पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण परिवर्तन के लिये शिक्षा - Education to change attitude towards environment

पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण परिवर्तन के लिये शिक्षा - Education to change attitude towards environment


प्रकृति ने प्राकृतिक संसाधन जैसे वायु, जल, भूमि, खनिज पदार्थ और पेड़-पौधे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराये हैं परन्तु इस उपलब्धता की भी अपनी एक सीमा है। जनसंख्या बृद्धि, औद्योगीकरण तथा विकास योजनाओं के फलस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अत्यन्त तीव्रता से हो रहा है प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन, अपव्ययपूर्ण उपयोग तथा अविवेकपूर्ण पर्यावरण उपेक्षा के कारण पर्यावरण समस्याएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। प्रकृति की स्व नियामक क्षमता क्षीण हो रही है जिसके कारण मानव जीवन की गुणवत्ता का ह्रास हो रहा है। पर्यावरण समस्याओं की गंभीरता के फलस्वरूप सभ्य समाज में एक नवीन चेतना जागृत हो रही है तथा पर्यावरण संरक्षण तथा उसमें सुधार की आवश्यकता की ओर जनसामान्य का ध्यान अब आकर्षित हो रहा है।

परन्तु फिर भी पर्यावरण की रक्षा तथा उसमें सुधार की आवश्यकता के प्रति लोगों को जागरूक बनाना आवश्यक है। पर्यावरण की समस्याओं के निराकरण तथा पर्यावरण सुधार की योजनाओं के क्रियान्वयन के लिये अपेक्षित जन सहयोग प्राप्ता करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है।


जनजीवन पर प्रदूषण के कारण होने वाले प्रभाव की जानकारी को शिक्षा के माध्यम से जनसाधारण तक पहुँचाया जा सकता है। स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, स्वच्छ भूमि के महत्व पर शिक्षा संस्थाओं में जोर दिया जा सकता है। वास्तव में जनसाधारण में पर्यावरण के प्रति जागरूकता को उत्पन्न करने की तीव्र आवश्यकता है। इसके लिये पर्यावरण बोध को सम्पूर्ण शिक्षा प्रक्रिया के एक अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार करना उचित होगा।


आज पर्यावरण समस्याएँ अपना विकराल रूप धारण कर रही हैं। पर्यावरण सुरक्षा एवं संवर्धन के लिये लोगों को संवेदनशील होना होगा। आज जब जंगली जीवन का विनाश हो रहा है, मनुष्य मनुष्य के खून का प्यासा है, प्रकृति का अंधाधुंध शोषण किया जा रहा है तो ऐसे में मनुष्य को इस प्रश्नन का हल निकालना होगा कि उसे क्याह करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये। इस हल की आवश्यकता हमें महसूस करनी होगी पशु-वध पाप है, हरे-भरे पेड़ों को काटना पाप है, किसी भी जीव को सताना पाप है। पाप और पुण्यो की सीमा रेखाओं को समझे बिना हम पर्यावरण के सत्य को नहीं समझ सकते।


सन 1976 में भारतीय संविधान के 52 वें संशोधन में यह व्यवस्था की गई कि 'राज्य पर्यावरण के संरक्षण एवं संवर्धन का प्रयास करेगा और साथ ही वनों एवं वन्य जीवन की सुरक्षा की व्यवस्था भी करेगा'। इस संशोधन के साथ यह भी जोड़ा गया कि प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य होगा कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा एवं संवर्धन करे। परन्तु केवल कानून बनाने से क्या होता है

जब तक उसका पालन करने वालों की भावनायें सही न हों। कोई भी कानून तब तक सफल नहीं होगा जब तक लोग उसे मन से न अपनायें। मन से अपनाने का तात्पर्य है कि लोगों का मानसिक पर्यावरण ठीक हो प्राकृतिक और मानसिक पर्यावरणों के मिलने से ही सच्ची सुरक्षा और संवर्धन की बातें सम्भव हो सकती हैं, अन्यथा नहीं।


पर्यावरण के सरंक्षण व सुधार के लिये सरकारी मशीनरी के सभी महत्वपूर्ण प्रयासों के अलावा शिक्षा एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन है। नागरिकों को पर्यावरणीय ज्ञान एवं समझ देने में शिक्षा से बेहतर उपादान कोई नहीं है। शिक्षा नागरिको को प्रशिक्षित करती है जिससे वह समझ सके कि वह इस सृष्टि का एक अभिन्न भाग है, और उसका निरन्तर अस्तित्व इस बात पर निर्भर है कि सृष्टि का यह शाश्वित चक्र बना रहे।


पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने वाले कार्यक्रमों से लोगों को पर्यावरण के सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्षों के प्रति संवेदनशील बनाना मुख्य ध्येय है। हमारे देश के अधिकांश पढ़े-लिखे लोग भी पर्यावरण को अच्छी तरह नहीं समझते हैं। यह खेद का विषय है कि इन अभिन्न व्यक्तियों में डॉक्टर, शिक्षक, वकील, , उद्योगपति, उद्यमी, प्रशासक एवं इंजीनियर भी शामिल हैं।