विवेकानन्द द्वारा प्रतिपादित शिक्षा के तत्व - Elements of Education as propounded by Vivekananda
विवेकानन्द द्वारा प्रतिपादित शिक्षा के तत्व - Elements of Education as propounded by Vivekananda
क) ज्ञान मनुष्य में स्वभाव सिद्ध है: वस्तुतः मनुष्य में कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता। वह तो उसके अन्दर ही मूल रूप में स्थित होता है। शिक्षा के द्वारातो उस शक्ति का अनावरण, प्रस्फुटन तथा विकास होता है। इसीलिए तो स्वामीजी ने कहा भी है मनुष्य में अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्ति प्रदान करना ही वास्तविक शिक्षा है।
सच तो यह है कि समस्त ज्ञान मनुष्य के मन में है। शिक्षा के द्वारा उसके ऊपर का आवरण ज्यों-ज्यों हटता जाता है, वह ऊपर चला आता है। जिस मनुष्य के मन में यह आवरण जितना कम हट पाता है, वह अजान के अधकार में भटकता रह जाता है। शिक्षा की उपयोगिता यहीं उपस्थित होती है। चकमक पत्थर में प्रकट रूप से अग्नि नहीं दिखाईपड़ती और न वह क्रियाशील ही हो सकती है। किन्तु तीव्र घर्षण को पाकर उसमें छिपी अग्नि प्रस्फुटन के रूप में प्रकट हो जाती है। वह किसी पदार्थ को जला सकने में समर्थ है। यही अवस्था मानव की है।
उसमें भी ज्ञानाग्नि छिपी होती है। मानव मन के अंदर समस्त ज्ञान आवरण में सुप्तावस्था में रहते हैं, किन्तु शिक्षा द्वारा वह अनावरण होते ही जागृत होकर प्रकट हो जाते हैं। शिक्षा का वास्तविक तत्व इसी प्रक्रिया में निहित है।
ख) बच्चे स्वयं सीखते हैं वस्तुतः हम में से प्रत्येक अपने आपके सिखाने का कार्य करता है। बाहर के गुरु तो केवल सुझाव देते हैं, प्रेरणा प्रदान करते हैं। वे तो अंतस्थ गुरु को मात्र उद्बोधन प्रदान करते हैं। विषय अथवा जान हमारे अनुभव तथा विचारशक्ति द्वारा स्पष्ट से स्पष्टतर होते जाते हैं। सच तो यह है कि उनकी अनुभूति हम अपनी आत्मा में करने लगते हैं। वटवृक्ष के नन्हें बीज से विशाल वृक्ष उत्पन्न होता है। माली तो मात्र अनुकूल मिट्टी हवा पानी अथवा बाह्य पोषण देता है। बढ़ने, फैलने, तथा फलने का कार्य तो वह बीज स्वयं करता है। इसी प्रकार बच्चे भी स्वयं सीखते हैं। गुरु तो मात्र उद्बोधन तथा अनुकूल बातावरण उपस्थित करता है।
ग) स्वतन्त्र अवसर :आज बच्चों को पीट-पीट कर तथा उस पर अनावश्यक दबाव डालकर हम शिक्षित करता चाहते हैं। यह न केवल अन्याय है, बल्कि अमानवीय भी है। इस प्रकार शिक्षा प्रदान भी नहीं की जा सकती। एक कथा है, किसी ने एक व्यक्ति को सलाह दी कि गधे को पीटने से वह घोड़ा बन सकता है। गधे के मूठ मालिक ने अपने गधे को इतना पीटा कि वह मर ही गया। उसे न घोड़ा बनना था न वह बना। इसी प्रकार बच्चों को पीटकर शिक्षित बनाने की प्रक्रिया में उनकी आत्मिक हत्या हो जाती है। माता पिता के अनुचित दबाव बच्चों के स्वाभाविक विकास के शत्रु होते हैं। अतः बच्चों के अन्दर निहित असंख्य प्रवृत्तियों तथा शक्तियों का स्वाभाविक रूप से विकसित होने का स्वतंत्र अबसर प्रदान किया जाए। यही सही शिक्षा है।
