शिक्षा प्रणाली - education system
शिक्षा प्रणाली - education system
1) उपनयन (Initiation) :
वैदिक काल में शिक्षा प्रारम्भ करने से पूर्व में कुछ संस्कार किये जाते थे जिस उपनयन संस्कार कहा जाता था। उपनयन का अर्थ समीप ले जाना अर्थात बालक की शिक्षा की प्राप्ति के लिए समीप ले जाना। उपनयन एक संस्कार है जा विद्यार्थियों की उम्र के पाँचव या छठवं वर्ष में किया जाता था। इस संस्कार में शिष्य आश्रम के लिए उपयुक्त इंधन लेकर विनम्र भाव से गुरु के पास जाते थे। इस समय बालक के जन्म व कुल की जानकारी देना आवश्यक होता था। बालक को शिष्य के रूप में स्वीकार अथवा अस्वीकार करना गुरु की इच्छा पर निर्भर था। गुरु शिष्य को प्राथमिक उपदेश देते थे। तदनन्तर उसकी औपचारिक शिक्षा का प्रारम्भ होता था।
2) गुरुकुल पद्धति (Gurukul system):
उपनयन संस्कार उपरान्त बालक की औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ हो जाती थी इसके लिए उसे गुरु के आश्रम में ही रहना होता था। गुरु के आश्रम रहकर जा शैक्षणिक संस्कार किए जाते थे उसे गुरुकुल शिक्षण पद्धति कहते हैं।
वैदिक काल में छपाई कला का विकास न होने के कारण पुस्तक भी उपलब्ध नहीं थी इसलिये गुरु प्रदत्त ज्ञान हो विद्यार्थी सौखते थे। उस काल में पाठांतर पर अधिक जोर दिया जाता था। शिष्य गुरु के घर-परिवार में रहकर उनको सेवा करते हुए शिक्षा ग्रहण करते थे।
(3) शिक्षा का विभाजन:
वैदिक युग में शिक्षा प्राथमिक व उच्च भागा में विभाजित थी। ५/६ वर्ष की प्राथमिक शिक्षा गुरु के आश्रम में रहकर प्राप्त की जाती थी। उच्च शिक्षा के लिए संस्थाएँ उपलब्ध थीं।
गुरुकुल पद्धति में विद्यार्थियों का अध्ययन एवं दिनचर्या ब्राम्हमुहूर्त में जागरण से रात्रि में शयन पर्यन्त जारी रहते थे। गुरुकुल में सभी विद्यार्थियों से एक समान व्यवहार किया जाता था।
विद्यार्थियों को वन में जाकर लकड़ी लाना, भिक्षा प्राप्त करना, सामूहिक व व्यक्तिगत कार्यक्रम में सहभागिता करना आदि कार्य करना अपेक्षित था गुरुकुल में बालिकाओं का प्रवेश वर्जित था।
शिक्षा प्राप्ति के उपरान्त विद्यार्थी स्वच्छा से गुरु का दक्षिणा दत थे जिस गुरुदक्षिणा कहा जाता था।
4) पाठ्यक्रम (curriculum ) :
पाठ्य विषयों में दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष, तर्क, विज्ञान, कल्प व चंद आदि का महत्व दिया जाता था। दोनों प्रकार की विद्याओं को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाता था। वैदिक कालखंड में अध्ययन का प्रारम्भ करते समय वेद यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) से परिचित होना आवश्यक था।
ऋग्वेद वेदों में सर्वाधिक प्राचीन वद है। यह ऋचाओं व स्तृति मंत्रा का संकलन है जिसमें विभिन्न देवताओं की स्तुतियाँ है। यजुर्वेद का उपवद है सामवेद जो संगीतमय बंद है। गंधर्ववेद सामवेद का उपवेद जिसके अंतर्गत गायन, वादन एवं नृत्य का विस्तृत वर्णन किया गया है। अथर्ववेद की रचना चारा वदां में सबसे बाद में हुई। इसमें सामान्य भौतिकवादी विषया में गूढ दार्शनिक विषयों का सम्मिलित किया गया है। अर्थशास्त्र अधर्वबंद का उपवेद है। इस ग्रंथ में राजनीति राज्यों के प्रकार, संधि एवं युद्ध आदि की विस्तृत विवेचना की गई है।
