शिक्षा के माध्यम से पर्यावरण जागरूकता - environmental awareness through education
शिक्षा के माध्यम से पर्यावरण जागरूकता - environmental awareness through education
प्रकृति के विभिन्न घटक जैसे जल, थल, वायु तथा जीव आपस में मिलकर एक जटिल तंत्र का निर्माण करते हैं जिसे हम पर्यावरण कहते हैं। मानव की कल्याणकारी योजनाओं और मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रकृति से सम्बन्ध है । आज विश्व के प्रत्येक क्षेत्र की पर्यावरणीय समस्यांओं की रचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई मनुष्य स्वयं है इन समस्याओं के सम्बन्ध में आज पूरे विश्व के लोगों में संवेदनशीलता एवं जागरूकता आवश्यक है।
प्रकृति ने प्राकृतिक संसाधन जैसे वायु, जल, भूमि, खनिज पदार्थ, पेड़-पौधे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराए हैं, परन्तु इस उपलब्धता की भी एक सीमा है । विगत कुछ दशकों में हुई जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण तथा विकास योजनाओं के फलस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अत्यन्त तीव्रता से हुआ है।
प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन, तथा अविवेकपूर्ण पर्यावरण उपेक्षा के कारण पर्यावरण समस्या यें दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। प्रकृति की इस स्थिति से मानव जीवन की गुणवत्ताक में कमी आती गई। पर्यावरण समस्याओं की गम्भीरता के फलस्वरूप सभ्य समाज में एक नवीन चेतना जागृत हुई तथा पर्यावरण सरंक्षण और उसमें सुधार की आवश्यकता की ओर लोगों का ध्यान गया । पर्यावरण तथा जीवों के बीच के सम्बन्ध को समझना आवश्यक प्रतीत होने लगा। पर्यावरण की रक्षा तथा उसमें सुधार एक ओर जहाँ पर्यावरण विदों के लिये एक चुनौती है वहीं प्रदूषण निवारण के लिये आम जनता को पर्यावरण संरक्षण तथा उसमें सुधार की आवश्यकता के प्रति जागरूक बनाना भी आवश्यक है। पर्यावरण की समस्याओं के निराकरण तथा पर्यावरण सुधार की योजनाओं के क्रियान्वयन के लिये अपेक्षित जन सहयोग प्राप्त करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
भावी पीढ़ी के सर्वांगीण विकास एवं पर्यावरण से सामंजस्य बनाये रखने का उपाय है
शिक्षा के द्वारा पर्यावरण के प्रति जागरूकता। आवश्यकता इस बात की है कि बालक के विकास के प्रत्येक चरण में उचित मात्रा एवं तरीके से पर्यावरण के प्रति उसकी जिम्मेदारी और निर्भरता का निर्धारण किया जाए। प्रारंभिक कक्षा के विद्यार्थियों, जो कल के नागरिक हैं, में पर्यावरण के प्रति जागरूकता, पर्यावरण के महत्व, रक्षा की चिन्ता एवं व्यवहार में धनात्मक परिवर्तन लाना शिक्षा का एक महत्वकपूर्ण उद्देश्य है छात्रों में पर्यावरण से सम्बन्धित पाठ्यक्रम का समावेश करने की आवश्यकता है जिससे बच्चों में पर्यावरणीय ज्ञान का विकास हो सके एवं वे स्वयं कुछ बातों को अनुभव करके उसे अपने जीवन में उतार सकें ताकि कल जब वे इस समाज के नागरिक के रूप में उपस्थित हो तो प्रकृति में फैले इस असन्तुलन को ध्यान में रखते हुये कार्य करें। शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा पर्यावरण से सम्बन्धित समस्याओं की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया जा सकता है। पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से लोगों में पर्यावरण के ज्ञान का विकास एवं प्रसार किया जा सकता है। उन्हें पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाया जा सकता है।
जनजीवन पर प्रदूषण के कारण होने वाले प्रभाव की जानकारी को शिक्षा के माध्यम से जन साधारण तक पहुँचाया जा सकता है। स्वच्छ जल, स्वच्छ भूमि के महत्व पर शिक्षा संस्थानों में जोर दिया जा सकता है। वास्तव में जनसाधारण में पर्यावरण के प्रति जागरूकता को उत्पन्न करने की तीव्र आवश्यकता है। इसके लिये पर्यावरण बोध को सम्पूर्ण शिक्षा प्रक्रिया के एक अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार करना उचित होगा।
1नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 1986 में राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा की संकल्प ना करते सामान्य कोर (Common core) की बात कही गई तब इस सामान्य कोर में पर्यावरण संरक्षण को भी शामिल किया गया राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कहा गया है कि, "वातावरण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने की अत्यधिक आवश्यकता है। यह बच्चों से प्रारंभ करके सभी आयु तथा समाज के सभी वर्गों में व्याप्त होनी चाहिये । वातावरणीय जागरूकता विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के शिक्षण में दृष्टिगोचर होनी चाहिये। उसमें एक सम्पूर्ण शिक्षा प्रक्रिया में इस पक्ष को एकीकृत किया जायेगा ।
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