लाभ कारकों में परिवर्तनों का प्रभाव - Effect of Changes in Profit Factors
लाभ कारकों में परिवर्तनों का प्रभाव - Effect of Changes in Profit Factors
(1) विक्रय मूल्य में परिवर्तन इससे अंशदान सीमा और लाभ मात्रा अनुपात प्रभावित होते हैं जिससे सम-विच्छेद बिन्दु और लाभ - शैलियाँ (profit patterns) परिवर्तित होते हैं। विक्रय मूल्य में परिवर्तन दो प्रकार के हो सकते हैं-
(अ) विक्रय मूल्य में वृद्धि - विक्रय मूल्य के बढ़ा देने से अशदान (और लाभ मात्रा अनुपात बढ़ जाता है और स्थिर लागतों की वसूली की दर तेज हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप सम-विच्छेद बिन्दु गिर जाता है, सुरक्षा सीमा बढ़ जाती हैं और सम- विच्छेद बिन्दु के बाद लाभ अधिक हो जाते है तथा इस बिन्दु के नीचे हानियाँ घट जाती है।
(ब) विक्रय मूल्य में कमी – इससे अंशदान (और लाभ - मात्रा अनुपात) कम हो जाता है और स्थिर लागतो की वसूली की दर धीमी पड़ जाती है। इसके फलस्वरूप सम- विच्छेद बिन्दु ऊपर चढ़ जाता है,
सुरक्षा-सीमा घट जाती है तथा इस बिन्दु के पश्चात् लाभ कम हो जाते हैं तथा इस बिन्दु के नीचे हानियाँ बढ़ जाती है।
नोट - विक्रय मूल्य में परिवर्तन के कारण व्यवसाय के लाभों और हानियों में प्रतिशत परिवर्तन विक्रय मूल्य की तुलना में अधिक होती है।
(2) परिवर्तनशील लागतों में परिवर्तन - विक्रय मूल्य में परिवर्तन की तरह इससे भी अंशदान सीमा सम-विच्छेद बिन्दु और लाभ-शैलियाँ प्रभावित होती है। यह परिवर्तन दो प्रकार का हो सकता है-
(अ) परिवर्तनशील लागतों में वृद्धि इसका प्रभाव विक्रय मूल्य में कमी जैसा ही होता है।
(ब) परिवर्तनशील लागतों में कमी इसका प्रभाव विक्रय मूल्य में वृद्धि जैसा ही होता है। नोट- परिवर्तनशील लागतों में परिवर्तन का लाभों पर प्रभाव इन लागतों में परिवर्तन के अनुपात में नहीं होगा।
(3) स्थिर लागतों में परिवर्तन - लागतों में परिवर्तन हो जाने पर अंशदान और लाभ - मात्रा अनुपात प्रभावित नहीं होते। अतः स्थिर लागतों की वसूली की दर पूर्ववत् ही रहती है। यह परिवर्तन दो प्रकार के हो सकते हैं -
(अ) स्थिर लागतों में वृद्धि इससे सम-विच्छेद बिन्दु ऊँचा हो जाता है तथा - सुरक्षा सीमा घट जाती है। सम-विच्छेद बिन्दु के पश्चात् लाभ स्थिर व्ययों में बढ़ी हुई राशि से घट जाते हैं और इस बिन्दु के नीचे हानियाँ स्थिर व्ययों में बढ़ी हुई राशि से बढ़ जाती है।
(ब) स्थिर लागतों में कमी इससे सम- विच्छेद बिन्दु नीचा हो जाता है तथा सुरक्षा-सीमा बढ़ जाती है। सम-विच्छेद बिन्दु के पश्चात् लाभ स्थिर लागतों में कमी की राशि से बढ़ जाते हैं और इस बिन्दु के नीचे हानियाँ स्थिर लागतों में कमी की राशि से घट जाती है।
विक्रय मूल्य और लागतों में एक साथ परिवर्तन इन कारकों में एक साथ परिवर्तन के बहुत से संयोग हो सकते हैं। यदि ये परिवर्तन एक ही दिशा में होते हैं तो इसका अंशदान, सम-विच्छेद बिन्दु और लाभ शैली पर प्रभाव बहुत ही अमहत्वपूर्ण होगा, क्योंकि एक कारक में परिवर्तन का प्रभाव दूसरे कारक के परिवर्तन से स्वतः ही लोप हो जाता है। फिर भी इससे लाभ - मात्रा अनुपात में परिवर्तन हो जाता है। दूसरी ओर यदि विक्रय मूल्य और लागतों में परिवर्तन एक दूसरे के विपरीत दिशा में होते हैं तो इसका अंशदान, लाभ- मात्रा अनुपात, सम-विच्छेद बिन्दु और लाभ शैली पर बहुत ही स्पष्ट प्रभाव पड़ेगा।
