कोषों के प्रवाह से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण मदों की विवेचना - Discuss the important items related to the flow of funds

कोषों के प्रवाह से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण मदों की विवेचना - Discuss the important items related to the flow of funds


(1) व्यवसाय के संचालन से लाभ या हानि (Profit or loss from business operations or Funds from operations) - कोष प्राप्ति का यह सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है। किसी व्यवसाय में होने वाली आय व्यावसायिक क्रियाओं एवं गैर-व्यावसायिक क्रियाओं दोनों से हो सकती है। व्यावसायिक कुशलता को स्पष्ट करने के लिए कोष प्रवाह विवरण में व्यावसायिक क्रियाओं से होने वाली आय को ही दर्शाया जाता है। व्यावसायिक क्रियाओं में मुख्यतः माल के क्रय-विक्रय या प्रमुख व्यावसायिक गतिविधियों से होने वाली आय (Funds or Profits from Business Operations) को ही सम्मिलित किया जाता है, जबकि गैर-व्यावसायिक आय में विनियोगों से प्राप्त ब्याज या लाभाश, सम्पत्ति के विक्रय पर लाभ, मकान-सम्पत्ति से प्राप्त किराया, आकस्मिक आय, आदि को शामिल किया जाता है। लाभ-हानि खाते द्वारा प्रदर्शित लाभ-हानि को कोष प्रवाह विवरण के लिए व्यवसाय संचालन का लाभ अथवा हानि नहीं माना जा सकता,

क्योंकि लाभ-हानि खाते में बहुत सी ऐसी मदें सम्मिलित होती हैं, जिनका व्यवसाय संचालन में कोई सम्बन्ध नहीं होता। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसी मदें भी सम्मिलित होती है जिनका कार्यशील पूँजी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः संचालन से कोष की गणना करते समय लाभ-हानि खाते द्वारा प्रदर्शित शुद्ध लाभ में कुछ समायोजन करने पड़ते है।


(2) अंश पूँजी में वृद्धि या कमी (Increase or Decrease in Share Capital) – दो तिथियों के बीच अंश पूँजी में परिवर्तन साधारणतः वृद्धि के रूप में ही होता है। हां पूर्वाधिकार अंश पूँजी की दशा में परिवर्तन कमी के रूप में भी हो सकता है, बशर्ते पूर्वाधिकारी अश शोधनीय रहे हो । अश पूँजी में वृद्धि को कोषों की प्राप्ति मानते हैं। अंश पूँजी में वृद्धि नये अशों के निर्गमन के कारण ही होती है।

अतः वृद्धि की रकम को अश निर्गमन के रूप में दर्शाते हैं। परन्तु यहाँ पर भी ध्यान में रखना चाहिए कि स्थायी सम्पत्तियों के क्रय के बदले में या ऋणपत्रों के शोधन के बदले में निर्गमित अंशों के कारण जो वृद्धि होगी, उसे कोषों की प्राप्ति नहीं मानेगें, परन्तु अंशों के निर्गमन द्वारा प्राप्त चालू सम्पत्तियों की रकम को कोष को स्त्रोत माना जाता है। यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है कि लेखांकन प्रमाप- 3 की नई शर्त के अनुसार, यदि अंशों के निर्गमन द्वारा स्थिर सम्पत्तियों को प्राप्त किया गया है तो कोष प्रवाह विवरण में ऐसे व्यवहार को स्त्रोत एवं प्रयोग दोनों पक्ष में दर्शायेंगे, जिसका शीर्शक कार्यशील पूँजी को प्रभावित न करने वाली वित्त प्रबन्ध एवं निवेशी क्रियाएँ (Financing and Investing Activities not affecting Wroking Capital) होगा। नवीनतम सूचना के अनुसार "दी इन्स्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट्स ऑफ इन्डिया, नई दिल्ली" द्वारा कार्यशील पूँजी के सम्बन्ध में प्रस्तावित संशोधित लेखाकन प्रमाप-3 को निरस्त कर दिया गया है। इसी प्रकार बोनस अंशो के निर्गमन से अंश पूँजी में हुई वृद्धि को भी कोषों का स्त्रोत नहीं माना जाता है।