5) अध्यापन पद्धति (Methods of Teaching):
वैदिक काल में अध्ययन-अध्यापन पद्धति में पठन पाठन करना, वादविवाद व चर्चा में सहभागिता करना, आलाचना व विचार, स्मृतिगत करना इत्यादि अध्ययन अध्यापन पद्धतियों का प्रयोग किया जाता था।
6) परीक्षा प्रणाली (Examination System):
वैदिक काल में परीक्षा प्रणाली नहीं थी। परीक्षा प्रतिदिन ली जाती थी। पाठ पढ़ाने से पूर्व मौखिक परीक्षा ली जाती थी। गुरुदद्वारा छात्रा की शिक्षा का मूल्यांकन उनके दैनिक कार्य के आधार पर किया जाता था। परीक्षा पद्धति में मंत्र और वेदों की ऋचाओं का पूर्ण करने का कहा जाता था।
(7) अनुशासन (Discipline):
वैदिक काल में छात्र आत्म अनुशासित थे। वैदिक काल में गुरु एवं शिष्य का संबंध अत्यन्त उदार था। गुरु द्वारा शिष्य को दण्ड उसके आत्म सुधार या अन्तकरण की शुद्धता के लिए ही दिया जाता था।
8) स्त्री शिक्षा (Woman Education) :
वैदिक काल में स्त्री शिक्षा के दो वे पूर्ववैदिक काल एवं उत्तर वैदिक काल पूर्व वैदिक काल में स्त्रिया का शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार था परंतु उत्तर वैदिक काल में भारत पर विदेशी आक्रमणा के कारण स्त्रिया को शिक्षा का अधिकार समाप्त कर दिया गया और विवाह के लिए न्यूनतम आयु घटाकर कम कर दो गई। यहाँ से बालविवाह की प्रथा शुरु हो गई। उनमें से कई उच्च कुलीन स्त्रियों ने शिवा प्राप्त की। अपाला रामसा श्रद्धा इडा सरस्वती इन्द्राणी, भाषा, गार्गी, मैत्रयों आदि विदुषी स्त्रियां ने उच्च शिक्षा प्राप्त की।
9) व्यावसायिक शिक्षा (vocational Education):
वैदिक काल में धार्मिक और आध्यात्मिक शिक्षा के साथ साथ व्यावसायिक शिक्षा को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था। व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत सैनिक
शिक्षा, चिकित्साशास्त्र को शिवा, वाणिज्य शिक्षा आदि का समावेश था।
10 ) गुरु शिष्य संबंध ( Teacher Student Relationship):
वैदिक काल में गुरुशिष्य के संबंध अत्यंत गंभीर एवं मनिष्ठ थे। शिष्य के लिए गुरु आध्यात्मिक पिता के रूप में माना जाता था। विद्यार्थी गुरु के प्रति अत्यन्त श्रद्धा व संवाभाव रखते थे। गुरु की आज्ञा का पालन उनको सवा, उनका दैनिक कार्यों में सहायता व्यवस्था उनके लिए भाजन करना आदि छात्रा के प्रमुख कर्तव्य थे। गुरु का प्रमुख कर्तव्य छात्रा का शिक्षा करना तथा उनके नैतिक, शारीरिक, बौद्धिक चारित्रिक व सामाजिक विकास में सहायता प्रदान करना था। गुरु शिष्य के प्रति पुत्रवत स्नेह रखते थे। अध्यापन के साथ-साथ वे छात्रा के वस्त्र व भोजन तथा चिकित्सा आदि का प्रबंध भी करते थे।
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