(4) मात्रा में परिवर्तन मात्रा में परिवर्तन का अंशदान और सम-विच्छेद बिन्दु पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। विक्रय मात्रा में वृद्धि से सुरक्षा सीमा बढ़ जाती है तथा इसमें कमी से सुरक्षा - सीमा घट जाती है। इसी तरह मात्रा में वृद्धि से लाभ प्रति इकाई अंशदान की दर से बढ़ जाते हैं और मात्रा में कमी से लाभ घट जाते हैं।
(5) विक्रय मिश्रण में परिवर्तन विक्रय मिश्रण में परिवर्तन हो जाने से लाभ मात्रा अनुपात में परिवर्तन हो जाता है। इससे सम-विच्छेद बिन्दु और लाभ-शैली भी बदल जाते है। विक्रय-मिश्रण के प्रतिकूल परिवर्तन (अर्थात् उच्च लाभ मात्रा अनुपात वाली वस्तु के विक्रय में कमी) से लाभ कम हो जाते हैं और सम-विच्छेद बिन्दु ऊपर चढ़ जाता है। इसके विपरीत विक्रय मिश्रण के अनुकूल परिवर्तन से लाभ बढ़ते हैं और सम-विच्छेद बिन्दु गिर जाता है।
लाभ - मात्रा चार्ट (Profit Volume Chart) यह एक विशेष प्रकार का सम-विच्छेद चार्ट होता है। इसे लाभ मात्रा ग्राफ भी कहते हैं। यह चार्ट विक्रय मात्रा और लाभों के बीच सम्बन्धों को दर्शाता है। इस चार्ट पर लागत मात्रा और विक्रय मूल्य के परिवर्तनों का लाभ पर पड़ने वाले प्रभाव भी दिखलाये जा सकते हैं। इसकी रचना विधि इस प्रकार है :
(1) इसमें X- अक्ष पर विक्रय मात्रा दिखालायी जाती है। विक्रय मात्रा मौद्रिक रूप में अथवा पूर्ण क्षमता के प्रतिशत के रूप में दिखलायी जा सकती है।
(2) Y - अक्ष पर लाभ-हानि की स्थिति दर्शायी जाती है। Y-अक्ष पर शून्य बिन्दु के ऊपर की ओर लाभ तथा नीचे की ओर हानि दिखलाई जाती है।
इस प्रकार यह ग्राफ दो भागों में बँटा होता है। ऊपर का भाग लाभ और नीचे का भाग हानि दर्शाता है। इस प्रकार क्षैतिज रेखा शून्य लाभ रेखा बन जाती है।
(3) ग्राफ पर विभिन्न स्तरों पर लाभ-हानि की स्थिति अंकित की जाती है। शून्य क्रियाशीलता पर कुल स्थिर व्ययों की राशि की कुल हानि होती है। अतः अधिकतम हानि तब होती है जबकि विक्रय मात्रा शून्य हो। इसी तरह अधिकतम लाभ तब अर्जित किया जा सकता है जबकि फैक्ट्री पूर्ण क्षमता पर कार्य करे। अधिकतम हानि Y-अक्ष पर X अक्ष के नीचे तथा अधिकतम लाभ X- अक्ष के ऊपर अंकित किये जाते है। अधिकतम हानि और अधिकतम लाभ के दोनों बिन्दुओं को मिलाकर एक सीधी रेखा खींची जाती है जिसे अशदान रेखा (Contribution line) कहते हैं। यह अंशदान रेखा X- अक्ष को जिस बिन्दु पर काटे, वह बिन्दु सम-विच्छेद बिन्दु कहलाता है।
(4) X- अक्ष और अंशदान रेखा के बीच का फैलाव (space) सम-विच्छेद बिन्दु के दाहिनी ओर लाभ क्षेत्र और बाई और हानि-क्षेत्र कहलाता है। वास्तविक विक्रय मात्रा और सम-विच्छेद मात्रा के बीच अन्तर सुरक्षा-सीमा दर्शाता है। इस ग्राफ की उपयोगिता इस तथ्य में सन्निहित है कि यह ग्राफ पूर्ण क्षमता के विभिन्न विक्रय मूल्यों पर सम-विच्छेद बिन्दु ज्ञात करने व सुरक्षा-सीमा निर्धारित करने के लिये भी प्रयोग किया जा सकता है। अतः यदि इसकी सीमाओं का उचित ध्यान रखा जाता है तो यह विश्लेषण प्रबन्ध के उत्पादन - मात्रा सम्बन्धी निर्णयों में बहुत उपयोगी सिद्ध होता है।
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