प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा के स्तर पर पर्यावरण शिक्षा - Environmental education at the level of primary, secondary and higher education

प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा के स्तर पर पर्यावरण शिक्षा - Environmental education at the level of primary, secondary and higher education


विभिन्न प्रकार की पर्यावरणीय समस्याओं जैसे पर्यावरण प्रदूषण से होने वाली जन स्वास्थ्य की क्षति को रोकने के लिये पर्यावरण शिक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है। पर्यावरण शिक्षा समाज के प्रत्येक वर्ग के लिये आवश्यक है तथा इसे प्रत्येक समुदाय में प्रसारित किया जाना अति आवश्यक है। प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा के स्तरों पर पर्यावरण से सम्बन्धित शिक्षा या जानकारी का विवरण इस पर पर्यावरण से सम्बन्धित शिक्षा या जानकारी प्रकार है- 


1) पर्यावरण शिक्षा प्राथमिक स्तर पर


वास्तव में पर्यावरण शिक्षा तो घर और पड़ोस से ही आरंभ हो जाती है।

बच्चों के बाल्यकाल में सामूहिक क्रियाकलाप अति आवश्यक हैं क्योंकि बच्चा अकेले नहीं बल्कि समूह में ही रहना पसंद करता है जहाँ वे एक दूसरे से घुलते-मिलते हैं। इस सामूहिक संगठन में ही उन्हें औपचारिक रूप से स्वास्थ्य शिक्षा दी जा सकती है। इस समय उन्हें खाद्य-समस्या और जल के प्रदूषित होने के कारणों और विधियों की जानकारी सुगमतापूर्वक कराई जानी चाहिये। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को मौसम के चक्रों तथा पर्यावरण के तत्वों की जानकारी देकर पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना बहुत सरल होता है। बच्चों के पर्यावरण अवलोकन के स्थान हैं- नर्सरी स्कूल, मन्दिर, गिरिजाघर आदि । इन स्थानों के अवलोकन के समय बच्चा औपचारिक शिक्षा ग्रहण करता है। आंशिक रूप से तो यह शिक्षा उसे अपने घर में ही उपलब्ध हो जाती है। यदि माता-पिता सतर्क रहें और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बन जायें तो वे सुगमतापूर्वक अपने बच्चों को पर्यावरण सेभावनात्मक रूप से जोड़ सकते हैं। प्राथमिक कक्षाओं में पहुँचते-पहुँचते तो औपचारिक शिक्षा ही शुरू हो जाती है।


2) पर्यावरण शिक्षा माध्यमिक स्तर पर


माध्यमिक स्तर के बच्चों में पर्यावरण अवलोकन की क्षमता विकसित हो चुकी होती है और उन्हें पर्यावरण सरंक्षण के प्रति प्रेरित किया जा सकता है क्योंकि उनमें पर्यावरण की शिक्षा को आत्मसात करने की क्षमता भी होती है। माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों की पर्यावरण शिक्षा इस प्रकार होनी चाहिये


• मूल्योन्मुख


• समुदायोन्मुख


• मानव कल्याण से प्रेरित 


माध्यामिक शिक्षा आज से पूर्व पारम्परिक शिक्षा थी और पर्यावरण शिक्षा के तत्वों के समावेश की सम्भावना उनमें प्राय: बिल्कुल ही नहीं थी।

आज पर्यावरण के सम्बन्धे में हमारा ज्ञान बहुत विकसित हो चुका है अतः इसमें उत्पन्न समस्याओं के समाधान के लिये विभिन्न क्षेत्रों में कौशल की भी आवश्यकता महसूस की जा रही है। विकसित देशों में पर्यावरण शिक्षा को औपचारिक बनाने का प्रयास प्रारम्भ हो चुका है ताकि विद्यार्थियों में प्रकृति के तत्वों और उनके एक दूसरे पर निर्भरता तथा पारिस्थिति तंत्र के सम्बन्ध में सूझ-बूझ को विकसित किया जा सके। कुछ देशों में तो पर्यावरण शिक्षा को विद्यालय के विज्ञान विषयों के साथ जोड़ दिया गया है। बहुत से विकासशील देशों में जीव विज्ञान की शिक्षा को वृहद कर दिया गया है और इसके साथ ही प्रदूषण मापने से सम्बन्धित प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। विद्यालय के विद्यार्थियों को पर्यावरण शिक्षा हेतु प्रेरित करने के निम्न दो रास्ते सहायक सिद्ध हो सकते हैं-