घ) विधायक विचार:- बच्चों की समुचित शिक्षा के लिए हमें उनके सामने विधायक बिचार रखना चाहिए। उनके सामने कभी भी निषेधात्मक विचार नहीं रखना चाहिए। वह बहुत ही घातक होता है। ऐसा देखा भी जाता है कि जहाँ माता पिता पढ़ने लिखने के लिए सदा अपने बच्चों के पीछे लगे रहते है और कहा करते हैं
कि तुम कभी कुछ भी नहीं सीख सकते गधे बने रहोगे। वहां बच्चे सचमुच में वैसे ही बन जाते हैं। वस्तुतः बच्चों को आवश्यक उत्साह तथा सहानुभूति प्रदान करने से उनकी उन्नति निश्चित है। यदि हम उनके समक्ष विधायक विचार रखे तो उनमें मनुष्यत्व आएगा और वे अपने पैरों पर खड़ा होना निश्चित रूप से सीख सकेंगे।
च) स्वाधीनता, विकास की पहली शर्त वस्तुतः स्वाधीनता ही विकास की पहली शर्त है। यदि कोई यह कहने का दुस्साहस करता है कि मैं इस नारी या इस बच्चे का उद्धार करूंगा, तो वह गलत है। दूर हट जाओऔर देखोगे कि वे अपनी समस्याओं को स्वयं हल कर लेंगे। सच तो यह है कि प्रत्येक मानव भगवान का ही स्वरूप है। अतः सही समझ और मानव मात्र की सेवा करो यह सेवा पूजा भाव से होगी तो स्वाधीन वातावरण में बच्चों का पूर्ण विकास सम्भव होगा वास्तविक शिक्षा का आलोक फैल सकेगा।
पाठ्यक्रम
पाठ्यक्रम के विषय में स्वामी विवेकानन्द जी के विचार अत्यन्त व्यापक थे। उनके पाठ्यक्रम सम्बन्धी विचारों को निम्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है -
1. पाठ्यक्रम में निषेधात्मकता नहीं होनी चाहिए।
2 पाठ्यक्रम में सत्य का समावेश होना चाहिये।
3. बालकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम में परिवर्तन किये जाने चाहिये।
4. पाठ्यक्रम को सदैव उच्च नैतिकता और आदर्शों से युक्त होना चाहिये।
5. पाठ्यक्रम बालक की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करने में सहायक होना चाहिये।
6. पाठ्यक्रम में विज्ञान की शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिये।
7. पाठ्यक्रम में क्रियात्मक कार्यों को सम्मिलित किया जाना चाहिये।
8. पाठ्यक्रम में शारीरिक प्रशिक्षण का भी महत्वपूर्ण स्थान होना चाहिये।
9 पाठ्यक्रम किसी रोजगार की शिक्षा देने वाला होना चाहिये।
स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार पाठ्यक्रम में उन सभी विषयों को सम्मिलित किया जाना चाहियेजो कि आध्यात्मिक उन्नति के लिये आवश्यक है, वे हैं बंद, उपनिषद, पुराण, दर्शन, धर्म, उपदेश, साधु-संगति, कीर्तन आदि। लौकिक उन्नति के लिये उन्होंने जो विषय बतलाये हैं, वे है भाषा, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, राजनीति, अर्थशास्त्र, गणित, कला, कृषि, प्राविधिक विषय, व्यावसायिक विषय, व्यायाम, खेल-कूद, समाजसेवा आदि। स्वामी जी ने पाठ्यक्रम में मातृभाषा के साथ-साथ संस्कृत भाषा, आग्ल भाषा और पाश्चात्य विज्ञान के अध्ययन पर भी बल दिया है। उन्होंने संगीत के अध्ययन को भी महत्वपूर्ण माना और धार्मिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में स्थान देने पर बल दिया।
शिक्षण विधि
