मॉरिया मॉण्टेसरी के शिक्षा सिद्धांत - Educational Principles of Montessori
मॉरिया मॉण्टेसरी के शिक्षा सिद्धांत - Educational Principles of Montessori
मॉण्टेसरी रूसो के प्रकृतिवाद से प्रभावित थी, और पेस्टालॉजी के मनोविज्ञान के प्रति भी उनका आकर्षण था इसलिए उन्हाने पेस्टालॉजी के काम को आगे बढ़ाया, और शिक्षण पद्धति को नवीन मनोविज्ञान पर आधारित किया। मॉण्टेसरी के शिक्षा सिद्धातों का नीचे संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है :
1. खेल द्वारा शिक्षा
यह पहले ही कहा जा चुका है कि मॉण्टेसरी के अनुसार शिक्षा शिक्षार्थी की प्रकृति के अनुकूल होनी चाहिए। शिक्षार्थी की रुचि खेल में स्वभाव से ही होती है। बालक की सबसे प्रिय वस्तु खेल है। अतः प्रारंभ में खेल द्वारा ही शिक्षा देना ठीक है। शिक्षार्थी को शैक्षिक यत्र दे दिए जाए तो वह उनसे खेलने लगेगा। शिक्षार्थी के खेल में किसी प्रकार का हस्तक्षेप करना ठीक नहीं है। शिक्षार्थी यंत्रों से खेलता रहता है, और खेल में ही वह वर्णमाला, गणित आदि विषय सीखता है। इन उपकरणों की सहायता से उसकी जानेंद्रियाँ भी विकसित होती है।
2. व्यक्तिगत आधार द्वारा शिक्षा
मॉण्टसरी व्यक्ति की शिक्षा का उद्देश्य बताती है। अतः वह शिक्षा को व्यक्तिगत आधार देना चाहती हैं। प्रत्येक शिक्षार्थी को उसके स्वभाव के अनुसार शिक्षा देनी चाहिए। अतः समूह की शिक्षा देने से काम नहीं चलेगा। कुछ पाठ ऐसे अवश्य होते हैं जिनका सामूहिक शिक्षण लाभप्रद हो सकता है। सामूहिकता की भावना के उदय के लिए ऐसे पाठों का सामूहिक शिक्षण किया जा सकता है। ऐसे समय में भी व्यक्तिगत ध्यान की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।
3. तार्किक अनुशासन का सिद्धांत:
यदि शिक्षार्थी को स्वतंत्रता दी जाए और उन्हें आत्म-रक्षा के लिए प्रेरित किया जाए, तो उनमें अनुशासनहीनता का प्रश्न ही नहीं उठेगा। अनुशासन बाहर से नहीं लाया जा सकता है। यह तो अंतः प्रेरणा की वस्तु है। अतः छात्रों में उत्तरदायित्व की भावना भरनी चाहिए जिससे वे अनुशासन के प्रति सजग हो जाएँ। बालक स्वयं ही अनुशासन स्थापित कर लेंगे। ऐसा अनुशासन तर्क पर आधारित होने के कारण अच्छा रहेगा।
4. उपयुक्त वातावरण:
अपेक्षित विकास के लिए शिक्षाप्रद बातावरण बहु तआवश्यक है। मॉण्टेसरी ने बाल गृहों को वास्तविक विद्यालय बताया है क्योंकि वहा पर शिक्षार्थी संरचनात्मक कार्यो में जुटे रहते हैं और संरचनात्मक कार्यों में आनंद लेते हुएवे बहु तम्सी बातें सीख जाते हैं। मॉण्टेसरी विद्यालयों में उपयुक्त वातावरण के निर्माण में बहु तबल दिया जाता है।
5. स्वतंत्रताः
रूसो की भाँति मॉण्टेसरी भी शिक्षार्थी की पूर्ण स्वतंत्रता के पक्ष में है। शिक्षार्थी के व्यक्तित्व का विकास करने के लिए उसे अत्यधिक नियंत्रण में नहीं रखा जा सकता। शिक्षार्थी को अपनी रुचि के अनुसार विकास करने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। सही शिक्षा प्राकृतिक एवं स्वतंत्र वातावरण में होती है। शिक्षार्थी की रुचि में अवरोध उत्पन्न करने से उसके विकास में बाधा पड़ती है। मॉण्टेसरी ने शिक्षार्थी की मूलप्रवृतियाँएवं रुचियों को ही शिक्षा का आधार माना है। उसके अनुसार स्वतंत्र वातावरण में शिक्षा देने का उद्देश्य बालक में स्वावलंबन, आत्मविश्वास आदि गुणों को उत्पन्न करना है।
