अनुदेशन तंत्र में संप्रेषण की प्रभावात्मकता - effectiveness of communication in instructional system
अनुदेशन तंत्र में संप्रेषण की प्रभावात्मकता - effectiveness of communication in instructional system
संप्रेषण शिक्षा की रीढ़ की हड्डी है। बिना संप्रेषण के शिक्षा और शिक्षण दोनों की ही कल्पना नहीं की जा सकती । 'संप्रेषण' शब्द 'प्रेषण' और 'प्रेषित करना' जैसी क्रियाओं को अपने में संजोये हुए हैं, जिनका अर्थ होता है किसी वस्तु या विचार को एक जगह से दूसरी जगह भेजना। इसमें विचार या सूचना इत्यादि का एकतरफा या एक पक्षीय हस्तांतरण ही होता है, क्योंकि इसमें विचार, सूचना या संदेश किसी स्रोत से सूचना प्राप्त करने वाले व्यक्ति तक पहुँचाने भर की ही बात होती है। संप्रेषण इसकी तुलना में कुछ अधिक व्यापक संप्रत्यय है यहाँ विचार सूचना या संदेश भेजने का कार्य एक पक्षीय न होकर द्विपक्षीय या बहुपक्षीय बन जाता है। संप्रेषण में प्रेषण क्रिया स्रोत तथा प्राप्तकर्ता के बीच समान रूप से वितरित होती है तथा दोनों ही इसकी सफलता हेतु समान रूप से उत्तरदायी होते हैं । यहाँ विचारों तथा भावों का एकतरफा स्थानान्तरण न होकर पारस्परिक रूप से आदान-प्रदान होता है। इस तरह संप्रेषण की प्रक्रिया एक सहयोगात्मक प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्तियों को अपने विचारों तथा भावों के आदान-प्रदान करने का अवसर मिलता है।
अपने विचारों तथा भावों के आदान-प्रदान के लिये हम वाचिक या अवाचिक दोनों प्रकारों के संकेतों का प्रयोग करते हैं। वाचिक शाब्दिक संकेतों के विकसित रूप में हम किसी न किसी ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं, जिसे प्राप्तकर्ता द्वारा भलीभाँति समझा जा सके । अतः अर्न्तवैयक्तिक सम्बन्धों के संदर्भ में संप्रेषण को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसमें भाषा या अशाब्दिक संकेतों के माध्यम से समाज में रहने वाले दो या दो से अधिक व्यक्तियों को अपनी भावनाओं तथा विचारों का आदान-प्रदान करने में आवश्यक सहायता उपलब्ध हो सके।
संप्रेषण की प्रभाविकता से तात्पर्य उसके द्वारा होने वाले लाभों से हैं जिन्हें प्राप्त करने हेतु वह किया जाता है। हम अपने विचार तथा भाव दूसरों तक किस सीमा तक प्रेषित कर सकते हैं। इसमें आपसी विचार विनिमय तथा भावनाओं का आदान-प्रदान किस सीमा तक सफल हो पाया है
और इसके फलस्वरुप अर्न्तवैयक्तिक सम्बन्धों की स्थापना तथा सामाजिक विकास के कार्य में कितनी सहायता मिली है इस प्रकार के मापदण्डों की सहायता से ही किए जाने वाले संप्रेषण की प्रभाविकता से जुड़े हुए वे तत्व तथा कारक कौन-कौन से हैं, जिन पर ध्यान देकर किसी भी संप्रेषण को प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
अनुदेशन शब्द का वास्तविक रूप हमें कक्षा शिक्षण में मिलता है। कक्षा शिक्षण में अध्यापक विषय को छात्र तक पहुँचाने के लिए जो क्रियाएँ करते हैं उसे अनुदेशन कहते हैं। दूसरे शब्दों में अनुदेशन शिक्षक तथा शिक्षार्थी के मध्य पाठ्यक्रमीय ज्ञान के आदान-प्रदान की क्रिया है। अनुदेशन में पाठ्यक्रम को विशेष महत्व दिया जाता है तथा पाठ्यक्रम को पूरा करना ही इसका एक मात्र उद्देश्य होता हैं।
