प्रभावशाली बजट के आवश्यक तत्व - Essential Elements of an Effective Budget

प्रभावशाली बजट के आवश्यक तत्व - Essential Elements of an Effective Budget


किसी व्यवसायिक संस्था में प्रभावशाली बजट तैयार करते समय निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:


(1) सुदृढ पूर्वानुमान व्यावसायिक पूर्वानुमान किसी भी बजट की आधारशिला होते हैं और उनके आधार पर ही विभिन्न प्रकार के बजट तैयार किये जाते हैं। प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को कच्चा माल, आदि का क्रय कार्यशील पूंजी की व्यवस्था करने से पूर्व अपनी वस्तुओं एवं सेवाओं के भावी बाजार का पूर्वानुमान करना पड़ता है। भावी बाजार सम्बन्धी विश्लेषण को दृष्टि में रखकर ही वह अपने संयन्त्र का विस्तार, विज्ञापन प्रचार एवं प्रसार, आदि की व्यवस्था करता है। पूर्वानुमान केवल सहज अन्दाज पर ही नहीं होना चाहिए बल्कि वैज्ञानिक सांख्यिकीय विधियों का उपयोग करके पूर्वानुमान करना चाहिए। एक व्यावसायिक बजट तैयार करते समय उत्पादन, खर्चे, विक्रय व भावी विकास, आदि के सम्बन्ध में पूर्वानुमान की आवश्यकता पड़ती है।


( 2 ) पद्धति एवं नियोजित लेखा-विधि पद्धति का होना: बजट तैयार करते समय व्यावसायिक संस्था की विभिन्न क्रियाओं के सम्बन्ध में समुचित आंकड़ों की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए यह अपरिहार्य होता है कि संस्था ने एक पूर्ण और यथाविधि नियोजित लेखा - विधि पद्धति को अपनाया हो। दूषित और अवैज्ञानिक लेखा - विधि पद्धति की दशा में न तो श्रेष्ठ बजट बनाना ही सम्भव हो सकता है और न उसका सफल संचालन ही सम्भव हो सकता है।


(3) सम्पूर्ण एवं नियोजित लागत लेखा-विधिः बजट - निर्माण में पूर्वानुमान का अत्यधिक महत्व होता है। लागत के सम्बन्ध में पूर्वानुमान के लिए आवश्यक होता है कि व्यवसाय में एक पूर्ण व कुशल लेखा - विधि का प्रयोग किया जाये। ऐसा होने पर ही लागत के सम्बन्ध में पूर्वानुमान सही और शुद्ध हो सकता है।

यदि लागतों का पूर्वानुमान ही गलत है, तो उसके आधार पर तैयार किया गया बजट भी सही नहीं हो सकता है। अतः लागत लेखों का सही और शुद्ध होना आदर्श बजटिंग का आधारभूत लक्षण है।


(4) कुशल संगठन जिसके अन्तर्गत दायित्व की रेखा निश्चित हो : एक कुशल, पर्याप्त व श्रेष्ठतम व्यवस्था व संगठन बजट-निर्माण एवं संचालन के लिए नितान्त आवश्यक होते हैं। बजट बनाना किसी एक व्यक्ति का कार्य नहीं होता है वरन् सभी विभागों के अध्यक्ष इस कार्य में सहयोग देते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि कारखाने के सभी विभागाध्यक्षों के कर्तव्य एवं दायित्व निश्चित हों। ऐसा संगठन, जो उत्तरदायित्व के स्पष्ट निश्चयीकरण व विकेन्द्रीकरण पर जोर देता है, सफल बजट निर्माण में सहायक होता है क्योंकि इस दशा में प्रत्येक विभाग का अध्यक्ष रूचि के साथ सहयोग दे सकता है। इस प्रकार का संगठन न केवल बजट निर्माण में सहायक होता है बल्कि बजट समन्वय व संचालन में भी सहायक हो सकता है।


