पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास - Environmental Conservation and Sustainable Development
पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास - Environmental Conservation and Sustainable Development
पर्यावरण शिक्षा लोगों को पर्यावरण के संरक्षण के प्रति सतर्क करती है तथा सतत विकास को प्रोत्साहित करती है। पर्यावरण संरक्षण तथा सतत विकास एक-दूसरे के पर्याय हैं। उद्योग एवं तकनीकी के अंधाधुंध विकास ने हमारे समक्ष कई ऐसी पर्यावरण समस्याएँ खड़ी कर दी हैं जो मानव जाति एवं अन्य जीवों के लिए प्राणघातक सिद्ध हो सकती हैं तथा इन पर नियंत्रण न किया गया तो हमारी पारिस्थितिकी जिस पर हमारा समाज एवं अर्थव्यवस्था निर्भर है, तबाह हो सकता है। परिणामस्वरूप हमारे आने वाली पीढ़ी का अस्तित्व भी नष्ट हो सकता है। इस उप इकाई में आप जानेंगे कि सतत द्वारा पर्यावरण विकास क्या है तथा पर्यावरण शिक्षा द्वारा पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास को किस प्रकार प्रोत्साहित किया जा सकता है?
पर्यावरण शिक्षा प्रस्तावित करती है कि आज समाज में ऐसे विकास की आवश्यकता है जिसकी प्रकृति सतत हो, अर्थात ऐसा विकास जो हमारे पर्यावरण एवं प्राकृतिक संसाधनों के पुनर्निर्माण एवं वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले ।
औद्योगिक एवं तकनीकी विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास इस दर पर न हो कि इन संसाधनों का पुनर्निर्माण सही समय पर न हो सके तथा हमारे अस्तित्व पर ही सवालिया निशान खड़ा हो जाए । यह सुनिश्चित हो कि जिस दर तथा मात्रा में हम पारिस्थितिकी के उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं उसी दर तथा मात्रा में ये उत्पाद हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए भी उपलब्ध हों। वे हमारी तरह ही प्रकृति की सुविधाओं का सफलतापूर्वक उपयोग कर सकें ।
इसमें कोई संशय नहीं कि आज हमारा समाज आर्थिक रूप से अधिक सशक्त प्रतीत हो रहा है किन्तु यह विकास प्राकृतिक संसाधनों के पुनर्निर्माण तथा पारिस्थितिकी तंत्र के उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव भी डाल रहा है और यदि यह सब कुछ इसी रूप में निरंकुश चलता रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी आने वाली पीढ़ी तथा अन्य जीवों के जीने के लिए पर्यावरण का सुरक्षा कवच तथा प्राकृतिक संसाधन ही न बचें।
उद्योगों एवं तकनीकी के अंधाधुंध विकास ने प्रदूषण, वनों का कटाव, मृदा-क्षरण, अम्लीय वर्षा, वन्य जीवन का ह्रास, ग्लोबल वार्मिंग जैसी प्राणघातक समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं अतः यह आवश्यक है कि उद्योगों एवं तकनीकी के विकास की दिशा पर विचारशील चिंतन किया जाए उन वैकल्पिक युक्तियों की खोज की जाए जिसके फलस्वरूप समाज के आर्थिक विकास एवं प्रकृति के बीच समरसता एवं सामंजस्य स्थापित हो । पर्यावरण शिक्षा द्वारा लोगों को पर्यावरण समस्याओं, वैकल्पिक संसाधनों एवं युक्तियों तथा सतत विकास के प्रति जागरूक किया जाए।
पर्यावरण शिक्षा ज्ञान, कौशल एवं मूल्यों का एक ऐसा तंत्र है जो लोगों को प्राकृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण के अंतर्संबंधों से अवगत कराता है तथा सतत विकास को प्रोत्साहित करता है।
यह हमें जीवन शैली के उन मानकों से परिचित कराता है जिससे प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग हो सके तथा इनका संरक्षण भी किया जा सके। यह हमें आर्थिक विकास के लिए वैकल्पिक युक्तियों के उपयोग से भी अवगत कराता है जिससे प्राकृतिक संसाधनों के ह्रास एवं अन्य पर्यावरण समस्याओं को नियंत्रित किया जा सके। एक स्वस्थ पर्यावरण के निर्माण के लिये लोगों को पर्यावरण शिक्षा द्वारा यह सिखाने कि आवश्यकता है कि जो पर्यावरण हमारे जीवन को सहारा देता है उसके सुरक्षा की जिम्मेदारी हम सब की है तथा हमारा अस्तित्व कहीं न कहीं उसके अस्तित्व से जुड़ा है । प्राकृतिक संसाधन का भण्डार काफी सीमित है तथा इसका उपयोग यदि सही ढंग से नकिया गया एवं इसके हनन को न रोका गया तो आने वाले वर्षों में इसकी कमी मानव जाति तथा अन्य जीवों को नष्ट कर सकती है । अतः ऐसे वैकल्पिक संसाधनों एवं युक्तियों को खोजने की आवश्यकता है जो प्राकृतिक संसाधनों पर हमारी निर्भरता कम करे तथा इनका संरक्षण कर सके साथ-ही-साथ दुनिया के सभी देश विशेष रूप से विकाशील देश अपना आर्थिक विकास सतत रूप से बिना पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए कर सकें ।