क. विद्यार्थियों को विद्यालय से बाहर पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान हेतु सामुदायिक क्रिया कलापों में सम्मिलित होने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिये। 


ख. विद्यार्थियों को पर्यावरणीय तथ्यों के आधार जैसे पारिस्थितिकीय, संसाधन वितरण, जनसंख्या गतिशीलता, भूख और भुखमरी जैसे विषयों पर अपना ध्यान केंन्द्रित करना चाहिये।


3) पर्यावरण शिक्षा उच्च स्तर पर


पर्यावरण शिक्षा के विकास पर अब कुछ ध्यान दिया जाने लगा है किंतु विकासशील देशों में विद्यार्थियों की इस क्षेत्र में शिक्षित होने या उपाधि प्राप्त करने में रूचि प्रायः कम दिखाई देती है।

इसका एक कारण यह हो सकता है कि पर्यावरण शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थियों को नौकरी की संभावना कम लगती है। पिछले कुछ वर्षों से पर्यावरण शिक्षा के लिये विश्वविद्यालयों और कुछ अन्य उच्च शिक्षण संस्थाओं में कार्य हो रहे हैं। कुछ विश्वविद्यालयों ने पर्यावरण शिक्षा से सम्बन्धि पाठ्यक्रम आरंभ किये हैं जिनमें कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रम इस प्रकार हैं-


• पर्यावरण योजना और संसाधन विकास


• पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन


• अध्यापक प्रशिक्षण


• पारिस्थिति व्यवधान और पर्यावरण निम्नता अनुसंधान


• अनुसंधान में प्रशिक्षण और अनुसंधानात्मक विधियां विशेषकर प्रदूषकों तथा उनके विषैले प्रभाव की खोज ।


उपर्युक्त सभी कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये छात्रों को संस्थानों से बाहर ले जाकर प्रायोगिक कार्यो की व्यवस्था करनी चाहिए तथा इसे कक्षा के अध्ययन से ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए। भू-क्षरण को रोकने के तरीकों के सम्बन्ध में कक्षा में दी गई सूचना से ज्यादा लाभकारी होगा उस स्थान विशेष का भ्रमण जहाँ भू-क्षरण रोकने के लिये कार्य सम्पन्न हुए हैं। जल संचय (वाटर हार्वेस्टिंग) तथा भूमि अपरदन को रोकने के लिये किए गये प्रयासों के तहत विभिन्न स्थानों का भ्रमण करना लाभप्रद होता है। विभिन्न कारखानों में उत्पन्न प्रदूषकों का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसके मूल्यांकन के लिये कारखानों तथा आस-पास के क्षेत्र का भ्रमण करने से सही और प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त हो जाती है। विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों में एन.एस.एस. कार्यक्रम के अन्तर्गत कई स्थानों पर विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को वृक्षारोपण का कार्य करना चाहिए तथा इसके लिये ग्रामीणों को भी प्रोत्साहित करना चाहिये।


इन कार्यों को सम्पन्न कराते समय स्नातक तथा स्नातकोत्तरर छात्र ग्रामीणों को स्वास्थ्यवृत्ति वृत्ति, जल प्रदूषण तथा भूमि अपरदन को रोकने की विधियों को प्रभावशाली ढंग से समझा सकते हैं। छात्र, लोगों को कीटनाशकों के कुप्रभावों से अवगत कराने तथा उत्पादन वृद्धि के तरीकों को भी सुझा सकते हैं।