स्वामी विवेकानन्द ने ज्ञान प्राप्त करने के लिये मन की एकाग्रता को अति आवश्यक माना है।
उनके अनुसार एकाग्रता ही वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य अपनी समस्त शक्तियों का विकास कर सकता है। मन की एकाग्रता से ही मनुष्य में आत्म विश्वास और स्थिरता आती है। रसायनशास्त्री अपनी प्रयोगशाला में मन की सम्पूर्ण शक्तियों को एकाग्र करके ही सफलता प्राप्त करता है। ज्योतिषी एकाग्रता के द्वारा ही दूरदर्शी यन्त्र के माध्यम से ही तारागणी का निरीक्षण करता है। कला, संगीत आदि में कुशलता मन की एकाग्रता से ही आ सकती है। एकाग्रता जितनी अधिक होगी ज्ञान उतना ही अधिक प्राप्त होगा। स्वामीजी के शब्दों में, चाहे विद्वान अध्यापक हो, चाहे मेधावी छात्र हो चाहे अन्य कोई भी हो, यदि वह किसी विषय को जानने की चेष्टा कर रहा है तो उसे मन की एकाग्रता से ही कार्य लेना पड़ेगा।"
मन की एकाग्रता के लिये ब्रह्मचर्य आवश्यक है। ब्रह्मचर्य समस्त शिक्षा का आधार है। ब्रह्मचर्य से बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्ति उत्पन्न होती है, वासनाओं पर विजय होती है, स्मृति शक्ति का विकास होता है,
प्रबल कार्य शक्ति प्राप्त होती है, अमोल इच्छा शक्ति विकसित होती है और पवित्रता का भाव जागृत होता है। स्वामीजी ने विद्यार्थियों के लिये ब्रह्मचर्य को आवश्यक बताया और इसका अभ्यास करने पर बल दिया। उन्होंने कहा था कि बारह वर्षों तक अखण्ड रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क पर एक बार पढ़ी या सुनी बात अमिट संस्कार छोड़ जाती है।
स्वामी जी के अनुसार बालक को स्वाभाविक ढंग से सीखने का अवसर देना चाहिये। उसमें ज्ञान को ढूँसना नहीं चाहिये। बालक अपने आपको शिक्षित करता है। पर तुम उसे अपने ही ढंग से आगे बढ़ने में सहायता दे सकते हो। तुम जो कुछ कर सकते हो, वह निषेधात्मक ही होगा, बिधिधात्मक नहीं। तुम केवल बाधाओं को हटा सकते हो और बस ज्ञान अपने रूप से प्रकट हो जायेगा। जमीन तैयार कर दो ताकि उसमें बीज उगना आसान हो जाए। उसके चारों ओरघेरा बना दो और देखते रहो कि कोई उसे नष्ट न कर दे। उस बीज से उगते हुए पौधे की शारीरिक बनावट के लिए मिट्टी पानी और समुचित बायु का प्रबन्ध कर सकते हो और बस यहीं तुम्हारा कार्य समाप्त हो जाता है।
वह अपनी प्रकृति के अनुसार जो भी आवश्यक होगा समझ लेगा। वह अपनी प्रकृति से ही सबको बचा बैठेगा। बस ऐसा ही बालक की शिक्षा के बारे में है। बालक स्वयं अपने आपको शिक्षित करता है।"
स्वामीजी ने शिक्षण विधि के क्षेत्र में विचार-विमर्श, वाद-विवाद, विश्लेषण, चिन्तन और तर्क पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षक को विद्यार्थियों में जिज्ञासा और कौतुहल उत्पन्न करना चाहिये और उनकी शंकाओं का समाधान करना चाहिए। उनके सामने ऐसी परिस्थितियों, अवसर और समस्याएँ प्रस्तुत करनी चाहिए जिसमें वे विचार विमर्श कर सके बाद-विवाद कर स चिन्तन कर सके, विश्लेषण कर सके, और तर्क-वितर्क कर सकें। इससे वे ज्ञान प्राप्ति की बाधाओं को दूर करने में सफल होंगे।
