शिक्षा और मूल्य: मूल्यों की प्रकृति और उनके स्रोत - Education and Values: Nature of Values and Their Sources
शिक्षा और मूल्य: मूल्यों की प्रकृति और उनके स्रोत - Education and Values: Nature of Values and Their Sources
मूल्य का विचार मानव को स्वतः उस जीवन दृष्टि की और ले जाता है जिसमें जीवन के महत्व पर विचार किया जाता है, इसमें व्यक्ति और समाज के लिए क्या कल्याणकारी है इसेपारिभाषित करना तथाउसके कार्य व्यवहारों के आधार पर मूल्य के स्वरूप को स्पष्ट करने का प्रयास किया जाता है।
प्रोफेसर अर्बन ने अपनी पुस्तक फण्डामेण्टल ऑफ एथिक्स में लिखा है कि "मूल्य वह है जो मानव इच्छा की तृप्ति करें एवं व्यक्ति तथा उसकी जाति के संरक्षण में सहायक हो।" अंत में वे कहते हैं कि केवल वही परम रूप से और साध्य रूप से मूल्यवान है जो आत्मा के विकास या आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाए। इस परिभाषा में मानव की जैविक से लेकर आध्यात्मिक तक सभी आवश्यकताओं का समावेश हो जाता है जिनका मानव जीवन के लिए महत्व है एवं जिसे पाने के लिए व्यक्ति प्रयास करता है तथा बड़े से बड़े त्याग करने के लिए तैयार रहता है।
इस प्रकार मूल्य वह सत्य है जिसके लिए व्यक्ति जीता है और आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष करने, दुःख सहने व मृत्यु को भी स्वीकार करने के लिए तत्पर रहता है। मूल्य परिवर्तनशील समाज की वह धुरी है जिसके कारण समाज कीवस्तुतः उपयोगिता अथवा कल्याणकारिता की भावना को गति मिलती है।
"मूल्य ऐसी आचरण संहिता या सद्गुण है जिससे व्यक्ति अपने निश्चित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु अपनी जीवन पद्धति का निर्माण करता है तथा अपने व्यक्तित्व का विकास करता है।" इसमें मनुष्य की धारणाएँ विचार, विश्वास, मनोवृत्तिआदि समाहित है। ये मानव मूल्य एक और व्यक्ति के अंतः करण द्वारा नियंत्रित होते हैं तो दूसरी और उसकी संस्कृति एवं परंपरा द्वारा क्रमाः विकसितएवं परिपोषित होते हैं।
यह भी कहा जा सकता है कि मूल्य मनुष्य के अंतरतम में जगती हुईएक ऐसी प्रेरणा है जो उसे एक विशिष्ट प्रकार से कर्म करने के लिए प्रेरित करती है और उसके आचरण को शासित भी करती है।
जीवन के मूल्यों को स्थूल रूप से दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है परिवर्तनशील मूल्य तथा शाश्वत मूल्य सामान्यतः देखें तो मूल्य कई प्रकार के होते हैं, जैसे-जैविक मूल्य, सामाजिक मूल्य और आध्यात्मिक मूल्य।
समय के साथ मूल्यों में भी परिवर्तन आ रहे हैं। उदाहरण के लिए यदिकलयुग के जीवन मूल्यों से हम प्राचीन मूल्यों सतयुरात्रेला, द्वापर आदि की तुलना करें तो काफी अंतर प्रतीत होगा। प्राचीन समय से देखें तो जो जीवन मूल्य सतयुग में सेने त्रेता में नहीं थे, जो त्रेता में थे वे द्वापर में नहीं थे तथा जो द्वापर में थे वे कलयुग में पूर्णतः समाप्त हो चुके हैं।
कलयुग में हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन में तनाब के कारण दिन-प्रतिदिन घुटन बढ़ती जा रही है। परिवार में छोटे बड़ों का आदर नहीं करते हैं। सामाजिक जीवन में सहयोग समाप्त हो रहा है। सामाजिक नियम व व्यवस्थाओं का उल्लंघन करते हुए हम संकोच नहीं करते हैं प्रदर्शन, घेराव, तोड़-फोड़, हिसांत्मक विद्रोह एवं आतंक हमारे जीवन में हर समय तनाब या भय पैदा करते रहते हैं। भ्रष्टाचार काला बाजारी, रिश्वतखोरी, तश्करी, मिलावट, कालाधनआदि से संबंधित गतिविधियाँ हमें दिन-प्रतिदिन व्याकुल करती रहती हैं। वर्तमान समय में मूल्य इतने गिर गए हैं कि जीने का अर्थ ही बदल गया है। हर काम में स्वार्थ भरा पड़ा है।
समाज में कल्याणकारी सामंजस्य स्थिति उत्पन्न करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को सत्य, अहिंसा आदि शाश्वत मूल्यों का पालन करना चाहिए। आज के समाज में सर्वमान्य मूल्य जसेसमानता, अस्पृश्यता निवारण धर्मनिरपेक्षता आदि के अंतर्गत उन्हीं शाश्वत मूल्यों की रक्षा की जा रही है जिसके अनुसार प्राणी मात्र को प्रभु की संतान के रूप में स्वीकार करते हुए किसी भी प्रकार का कष्ट देना उचित नहीं समझा जाता। इससे स्पष्ट है कि युग मूल्य वस्तुतः शाश्वत मूल्यों से ही उत्पन्न हुए हैं।
वार्तालाप में शामिल हों