रिकाओं के लिए अनिवार्य मानते थे, उनमे सबसे पहली बात तो यह है कि कोई भी पत्र-पत्रिका के सामने कोई उदात ध्येय होना चाहिए। केवल मनोरंजन या पैसा कमाने की दृष्टि से पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन अवांछनीय है। वे वाणी की स्वतंत्रता के पूरे पक्षपाती थे। साथ ही, आत्म संयम पर उनका बहुत अधिक जोर था। कोई ऐसी बात जिससे किसी भी प्रकार की शील, हानि होती हो, उनकी पत्रकारिता की परिधि में नहीं आती थी। पत्र-पत्रिकाएं देश के शासन से भी अधिक शक्तिशाली है, इसलिए उन्हें अपनी शक्ति का उपयोग बहुत ही सावधानी से करना चाहिए। गांधी ने पत्रकारिता के कुछ मानदंड रखे। उन्होंने लिखा- समाचार पत्र का एक उद्देश्य तो यह है कि वह जनता की भावनाओं को समझें और उसे अभिव्यक्त करे। दूसरा यह कि वह जनता में कुछ वांछनीय विचारों को जाग्रत करे और तीसरा यह कि जो आम दोष हो, उसका निर्भीकता से भंडाफोड़ करे।


प्लेटों एक आदर्शवादी विचारक था। उसने मानव जीवन को शिक्षा में बहुत अधिक महत्व दिया है। उसके अनुसार शिक्षा प्रथम तथा श्रेष्ठतम वस्तु है। जिसे सर्वोत्तम मनुष्य ही प्राप्त कर सकते हैं।'' प्लेटो ने समाज की उन्नति के लिए योग्य नागरिकों की परम आवश्यकता बताई है एवं उनके निर्माण के लिए शिक्षा को एक सर्वोत्तम साधन स्वीकार किया है। प्लेटो शिक्षा के द्वारा बालक का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक, चारित्रिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास करना चाहते हैं।


प्लेटो के समय राज्य प्रशासन में कुलीन तंत्र तथा व्यक्तिवाद का बोलबाला था। परन्तु अपने गुरू सुकरात की तरह से वह भी इस प्रकार की सामाजिक तथा राजनैतिक व्यवस्था का विरोधी था। वह समाज में प्रजातांत्रिक सामुदायिक और सहयोगी भावना का विकास करने का पक्षधर था। इस कार्य के लिए प्लेटो के द्वारा शिक्षा को सर्वोत्तम साधन के रूप में स्वीकार किया।

प्लेटो ने नागरिकों को उनके ज्ञान के आधार पर तीन वर्गों तृष्णा, संकल्प और विवेक में विभाजित करते हुए इन तीन वर्गों से एक दूसरे के साथ मिलकर राज्य में एकता स्थापित करने की अपेक्षा की थी। उसके अनुसार एकता बनाने के कार्य को शिक्षा के मध्यम से किया जाना चाहिए।


1. प्लेटो के अनुसार बालक में तर्कशक्ति तथा विवेक का विकास किया जाना चाहिए। तर्कशक्ति तथा विवेक प्रत्येक बालक में सुप्तावस्था में रहता है। जिसे शिक्षा द्वारा जाग्रत करके बढाया जाना चाहिए।


2. संतुलित व्यक्तित्व के निर्माण का उद्देश्य प्लेटो ने शिक्षा के द्वारा व्यक्ति में संतुलित व्यक्तित्व के निर्माण करने की बात कही है।

उसके अनुसार शरीर तथा मन, आदतजन्य तथा विवेकजन्य जीवन, वैयक्तिक एवं सामूहिक हितों में एकीकृत सम्पूर्ण बनाने के लिए व्यक्तित्व का संतुलित तथा सामंजस्यपूर्ण होना परमावश्यक है।"


3. स्व- शासित व्यक्ति के निर्माण का उद्देश्य प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो ने कहा है कि व्यक्ति ही अपने को सर्वोत्तम ढंग से व्यवस्थित कर सकते हैं इसलिए उसके अनुसार शिक्षा का एक उद्देश्य स्वशासित व्यक्तियों का निर्माण करना है। प्लेटो के अनुसार यदि हमारे नागरिक उचित ढंग से शिक्षित हैं तथा समझदार व्यक्तियों के समान विकसित होते हैं तो वे सरलता से अपनी राह बना सकते हैं।"


4. सामंजस्यपूर्ण जीवन व्यतीत की तैयारी का उद्देश्य -प्लेटो के अनुसार शिक्षा का एक उद्देश्य सामंजस्यपूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए तैयार करना भी है।

इसके लिए, विद्यालय में बालकों को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। प्लेटो के शब्दों में कहा जा सकता है कि, "सच्ची शिक्षा जो भी हो, मनुष्यों का एक दूसरे के साथ परस्पर संबंधों के साथ तथा मानवीय बनाने की प्रवृत्ति रखेगी।”


5. शाश्वत मूल्यों को अपनाने का उद्देश्य -प्लेटो के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य शाश्वत मूल्यों को अपनाने के लिए व्यक्तियों को तैयार करना होना चाहिए। प्लेटो शाश्वत मूल्यों को परमात्मा का गुण मानता था तथा उसके अनुसार परमात्मा से संबंध बनाने के लिए इन मूल्यों का साक्षात्कार बालक को अवश्य कराया जाना चाहिए। 


6. प्लेटो ने बालकों की योग्यताओं, रूचियों, प्रवृत्तियों के अनुरूप उन्हें शिक्षा देने की बात कही है। उसके अनुसार शिक्षण विधि को मनोरंजक होना चाहिए। छोटी कक्षाओं के लिए प्लेटो ने खेल विधि का प्रयोग करने पर बल दिया है। प्लेटो ने बालकों के समक्ष पाठ्यसामग्री के रोचक प्रस्तुतीकरण पर भी जोर दिया है। प्लेटो ने अपने गुरू सुकरात के द्वारा प्रस्तुत तर्क विधि को अपनाया है। बायड ने प्लेटो के तर्क का स्पष्टीकरण करते हुए लिखा है, ‘‘तर्क क्या है। शाब्दिक रूप से यह विचारवान व्यक्तियों का वाद-विवाद या तर्क युक्त स्पष्टीकरण है।"