सतत विकास को प्रभावशाली बनाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा पर्यावरण समस्याओं पर नियंत्रण हेतु पर्यावरण शिक्षा द्वारा '3R' के सूत्र - REDUCE ( कम करना ), RECYCLE (पुनर्चक्र) तथा REUSE (पुनरुपयोग) को बढ़ावा दिया जाता है। प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के फलस्वरूप निकलने वाले व्यर्थ पदार्थ को ऐसे पदार्थ में परिवर्तित कर दिया जाए जो तुलनात्मक रूप से कम हानिकारक हो। प्राकृतिक संसाधनों के स्थान पर वैकल्पिक संसाधनों को उपयोग में लाया जा सकता है जो वातावरण को कम नुकसान पहुँचाती है, साथ-ही-साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी करते हैं। मल ( Sewage) या कारखानों से निकलने वाले गंदे पानी (effluent) को पुनर्चक्र द्वारा उपयोग में लाया जा सकता है। उद्योगों के ऐसे उत्पाद (जैसे- प्लास्टिक, रबड़ इत्यादि) जिनका जैविक रूप से विघटन नहीं होता उन्हें पुनर्चक्र द्वारा बार-बार उपयोग में लाया जाए ताकि हमारा पर्यावरण सुरक्षित रहे।
आज दुनिया का हर देश आर्थिक विकास की होड़ में लगा हुआ है तथा कई ऐसी परियोजनाएँ एवं आर्थिक विकास नीतियाँ अपनायी जा रही हैं
जो पर्यावरण सुरक्षा के लिए प्रतिकूल हैं। विकसित देश के लोगों की जीवन शैली जो यूँ तो सभ्य कहलाती है किन्तु पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करती प्रतीत होती हैं, वहीं दूसरी ओर विकासशील एवं अविकसित देश भी अपने नागरिकों की जरूरतों को पूरा करने तथा अन्य देशो से अधिक विकसित बनने की प्रतिस्पर्धा में त्वरित गति से औद्योगिक विकास में लगे हुए हैं। आर्थिक विकास की यह प्रतिस्पर्धा न केवल क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर पर वरन वैश्विक स्तर पर भी ऐसी पर्यावरण विपदाएँ (जैसे- ग्लोबल वार्मिंग) पैदा कर रही हैं जो यदि इसी तरह बनी रहे तो यह पृथ्वी पर मानव तथा कई अन्य जीवों के जीवन को तबाह कर सकती हैं। अतः आज हमारे समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यदि कोई है तो वह यह है कि किस प्रकार लोगों में नैतिक रूप से तर्क करने की क्षमता का विकास हो जिससे वे न केवल पर्यावरण के महत्व को समझे वरन वे पर्यावरण संरक्षण एवं आर्थिक विकास से जुड़े नैतिक सरोकारों पर गंभीरता पूर्वक विचार कर सके।
पर्यावरण शिक्षा द्वारा इन नैतिक सरोकारों पर विशेष बल दिये जाने की नितांत आवश्यकता है। किन्तु आश्चर्य की बात यह है कि पर्यावरण शिक्षा जो सतत विकास को प्रोत्साहित करती है आज भी सबसे अधिक उपेक्षित अध्ययन का विषय है। यह हमारे जीवन को सहारा देने वाले तंत्रों से हमें अवगत कराती हैं, साथ-ही-साथ यह हमारे आर्थिक विकास से भी नजदीकी रूप से जुड़ी हुई है। कई ऐसी परिस्थितियाँ जिसमें हमे विकास तथा पर्यावरण में से किसी एक को चुनना होता है, पर्यावरण शिक्षा हम नैतिक रूप से ऐसा निर्णय लेने के लिए तैयार करती है जो समाज के विकास तथा पर्यावरण की सुरक्षा दोनों के बीच संतुलन बनाये रखने में सक्षम हो अतः शिक्षा व्यवस्था के विभिन्न स्तर पर पर्यावरण शिक्षा को अनिवार्य रूप से सम्मिलित किये जाने के साथ-साथ इसके प्रभावकारी क्रियान्वयन के उचित शिक्षा को प्रौढ शिक्ष उपाय भी सुनिश्चित किये जाने चाहिए। साथ-ही-साथ पर्यावरण शिक्षा को प्रौढ़ शिक्षा के अंतर्गत भी विशेष स्थान दिया जाना चाहिए।
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