ज्ञान मीमांसा की संकल्पना - epistemology concept
ज्ञान मीमांसा की संकल्पना - epistemology concept
जिस क्षण से मानव मात्र ने अपने अस्तित्व को पहचाना व उस पर चिंतन और विमर्श करना प्रारम्भ किया, दर्शन उसके विचार प्रक्रिया का अभिन्न अंग हो गया एवं जब से दर्शन अस्तित्व में आया कहा जाता है ज्ञान की अवधारणा, मीमांसा व विवेचना की प्रक्रिया का तभी से प्रादुर्भाव हुआ है। ज्ञान संबंधित समस्यायें दर्शन का सदैव प्रमुख विषय रही है। इसलिए ज्ञान की विवेचना दर्शन का प्रमुख अंग है। जिसमें मुख्यतः निम्नलिखित प्रश्नों का हल ढूंढा जाता है
1) ज्ञान क्या है ?
2) ज्ञान के साधन क्या हैं ?
3) विश्व सम्बन्धी ज्ञान में ज्ञाता ज्ञेय का सम्बन्ध किस प्रकार का है ?
4) ज्ञान की सत्यता व असत्यता कैसे निर्धारित की जाती है ?
दर्शन का वह भाग जिससे मानव ज्ञान की व्युत्पत्ति, अवधारणा, प्रकृति, तार्किकता, प्रसंगिकता, विश्वास, औचित्य व सीमाओं पर विमर्श किया जाता है उसे ज्ञान मीमांसा कहतें है। ज्ञान कई तरह का हो सकता है, कुछ करने या जानने का तरीका, किसी व्यक्ति या स्थान को जानना इत्यादि । जानना, समझना, परिचय इत्यादि ज्ञान के पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त होतें हैं परंतु इन पर्यायवाची को हम कभी ज्ञान के विकल्प के रूप में प्रयुक्त नहीं कर सकते हैं। जैसे आप अपने शिक्षक को जानतें है अथवा आपका अपने शिक्षक से परिचय है, ऐसा कहा जा सकता है लेकिन आप को अपने शिक्षक का ज्ञान है ऐसा कथन सुनने में तर्कसंगत नहीं लगता है।
आदर्शवादी अथवा प्रत्ययवादी चिंतन कहता है की विचार सर्वव्यापी, सार्वभौमिक व सार्वकालिक हैं। प्लेटो का मत था कि इन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान अपूर्ण है व पूर्णज्ञान संप्रत्ययों में है।
उन्होंने इसे डायलेक्टिक कहा। डेकार्ट ने कहा दुनिया का सबसे निःसंदेह सत्य यह है कि हम संदेह करते है। क्योंकि हम विचार करते है इसलिए ज्ञान विचारों में है। उन्होंने ऐसे ज्ञान की संकल्पना की जिस ज्ञान पर कभी संदेह नहीं किया जा सकता है। अतः निसंदेह ज्ञान सारे ज्ञान की आधारशिला है ज्ञान के सन्दर्भ में देकार्त का कथन है- 'मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ. बिशप जॉर्ज बर्कले ने तो बाह्य जगत के हर प्रमुख व गौड़ गुणों को भी मानसिक कहा। 'सत्ता दृश्यूता है' अपने इस वाक्य को समझाते हुए वे कहते हैं कि प्रत्येक गुण जो हम अपनी इन्द्रियों से अनुभूत करतें है वे सब हमारे मनस में अस्तित्व रखती है न कि किसी बाह्य जगत में इसलिए सत्ताथ अनुभवमूलक होती है। इमैनुएल कांट ने ज्ञान को संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक निर्णय कहा है। अन्य शब्दों में ज्ञान वह है जो अनिवार्यता, सार्वभौमता, सत्यता, वास्तविकता तथा नवीनता इत्यादि गुणों से युक्त हो। हेगेल के अनुसार सत्ता तथा उससे सम्बंधित ज्ञान में समरूपता होती है तथा हमारा ज्ञान तर्कबुद्धि परक होता है। मानव उस सीमा तक ही ज्ञान प्राप्त कर पाता है जिस सीमा तक सत्ता और ज्ञान के मध्य समरूपता बनी रहती है इसलिए जिस प्रक्रिया एवं अनुक्रम में विश्व का विकास होता है मानव को भी ज्ञान' के लिए तीव्र गति से उसी प्रक्रिया एवं अनुक्रम को अपनाना होगा। जिससे समरूपता बनी रहे, और सत्यता तक पहुँचा जा सके।