एस. एम. कोरे के अनुसार "अनुदेशन एक पूर्व नियोजित शैक्षिक प्रक्रिया है जिसमें शिक्षार्थी के वातावरण को इस प्रकार नियंत्रित किया जाता है कि विशिष्ट परिस्थितियों में वह इच्छित व्यवहार को प्रदर्शित करता है।" इस प्रकार अनुदेशन एक कक्षा शिक्षण में चलने वाली प्रक्रिया है जिसे व्यवस्थित रूप से कक्षा में शिक्षक द्वारा प्रयुक्त किया जाता है ।
इस प्रकार कक्षा- अनुदेशन में शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये संप्रेषण महत्वपूर्ण होता है। इसमें शिक्षक विषय-वस्तु या सहगामी क्रियाओं का स्रोत अथवा विषय-वस्तु देने वाला व्यक्ति तथा छात्र इसे ग्रहण करने वाले होते हैं। शिक्षक, छात्रों को विषय-वस्तु या प्रकरण स्पष्ट करने के लिये शैक्षिक संप्रेषण में शाब्दिक तथा अशाब्दिक दोनों ही प्रकार के सम्प्रेषणों का प्रयोग प्रभावशाली ढंग से करने का प्रयास करता है जिससे उसका शिक्षण सफल एवं प्रभावशाली बन जाता है। प्रभावशाली शिक्षण के लिये प्रभावशाली शैक्षिक संप्रेषण का होना अनिवार्य है।
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि अनुदेशन शैक्षिक संप्रेषण का एक अंग होता है । डॉ. गुप्ता के शब्दों में शैक्षिक संप्रेषण के अंतर्गत छात्रों को विभिन्न प्रकार के शैक्षिक नियमों, सिद्धान्तों, नीतियों, शिक्षण की विधियों एवं पद्धतियों तथा निर्देशन एवं परामर्श आदि के विषय में शिक्षा प्रदान की जाती है। इसके लिये पाठ्य-वस्तु के विश्लेषण के साथ-साथ संप्रेषण का होना अनिवार्य है। संप्रेषण तथा संग्राहक के मध्य संप्रेषण प्रक्रिया के कारण निम्नांकित सम्बन्ध होते हैं - ( 1 ) उन्मुखीकरण तदनुभूति का विकास ( 3 ) प्रतिपुष्टि (4) भौतिक निर्भरता (5) विश्वसनीयता (6) अन्तः क्रिया।
खन्ना, लाम्बा, सक्सैना व मूर्ति (1993) के अनुसार शिक्षण अधिगम में शिक्षक तथा छात्रों को एक साथ मिलकर कार्य करने के क्षेत्र में संप्रेषण एक प्रमुख साधन के रूप में कार्य करता है।
संप्रेषण शिक्षक तथा छात्रों को एक साथ बाँधे रखने में तथा उन्हें प्रभावित करने में अहम् भूमिका निभाता है। शिक्षक सैद्धान्तिक रूप से शिक्षण हेतु अपनी पाठ योजनाएं बनाता है। शिक्षण विधियों, नीतियों, प्रविधियों आदि के प्रयोग पर विचार करता है और अपने विचार तथा योजनाओं के अनुसार शिक्षण हेतु इन्हें कार्यान्वित करने में संप्रेषण का प्रयोग करके छात्रों को विषय-वस्तु समझाने में सफलता प्राप्त करने का प्रयास करता है। इसके लिये आवश्यक है कि शिक्षक संप्रेषण की कला में निपुण हो । जब तक शिक्षक संप्रेषण की कला में निपुण नहीं होगा वह अपने शिक्षण को सक्रिय नहीं बना सकेगा । इस प्रकार संप्रेषण छात्रों को शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में अधिक सक्रिय बनाता है। शिक्षक को भी संप्रेषण के माध्यम से अपने शिक्षण के प्रति छात्रों से प्रतिपुष्टि प्राप्त होती है, जिससे वह अपने शिक्षण को प्रभावशाली बनाने का प्रयास करता है।
शैक्षिक संप्रेषण को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिये अच्छे शिक्षक कक्षा में पढ़ाते समय विभिन्न प्रकार की शिक्षण सहायक सामग्रियों का प्रयोग करते हैं और संप्रेषण को ज्यादा प्रेरणादायक बनाने का प्रयास करते हैं। जिस शिक्षक का संप्रेषण कला पर जितना अच्छा अधिकार होगा अर्थात् जितनी कुशलता एवं निपुणता के साथ संप्रेषण का उपयोग वह करेगा उतना ही उसका अनुदेशन प्रभावशाली होगा।
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