स्वामीजी ने पुस्तकीय शिक्षण पर बल नहीं दिया। उनके अनुसार पुस्तक पढ़ने की अपेक्षा सुनने और देखने से अधिक ज्ञान प्राप्त हो सकता है। इसलिए उन्होंने शिक्षण में कहानियाँ सुनने धर्मोपदेश सुनने और भ्रमण करने पर अधिक बल दिया। स्वामीजी ने उपदेश और व्याख्यान द्वारा विभिन्न तथ्यों का ज्ञान प्राप्त करने पर भी बल दिया।
स्वामीजी ने शिक्षण विधि के क्षेत्र में स्वानुभव तथा रचनात्मक कार्यों द्वारा ज्ञान ग्रहण करने पर भी बल दिया है। उन्होंने कहा कि यदि भाषा और साहित्य, काव्य और कला एवं अन्य विषयों में केवल सूचनायें न देकर बालकों को रचनात्मक कार्य करने का मार्ग दिखाया जाये तो अधिक श्रेयस्कर होगा। स्वामीजी ने बालकों को सुझाव देने के लिए व्यक्तिगत निर्देशन और परामर्श विधि के प्रयोग को भी आवश्यक बताया।
अनुशासन : स्वामी विवेकानन्द शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन को बहु तमहत्वपूर्ण स्थान देते थे। वे शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों को ही अनुशासित देखना चाहते थे। अनुशासन से उनका तात्पर्य केवल बाहय व्यवस्था से ही नहीं है वरन् वे सयम और आत्म नियंत्रण पर बल देते हैं। उनके अनुसार विद्यार्थी को स्वनुशासन में सीखना चाहिये। स्वामीजी के अनुशासन सम्बन्धी विचार प्रकृतिवाद से मिलते-जुलते है। स्वामीजी का कहना था कि विद्यार्थियों को किसी प्रकार का शारीरिक दण्ड नहीं दिया जाना चाहिए और न ही उन पर अनुचित दबाव डाला जाना चाहिये। इससे उनके विकास के अवसर अबरुद्ध हो जाते हैं। इसलिए उनको पर्याप्त स्वतंत्रता दी जानी चाहिये और सहानुभूति के साथ सीखने के लिए उत्साहित किया जाना चाहिये।
शिक्षक तथा शिष्यः स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि में शिक्षक का अर्थ है गुरु गृहवास बस्तुतः शिक्षक अर्थात् गुरु के व्यक्तित्व का प्रभाव छात्र के जीवन पर बहुत गहरा पड़ा है। जैसा शिक्षक, बैसा शिष्य शिक्षक का वैयक्तिक आचरण शिष्य के जीवन का निर्माण करता रहता है। अतएव शिक्षक का चरित्र अग्नि के समान जाज्वल्यमान होना आवश्यक है। जिस शिक्षक के चरित्र में ऊष्मा तथा प्रकाश नहीं, वह अपने शिष्य के चरित्र में प्राण तथा प्रकाश का समावेश कैसे कर सकता है। शिक्षक का त्यागी तथा अध्ययनशील होना भी उतना ही अनिवार्य है। जो त्याग नहीं कर सकता है वह विद्या का दान क्या कर सकता है।
प्राचीन गुस्कुल प्रथा में शिक्षक ममतावान, त्यागी, परोपकारी, विद्वान तथा सशक्त होते थे। शिक्षकों के लिए वही आदर्श अपेक्षित है। इन गुणों से विभूषित व्यक्ति ही गुरु बनने का अधिकारी है। इन आवश्यक गुणोंके होते हुए भी जिस शिक्षक के हृदय में शिष्य के प्रति सच्ची सहानुभूति का अभाव होता है वह कदापि शिक्षक नहीं हो सकता। वस्तुतः सच्ची सहानुभूति के बिना शिक्षक अच्छी एवं प्रभावकारी शिक्षा चाहे भी तो नहीं दसकता है सच्चा शिक्षक वह है जो अपनी आत्मा को शिष्य की आत्मा में प्रविष्ट कर सके। सच्चा शिक्षक शिष्य से अपना एकात्म स्थापित कर सकने में सफल होता है।
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