यदि हम यथार्थवादी संकल्पनाओं से विमर्श करें तो चर्चा सबसे पहले अरस्तु की होती है। उन्होंने कहा की ज्ञान संपूर्ण निरूपण में है, जो कर के दिखाया जा सकता है वही ज्ञान है। जॉन लॉक ने मानव मनस को (कोरा कागज ) टेबुला रासा की संज्ञा दे कर कहा है कि व्यक्ति का मनस जन्म से खाली पटल की तरह होता है, वह जब अनुभव करता है तब उस पटल पर जो लिखा जाता है वह उसका ज्ञान हो जाता है। ज्ञान की प्रकृतिवादी संकल्पना पे जाएं तो सम्पूर्ण ज्ञान हमारी प्रकृति उसके नियमों तथा उसके साथ तारतम्यता में रहने से है। रूसो तथा टैगोर के दर्शन में सामाजिक कृतिमता से अलग मानव को अपने प्राकृत रूप में प्रकृति से अनुरूपता बनाते हुए अपना ज्ञान स्वयं ढूंढने को प्रेरणा परिलक्षित होती है।
यदि अर्थ क्रियावादी मत को ध्यान में रखें तो विलियम जेम्स के अनुसार सत्य अनुभव आश्रित तथा उपयोगी होता है इसलिए सत्य क्रिया में फलीभूत होता है। अतः यदि कोई संप्रत्यय सफलता में फलीभूत होता है तो वह ज्ञान है, जो सफल है वह सत्य है और जो सत्य है वही ज्ञान है।
भारतीय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में ज्ञान की अवधारणा आध्यात्मिकता से जुड़ी रही है। जैन दर्शन के अनुसार किसी भी वस्तु, प्रत्यय इत्यादि का ज्ञान हमें कभी भी एक साथ सम्पूर्णता में नहीं होता है, मानव एक समय पर किसी भी विषय या वस्तुं के केवल एक गुण अथवा पक्ष का ही ज्ञान प्राप्त करता है। सत्य व संपूर्ण ज्ञान 'केवली' अर्थात मुक्त आत्माओं को ही होता है जो कि असंदिग्ध व दोषहित यथार्थ ज्ञान होता है। जो सम्पूर्णता के साथ होता है। बौद्ध मत के अनुसार अविद्या से ही मिथ्या दृष्टि उत्पन्न होती है और हम अनात्मा, अनित्य और दुःखद को सत्य मान लेतें हैं। बौद्ध दर्शन में चार आर्यसत्यों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने के साथ ही निर्वाण प्राप्ति का मार्ग बताया गया है, जिसे अष्टांगिक मार्ग कहा जाता है, जिसका अनुसरण गृहस्थों व सन्यासियों सहित सभी मनुष्यों को करना चाहिए।
न्याय दर्शन वस्तुओं की अभिव्यक्ति अथवा प्रकाशित स्थिति को ज्ञान कहता है, जिस प्रकार किसी दीपक का प्रकाश वस्तुओं को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार ज्ञान भी अपने विषय को प्रकाशित करता है। न्याय दर्शन में ज्ञान के दो भेद किए गए है प्रमा तथा अप्रमा।
1) प्रमा-प्रमा यथार्थ ज्ञान है, वह किसी भी वस्तु विषय अथवा पदार्थ का असंदिग्ध तथा यथार्थ अनुभव है। प्रमा के चार प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान।
2) अप्रमा- प्रमा के अतिरिक्त जो ज्ञान है उसे अप्रमा कहते हैं। अप्रमा के चार भेद हैं- स्मृति, संशय, भ्रम और तर्क।
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