शिक्षा और समाज - education and society

शिक्षा और समाज - education and society

शिक्षा के सामाजिक उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए हम यह पाते है कि शिक्षा की सामाजिक अवधारणा समाज के हर सदस्य पर लागू होती है। सामाजिक उद्देश्यों को जब ध्यान में रखा जाए तब शिक्षा मूलभूत होती है, तब वह उन मानवीय गुणों को निखारने में जिससे समाज एक सौहार्दपूर्ण वातावरण में उन्नति करें, सहायक होती है। शिक्षा तब अहिंसा, विश्वशांति, दया व सामाजिक न्याय जैसे गुणों पर आधारित होती है।


शिक्षा के सामाजिक संदर्भ को जर्मनी के महान दार्शनिक हीगल की कृतियों से प्रभावित जर्मनी की शैक्षिक व्यवस्था में भी देखा जा सकता है कि किस प्रकार दार्शनिक विचारों ने जर्मनी की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित व परिभाषित किया। उक्त समय में हीगल के अनुसार निज व्यक्तिगतता सत्य नहीं बल्कि राज्य ही एक व्यक्ति है।

राज्य का हर सदस्य अस्तित्ववान है राज्य की उद्देश्य की पूर्ति करने के लिए। हींगल की यह सोच जब पाठ्यक्रम में आई तब जर्मनी में राज्यवाद व सैन्योमुखीकरण का उद्भव हुआ व शिक्षा का मुख्य लक्ष्य हो गया, राष्ट्रवादी सैनिक बनाना जिनका जीवन राज्य के लिए होगा, इस प्रकार हम देखते है कि समाज में चल रही विचारधारा भी शैक्षिक उद्देश्य को निर्धारित करती है।


इस तरह से देखा जाए तो शिक्षा की सामाजिक संकल्पना में यदि व्यक्तिगतता का अतिरेक हो तो उसे सामाजिक स्वीकृति मिलने में मुश्किल होती है और जब निज सत्ता को सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती है तब समाज की सोच में विभिन्नता और वैयक्तिक स्वायतन्ता में कमी आ जाती है। सामाजिक शिक्षा पर चिंतन हमेशा से ही इन दो चरम छोर के मध्य सामंजस्य स्थापित करना रहा है। इन दो उद्धेश्यों का सामंजस्य हमेशा समाज की मुख्यधारा व सोचने समझने के तरीके पर आधारित होता है।

ऐसे में व्यक्तिगत व सामाजिक शैक्षिक उद्धेश्यों के मानदण्ड को हम इनके मूलस्वरूप व अवधारणा पर चिंतन कर के ही समझ सकते हैं। सामाजिक सदस्यता की संकल्पना के साथ व्यक्तित्व विकास को हम निम्नलिखित रूप में समझ सकते हैं


• मानसिक, शारीरिक गुणों व कौशलों का विकास।


• सामाजिक साझेदारी व नैतिक मूल्यों का विकास जैसे- सत्य, अहिंसा, अस्तेय, सहयोग इत्यादि ।


• आध्यात्मिक व्यक्तित्व का विकास। यहां आध्यात्मिक अस्तित्व का अर्थ धार्मिक या दार्शनिक होकर ऐसी सत्ता होना है, जिसका अपने स्व' व 'स्वरूप' पर पूर्ण अधिकार हो।


• शिक्षा से सामाजिक उद्देश्य, पूर्ति से आशय यह होता है कि


• व्यक्ति द्वारा अपने दायित्वों व कर्तव्यों का निर्वाहन।


• व्यावसायिक कार्य क्षमता व मानवीयता के साथ व्यक्ति का समाज से जुड़ाव।


• सामाजिक नेतृत्व ऐसे समाज कल्याण की भावना के साथ, जिसमें व्यक्ति समाज के साथ खुद को किसी अवपीड़न की भावना के बिना जुड़ा महसूस करें। 

इस तरह से देखा जाए तो व्यक्ति में समाज व समाज में व्यक्ति निहित है व दोनों परस्पर बिना अन्तरविरोध के एक दूसरे के सहायक बन विकास की ओर अग्रसर हो, ऐसी सुचारू व्यवस्था ही सामाजिक शिक्षा का क्षेत्र होती है।