(5) बजट समिति की स्थापना बजट बनाना एक सहकारिता कार्य है। छोटी संस्थाओं के यहां लेखापालक ही प्रबन्ध संचालन व अन्य उच्चस्तरीय अधिकारियों के परामर्श के आधार पर बजट तैयार कर लेते हैं । किन्तु अगर संस्था बड़ी है तो यह कार्य केवल लेखापाल पर नहीं छोड़ा जा सकता। बड़ी संस्थाओं की दशा में सर्वप्रथम प्रत्येक विभाग का अध्यक्ष अपने-अपने विभाग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विभागीय बजट तैयार करता है परन्तु लेखा विभाग इस कार्य में उपर्युक्त सूचनाएं प्रदान करके विभिन्न बजटों के समन्वय में सहायता पहुंचाता है। अधिकांश दशा में प्राय: एक बजट समिति का निर्माण कर लिया जाता है जिसमें सभी विभागों के अध्यक्ष तो होते ही है, साथ ही एक कुशल व अनुभवी व्यक्ति को संचालक बना दिया जाता है जिसे बजट अधिकारी कहते हैं।

इस समिति का सबसे महत्वपूर्ण कार्य पूर्वानुमानों, विभागीय बजटों एवं सामयिक रिपोर्टों को प्राप्त करना व उनके आधार पर बदलती हुई परिस्थितियों में उठाये जाने वाले कदमों के सम्बन्ध में राय देना होता हैं। बजट अधिकारी सभी विभागों के बजट प्राप्त करके एक मास्टर बजट तैयार करता है जिसे बजट समिति के सामने पेश किया जाता है।


(6) स्पष्टतः परिभाषित व्यावसायिक नीतियां प्रत्येक बजट में व्यावसायिक नीतियों की झलक होती है अर्थात् उन्हीं के आधार पर बजट तैयार किये जाते हैं। अतः यह परमावश्यक है। कि व्यावसायिक नीतियां पूर्णतः स्पष्ट व पूर्व- निश्चित हों। प्रत्येक विभाग के अध्यक्ष को इस बात का स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए कि इन नीतियों का उनके विभाग पर क्या प्रभाव पड़ेगा, तभी वह कोई रचनात्मक सुझाव दे सकता है।


(7) सांख्यिकीय सूचना की उपलब्धि : यह भी आवश्यक है कि बजट बनाने के लिए प्रत्येक विभाग से सम्बन्धित आवश्यक सूचनाएं समंको के रूप में प्राप्त हो । उदाहरण के लिए, विक्रय बजट बनाने के लिए बिक्री का पूर्वानुमान, उत्पादन लक्ष्य, विज्ञापन व अन्य विक्रय मूल्य और अन्य सम्बन्धित तथ्यों के सम्बन्ध में आंकड़ों अवश्य प्राप्त होने चाहिए।


(8) उच्चस्तरीय प्रबन्ध की सहानुभूति: अगर किसी बजट प्रोग्राम को सफल बनाना है, तो इसमें प्रबन्ध के प्रत्येक सदस्य की सहानुभूति उच्चस्तरीय सदस्य अर्थात् अध्यक्ष महोदय से प्रारम्भ होनी चाहिए। बजट के संचालन हेतु निर्देशन व उत्सुकता शीर्ष से होनी चाहिए। प्रबन्ध के सभी स्तर पर नियुक्त व्यक्तियों में प्राकृतिक भावना होती है कि परिवर्तन के विरूद्ध होते हैं। बजट योजना के कार्यान्वन में अनेक योजनाएं निहित होती हैं जनके कारण परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इसका विरोध हो सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि बजट प्रोग्राम का उच्चस्तरीय प्रबन्ध द्वारा ही समर्थन किया गया हो।


(9) बजट की अवधि साधारणताया बजट की अवधि व्यवसाय की प्रकृति पर निर्भर करती है, फिर भी बजट की अवधि कम से कम इतनी अधिक होनी चाहिए कि सभी प्रकार की वित्तीय व उत्पादन क्रियाओं एवं मौसमी परिवर्तनों को शामिल किया जा सके। अच्छा यही होता है कि एक वर्ष या पांच साल के बजट के साथ निष्पादन के दृष्टिकोण से छमाही या माहवार बजट भी बनाये जायें।


(10) बजट का उपयोग व उसकी सीमाओं का ज्ञान : व्यावसायिक संस्था के प्रत्येक अधिकारी को चाहिए कि वह बजट के प्रयोग व उसकी सीमाओं से परिचित हो जाये। बजट के प्रयोग के अन्तर्गत यह देखना चाहिए कि बजट किस प्रकार योजना, समन्वय व नियन्त्रण की क्रियाओं में सहायता देते हैं। दूसरी तरफ प्रबन्ध को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि बजट प्रबन्ध नहीं करता है वरन् वह प्रबन्ध के लिए औजार मात्र है।