6. वैयक्तिता का विकास
मॉण्टेसरी के अनुसार शिक्षा विकास की एक प्रक्रिया है किंतु यह आंतरिक होता है उसके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बालक की वैयक्तिता का विकास करना है। मॉण्टेसरी ने बालक के प्राकृतिक विकास पर बल दिया। उनके अनुसार शिक्षार्थी को भविष्य में क्या बनना है, वह उसमें जन्म समय ही बीज रूप में विद्यमान होता है। अतः शिक्षक का कार्य जन्म के समय उपस्थित शक्तियों के विकास का वातावरण प्रदान करना है।
7. आत्म शिक्षा :
मॉण्टेसरी का कथन है कि सच्ची शिक्षा वह है जिसमें शिक्षार्थी अपनी आवश्यकता के अनुसार स्वयं सौखता है। अपने आप जान की खोज करने से जान का सच्चा रूप सामने आता है। इस सिद्धांत द्वारा स्वानुभव के सिद्धांत के महत्व को स्वीकार किया गया है। शिक्षक को अपनी ओर से कोई आज्ञा या निर्देश नहीं देना चाहिए। शिक्षार्थी जब अपने आप कुछ सीखता है और अपनी उन्नति देखता है तो वह बहु तप्रसन्न होता है।
आत्म- शिक्षा के लिए मॉण्टेसरी ने कुछ शैक्षिक यंत्रों का निर्माण किया है। शिक्षार्थी को ये शैक्षिक यंत्र दे दिए जाते हैं और वह उनसे खेलने लगता है। इन यंत्रों को प्रबोधक यंत्र कहा जा सकता है। जब शिक्षार्थी एक प्रकार के यंत्र से खेलते-खेलते थक जाता है तो उसे छोड़ देता है। फिर वह दूसरे यंत्र की ओर प्रेरित होता है। यह प्रेरणा उसकी आत्मा से ही मिलती है। अतः बालक बहु तरुचि के साथ खेल खेलता है और प्रसन्न हो जाता है।
8. ज्ञानेंद्रिय प्रशिक्षण द्वारा शिक्षा:
मॉण्टेसरी के अनुसार जानेंद्रिय की शिक्षा का अत्यधिक महत्व है। वस्तुतः ज्ञानेंद्रिय निर्बल हुई तो उस इंद्रिय से प्राप्त ज्ञान भी निर्बल होगा।
इसलिए वे जानेंद्रिय की शिक्षा पर विशेष बल देती है। मॉण्टेसरी के अनुसार तीन से सात वर्ष की अवस्था में जानेंद्रियों के विकास पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। यदि इस अवस्था में जानेंद्रियों के विकास पर ध्यान न दिया गया तो साधारण बुद्धि का शिक्षार्थी भी मंद बुद्धि बन जाएगा।
9. कर्मेन्द्रियों की शिक्षा:
ज्ञानेंद्रियों की भाँति कर्मेद्रिया भी मानव जीवन के लिए आवश्यक है। शरीर के अंग सबल बने, इसलिए यह आवश्यक है कि अंगों के सही संचालन की शिक्षा दी जाए। जब तक मांसपेशियों को नियंत्रित नहीं किया जाता तब तक उसे अंग संचालन में कठिनाई का अनुभव होगा। बच्चे को उछल-कूद, भाग-दौड़ से सम्बन्धित क्रियाओं में व्यस्त करना चाहिए ताकि वह अपने मासपेशियों में नियंत्रण करना सीख जाए। यदि बालक मासपेशियों पर नियंत्रण की क्षमता प्राप्त कर लेता है तो उसमें आत्म-निर्भरता आ जाती है।
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