किशोरावस्था में बच्चे का संवेगात्मक, सामाजिक विकास - Emotional, social development of the child in adolescence

किशोरावस्था में बच्चे का संवेगात्मक, सामाजिक विकास - Emotional, social development of the child in adolescence


1) प्रेम, दया, क्रोध, सहानुभूति आदि संवेग स्थायी रूप धारण कर लेते हैं। वह इन पर नियंत्रण नहीं रख पाता है।


2) किशोर के ज्ञान, रुचियों और इच्छाओं की वृद्धि के साथ संवेगों को उत्पन्न करने वाली घटनाओं या परिस्थितियों में परिवर्तन हो जाता है।


(3) किशोर अपने आप को न तो बालक समझता है और न प्रौढ़। अतः उसे अपने संवेगात्मक जीवन में बातावरण से सामंजस्य में बहुत कठिनाई होती है। असफल होने पर घोर निराश हो जाता है।


4) किशोरावस्था में बालक एवं बालिका दोनों में काम प्रवृत्ति तीव्र हो जाती है और उनके संवेगात्मक व्यवहार पर असाधारण प्रभाव डालती है।


किशोरावस्था में बच्चे का सामाजिक विकास


1) बालकों और बालिकाओं में एक-दूसरे के प्रति बहुत आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। अतः एक-दूसरे को अपनी और आकर्षित करने के लिए वे अपनी सर्वोत्तम वेश-भूषा, बनाव- श्रृंगार में अपने को दूसरे के समक्ष उपस्थित करते हैं।


2) बालक और बालिकाएँ दोनों अपने-अपने समूह का निर्माण करते हैं। 


3) कुछ बालक और बालिकाएँ अपने या विभिन्न लिंग के व्यक्ति से घनिष्टता स्थापित कर लेते हैं।


4) किशोर समूह के प्रति बफादार रहता है जिस कारण नेतृत्व उत्साह, सहानुभूति सद्भावना आदि सामाजिक गुर्णा का विकास होता है।


5) किशोर बालक एवं बालिकाएँ सदैव किसी न किसी समस्या में उलझे रहते हैं जैसे-धन, प्रेम, विवाह, कक्षा में प्रगति, भावी व्यवसाय आदि।