जब इन अंशों का निर्गमन प्रीमियम पर हुआ हो, तो वृद्धि की रकम को प्रीमियम की रकम से बढ़ा देंगे। कम्पनीज (संशोधन) अधिनियम, 1999 के द्वारा धारा 80 में यह संशोधन किया गया है कि 'अंश प्रीमियम खाते (Share Premium A/c ) के स्थान पर प्रतिभूति प्रीमियम खाते (Security Premiou A/c) शब्दावली का प्रयोग किया गया है। इसीलिए प्रस्तुत अध्याय में प्रतिभूति प्रीमियम' (Security Premium) शब्दावली का ही प्रयोग किया गया है। अशो का निर्गमन छूट पर हुआ हो, तो वृद्धि की रकम को छूट की रकम से कम कर देंगे। पूर्वाधिकार अंश पूँजी में कमी को शोधन के रूप में फण्ड का प्रयोग मानते है, परन्तु शोधन नये अंशों या ऋणपत्रों के निर्गमन के रूप में हुआ है, तो उसे फण्ड प्रयोग में नहीं दिखलायेंगे । 


(3) दीर्घकालीन दायित्वों में वृद्धि या कमी - इसके अन्तर्गत ऋणपत्रों, दीर्घकालीन ऋणों, बन्धक ऋणों व दायित्वों में दो तिथियों के बीच हुए परिवर्तन को ज्ञात किया जाता है।

यदि यह परिवर्तन वृद्धि के रूप में है, तो उसे कोषों का स्त्रोत मानते हैं और यदि परिवर्तन कमी के रूप में है, तो उसे कोषों का प्रयोग मानते हैं। वृद्धि की दशा में यह मान लिया जाता है कि नये ऋणपत्रों का निर्गमन हुआ है या वित्तीय संस्थाओं से नये ऋण प्राप्त किये गये है। इसी प्रकार कमी की दशा में यह मान लिया जाता है कि या तो ऋणपत्रो का शोधन किया गया है अथवा ऋणों का भुगतान किया गया है। परन्तु वृद्धि या कमी को साधन या प्रयोग के रूप में दर्शाने से पहले यह देख लेना चाहिए कि इस प्रकार की वृद्धि या कमी गैर चालू मदों के बीच हुए लेन-देनों के कारण तो नहीं हुई है। यदि ऋणपत्रों का निर्गमन स्थायी सम्पत्ति के क्रय के बदले में किया गया है या ऋणपत्रों का शोधन अशो में परिवर्तन के रूप में किया गया है, तो इसके कारण होने वाली वृद्धि व कमी को फण्ड विवरण में बिल्कुल नहीं दर्शाया जायेगा। हाँ, यदि ऋणपत्रों का निर्गमन प्रीमियम पर हुआ है, तो वृद्धि की रकम में प्रीमियम को जोड़ देगें और यदि निर्गमन छूट पर हुआ है, तो वृद्धि की रकम में से छूट को घटा देंगे। दूसरी ओर, यदि ऋणपत्रों का शोधन प्रीमियम पर किया गया है, तो कमी की रकम को प्रीमियम की रकम से बढ़ा देंगे और यदि शौधन पर लाभ हुआ है अर्थात छूट पर शोधन किया गया है, तो कमी की रकम को लाभ की रकम से बढ़ा देगे।


(4) दीर्घकालीन विनियोगों में वृद्धि या कमी (Increase or Decrease in Long Term Investments) किसी भी व्यवसाय के द्वारा विनियोग चालू सम्पत्ति की तरह रखे जा सकते हैं। यदि व्यवसाय के पास उपलब्ध अतिरिक्त कोषों को थोड़े समय के लिए विक्रय-योग्य प्रतिभूतियों (Marketable Securities) में विनियोग किया जाता है तो इन्हें चालू सम्पत्ति माना जाता है और इसे कार्यशील पूँजी में परिवर्तनों की अनुसूची में दिखाया जाता है। अतः इनका क्रय-विक्रय व्यवसाय के कोष पर कोई प्रभाव नहीं डालता है। दूसरी और, यदि विनियोग स्थायी प्रकृति के है, जैसे- व्यापारिक विनियोग (Trade Investments) तो इन्हें गैर- चालू सम्पत्ति माना जाता है और इस कारण इनका क्रय-विक्रय व्यवसाय के कोषों को प्रभावित करता है। व्यापारिक विनियोगों का विक्रय चालू सम्पत्तियों का स्त्रोत माना जाता है एवं व्यापारिक विनियोगों का क्रय चालू सम्पत्तियों का प्रयोग माना जाता है। यदि दो चिट्ठों के अलावा भी कोई सूचना उपलब्ध है

