शिक्षा के उद्देश्य , किण्डरगार्टन - Educational Objectives, Kindergarten

शिक्षा के उद्देश्य , किण्डरगार्टन - Educational Objectives, Kindergarten


जीवन की पूर्णता संस्कृति की पूर्णताबहु मुखी विकास एवं जीवनप्रकृति के सभी अंगों में व्याप्त सामंजस्य का बोध करवाना ही शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है। इनके द्वारा प्रकृति, ईश्वर तथा एकता के भाव का विस्तार होता है। सर्वश्वरवादी होने के नाते फोबेल का विश्वास है कि ईश्वर सभी में व्याप्त है। अतः इस एकता का ज्ञान करवाना ही शिक्षा का उद्देश्य हो सकता है। उपर्युक्त उद्देश्य का दूसरा पक्ष है बालक में संकल्प शक्ति (Will Power) का विकास करना। संकल्प शक्ति चारित्रिक गठन का आधार है। इसलिए सम्पूर्ण पाठशालीय शिक्षा का उद्देश्य तो संकल्प शक्ति का विकास होना चाहिए। संकल्प शक्ति और बालक की अंतःप्रकृति का संबंध समझना होगा।  चरित्र-निर्माण का उद्देश्य फ्रोबेल का भी था और हरबार्ट का भी। किंतु दोनों की दार्शनिक पृष्ठभूमि भिन्नभिन्न थी।


किण्डरगार्टन (Kindergartner) 


फोबेल ने किण्डरगार्टन शब्द का अभिप्राय बच्चों की फुलवारी से लिया है,

जिसमें बच्चों का वही स्थान है जो फुलवारी में पौधों का है। बालक के सम-विकास के सिद्धांत में विश्वास करने के कारण फोबेल ने बालक के जीवन के आरंभिक वर्षों को बड़ा महत्व दिया है। वह बालक की पौधों से तुलना करते हैं। उनका कथन है कि बीज में छिपी हुई शक्ति के आधार पर ही उसमें पत्तियाँ व शाखाएँ किल आती है। इसी प्रकार बालक भी अपने अंदर छिपी हुई प्रवृत्तियों व भावनाओं के आधार पर विकसित होता है।


फोबेल का विश्वास था कि बच्चों को अपनी आंतरिक शक्तियों को विकसित करने को पूरी स्वतंत्रता देनी चाहिए जिससे कि उन शक्तियाँ में अधिक से अधिक अभिबृद्धि हो सके। किण्डरगार्टन के अंदर यही सिद्धांत निहित था। इस दृष्टि से सफलतापूर्वक अपना कार्य करने के लिए शिक्षक को बालक की आंतरिक प्रवृत्तियों तथा रुचियों से पूर्णतया परिचित होना चाहिए। उसे चाहिए कि वह बच्चों को आत्मक्रिया के लिए प्रेरित करे। इस प्रकार ज्ञान लक्ष्य न होकर बालकों के विकास का साधन बन जाएगा। बालक को स्कूल के कार्यों में आत्म-निर्भरता की शिक्षा भी देनी चाहिए। उसे ऐसा प्रतीत होना चाहिए कि वह भी एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है। जब वह स्वयं काम करेगा तो उसमें यह भावना अपने आप आ आएगी और इस प्रकार उसे अपनी आंतरिक प्रवृत्तियों को मूर्त रूप देने में भी सहायता मिलेगी। अतएव उसे क्रिया द्वारा शिक्षा मिलनी चाहिए।


बाल्यावस्था खेल के लिए है न कि काम के लिए। फोबेल कहते हैं कि खेल बाल विकास की उच्चतम स्थिति है क्योंकि वह आत्म के स्वाभाविक अभिव्यक्ति एवं आंतरिक आवश्यकताओं व भावनाओं को व्यक्त करने का साधन है। इस आयु में मनुष्य की शुद्धतम व आध्यात्मिक क्रिया खेल मानी जा सकती है। अतः इससे हर्ष, आनंद, स्वच्छंदता, संतोष, सुख तथा संसार में शांति मिलती है