दूरस्थ शिक्षा - distance education
दूरस्थ शिक्षा - distance education
संचार तकनीकी की सूचनाओं के आदान-प्रदान में विशिष्ट भूमिका है। निरन्तर उपग्रहों के बढ़ते हुए योगदान से आज समस्त विश्व एक छोटे से बॉक्स में सिमटा हुआ नजर आने लगा है, यही कारण है कि अब देश के किसी भी कोने में रहने वाले व्यक्ति के लिए शिक्षा का प्रबन्धन करना अत्यन्त सरल हो गया है सामान्य रूप से शिक्षक से दूर रहकर किसी भी छात्र का अन्य साधनों से प्राप्त होने वाली शिक्षा ही दूरस्थ शिक्षा है बोर्ग होमबर्ग के अनुसार- 'दूरस्थ शिक्षा का अर्थ कुछ अपवादों को छोड़कर ऐसी शिक्षा से है, जिसमें छात्र और अध्यापक भौतिक रूप से अलग-अलग स्थान पर रहते हैं और जिसमें शिक्षण कार्य मुद्रित सामग्री तथा यांत्रिक प्रविधियों एवं विभिन्न विद्युत यन्त्रों के माध्यम से किया जाता है। विश्व के अधिकांश विकासशील देशों में दूरस्थ शिक्षा उसके उच्च स्तर पर अत्यधिक विकसित हुई है ।
मास्को व लेनिनग्राद में पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से तकनीकी व अभियांत्रिकी की विभिन्न शाखाओं में विशिष्ट शिक्षा दी जाती है, वहाँ पर आफ कैम्पस स्टेडी सेन्टर एवं परामर्श केन्द्र कार्यरत हैं जो पत्राचार पाठ्यक्रम वाली संस्थाओं के विद्यार्थियों के लिए व्यक्तिगत सम्पर्क कार्यक्रम और प्रयोगात्मक कार्य में सहायता देती हैं। 21 वीं सदी में प्रवेश करते हुए इस विश्व में संचार साधनों के बढ़ते प्रयोग के कारण अब दूरस्थ शिक्षा संस्थाओं में निरन्तर वृद्धि हो रही है।
दूरस्थ शिक्षा की आवश्यकता अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे तीव्रगामी वैज्ञानिक, तकनीकी व यांत्रिकी तथा अन्य क्षेत्रों में विकास के लिए समरूप शिक्षा प्रदान करने अथवा छात्रों व व्यक्तियों को वांछित योग्यता व ज्ञान देने के लिए है।
दूरदराज के क्षेत्रों में जहाँ शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध नहीं है वहाँ तक शिक्षा पहुँचाने तथा कार्यरत व्यक्तियों व महिलाओं के लिए सुविधाजनक समय में शिक्षा उपलब्ध करवाने में तथा उनके कौशल वर्धन में सहायता प्रदान करता है। अध्यापक व छात्र के मध्य की दूरी भी आधुनिक संचार माध्यमों से दूर की जा सकती है। भारत एक प्रजातांत्रिक तथा घनी आबादी का देश है, अतः इसकी सफलता के लिए दूरस्थ शिक्षा ही एक विकल्प हैं । यह शिक्षा अत्यन्त मितव्ययी व गुणात्मक दृष्टि से भी स्वीकार्य है। सीमित साधनों व सीमित योग्य शिक्षकों के कारण आज दूरस्थ शिक्षा आवश्यक हो गई है। इसमें विद्यार्थी अपनी योग्यता तथा इच्छानुसार शिक्षा व ज्ञान में प्रगति कर सकता है। यह पद्धति निजी अध्यापन पर आधारित है क्योंकि छात्र संस्था के रूप में अध्ययन नहीं करते।
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