तो विनियोगों से कोषों का प्रवाह ज्ञात करने के लिए अलग से एक विनियोग खाता तैयार करना चाहिए जिसमें वर्ष का प्रारम्भिक शेष डेबिट में तथा अन्तिम शेष क्रेडिट में लिखना चाहिए। इसके पश्चात् यदि वर्ष में प्राप्त लाभांश की राशि में कुछ भाग विनियोगों के अधिग्रहण से पूर्व की अवधि में लाभांश (Pre-acquisition Dividend) का हो (विनियोगों के लाभांश सहित क्रय की दशा में) तो इस राशि को विनियोग खाते में क्रेडिट किया जाना चाहिए। तत्पश्चात् विनियोग खाते का शेष वर्ष में क्रय अथवा विक्रय किए गए विनियोगों की राशि बतायेगा। जिसे कोष प्रवाह विवरण में उपयोग या स्त्रोत के रूप में दिखाया जायेगा। यदि वर्ष में बेचे गये विनियोगों की लागत सम्बन्धी सूचना दी गई है तो लागत व विक्रय मूल्य का अन्तर विक्रय पर लाभ या हानि होगी जिसे समायोजित लाभ-हानि खाते में स्थानान्तरित किया जायेगा जिससे कि संचालन के लाभों की सही जानकारी हो सके


(5) स्थायी सम्पत्तियों में वृद्धि या कमी ( Increase or Decrease in Fixed Assets) कोष प्रवाह विवरण में स्थायी सम्पत्तियों में वृद्धि को स्थायी सम्पत्तियों का क्रय तथा स्थायी सम्पत्तियों के विक्रय के रूप में माना जाता हैं।

स्थायी सम्पत्तियों का रोकड़ के बदले क्रय कोष का प्रयोग होता है तथा इनके विक्रय को कोषों का स्त्रोत कहा जाता है। यदि स्थायी सम्पत्तियों का क्रय अंशों अथवा ऋणपत्रों के निर्गमन के बदले किया गया है, तो उसे कोषों का प्रयोग नहीं माना जा सकता। स्थायी सम्पत्तियों का क्रय-विक्रय स्थायी सम्पत्ति खाता बनाकर ज्ञात किया जा सकता है। स्थायी सम्पत्ति खाता बनाकर ज्ञात किया जा सकता है। स्थायी सम्पत्ति का खाता अपलिखित मूल्य (Written-down value) पर तैयार कर सकते है अथवा मूल लागत पर मूल लागत पर स्थायी सम्पत्ति खाता तैयार किये जाने की दशा में अलग से एक ह्रास आयोजन खाता (Provision for Depreciation A/c या Accumulated Depreciation A/c ) भी तैयार किया जाता है।


ख्याति हेतु लेखांकन उपचार की विवेचना (Discussion of Accounting Treatment for Goodwill) -  जैसा कि हम जानते है कि ख्याति किसी भी व्यावसायिक उपक्रम की स्थिर सम्पत्ति होती है। इसके सम्बन्ध में सम्भावित विभिन्न स्थितिया एवं उनके लेखांकन उपचार की विवेचना निम्नलिखित है-


(अ) गत वर्ष के चिट्ठे में ख्याति का कोई शेष नहीं दिया हुआ है परन्तु चालू वर्ष के चिट्टे में ख्याति की रकम दी हुई है ऐसी दशा में यह देखेंगे की अतिरिक्त या पूरक सूचनाओं के अन्तर्गत ख्याति का क्रय किये जाने के सम्बन्ध में कोई सूचना दी हुई है या नहीं। यदि अतिरिक्त सूचनाओं में कोई जानकारी नहीं दी हुई है तो यह माना जायेगा कि ख्याति को रोकड़ के बदले क्रय किया गया है एवं ऐसी दशा में ख्याति की उक्त रकम को कोष प्रवाह विवरण के अन्तर्गत प्रयोग (applications) के रूप में दर्शायेंगे। इसके विपरीत यदि अतिरिक्त सूचनाओं में अशों या ऋणपत्रों के निर्गमन द्वारा स्थिर अथवा चालू या दोनों प्रकार की सम्पत्तियों को क्रय करने की बात कही गई है। और उसमें ख्याति की उतनी ही रकम दी हुई है जितनी चालू वर्ष के चिट्टे में लिखी हुई है अथवा निर्गमित किये जाने वाले अंशों के अंकित मूल्य एवं प्राप्त सम्पत्तियों के मूल्य के बीच उतना ही अन्तर है जितनी रकम चालू वर्ष के चिट्टे में ख्याति के रूप में लिखी हुई है, तो ऐसी दशा में कहीं पर कुछ नहीं करेगें क्योंकि इससे कोष (कार्यशील पूँजी) में कोई परिवर्तन नहीं होगा। इसका कारण यह है कि इससे एक तरफ स्थिर सम्पत्ति में वृद्धि हुई है तथा दूसरी तरफ दीर्घकालीन दायित्व में वृद्धि होगी।