भारतीय संदर्भ में हुए नृजातीय अध्य - Ethnic Studies in the Indian Context
भारतीय संदर्भ में हुए नृजातीय अध्य - Ethnic Studies in the Indian Context
नृजातीय अध्ययन के माध्यम से किसी एक समाज के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया जाता है और समाज को संपूर्णता में देखा जाता है। नृजातीय अध्ययन के माध्यम से किसी संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को उस संस्कृति व समाज में रहने वाले सदस्यों के अनुभवों के आधार पर समझने का प्रयास किया जाता है। शोध की यह प्रविधि नारीवादी शोध के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण समझी जाती है क्योंकि इसके माध्यम से स्त्री अनुभवों को गुणात्मक रूप में समझा जा सकता है। विभिन्न समाजों व उनकी संस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन स्त्री विमर्श के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों को उजागर करता है जैसे
1. क्या स्त्रियों की स्थिति विभिन्न समाजों में एक जैसी है ? या उनमें कोई गुणात्मक अंतर भी है ?
2. जनजातीय समाजों में स्त्रियों की स्थिति अन्य समाजों से किस प्रकार भिन्न है ?
3. सामाजिक संरचना व नातेदारी व्यवस्था किस प्रकार समाज में स्त्रियों की स्थिति को प्रभावित करती है ?
4. क्या पितृसत्ता सभी समाजों में पायी जाती है ?
5. क्या कभी समाज में मातृसत्ता स्थापित हुई है ?
इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने हेतु विभिन्न? नृजातीय अध्ययन किए गए हैं। लर्नर (1986) ने अपने अध्ययन में पाया कि विश्व में मातृसत्ता का कोई ठोस प्रमाण प्राप्त नहीं है किंतु कुछ समुदायों में मातृ-वंशजता पाई जाती है। इन समुदायों में स्त्रियों की स्थिति पितृ-वंशजता वाले समुदायों से बेहतर है।
केरल का नायर समाज मातृ-वंशजता के लिए प्रसिद्ध है। किंतु सार्दमोनी (1999) ने अपने अध्ययन में पाया कि नायर समाज पर भी वर्तमान शिक्षा प्रणाली का असर है तथा वह भी अपनी संस्कृति को हेय दृष्टि से देखने लगे हैं और धीरे-धीरे पितृसत्तात्मक गुण इस मातृ-वंशज समाज में व्याप्त हो गए हैं। राव व बोदरा (2008) ने अपने अध्ययन में देखा कि आदिवासी समाजों में विधवाओं की सामाजिक स्थिति अन्य हिंदू समाजों से बेहतर है और विधवाओं से संबंधित किसी प्रकार की रूढ़ियाँ इन आदिवासी समाजों में नहीं हैं। मार्गरेट मीड ने अपनी बहु चर्चित पुस्तक "कमिंग ऑफ़ एज इन समोआ" (1928) में दर्शाया है की सामओया में रहने वाले जनजातीय समूहों में स्त्री-पुरुष संबंध अमरीका के लोगों से अधिक स्वतंत्र और बेहतर हैं। इसके फलस्वरूप यौवनावस्था में सामओया के लड़के-लड़कियों में कुंठाएँ कम देखने को मिलती हैं।
इन विषयों को नारीवाद के संदर्भ में देखें तो यह कहा जा सकता है कि स्त्री-पुरुष संबंधों में असमानता जैविक कारणों की अपेक्षा सांस्कृतिक कारणों से होती है। स्त्री और पुरुष के बीच जैविक स्तर पर अंतर स्वाभाविक और सामान्य है परंतु उस अंतर को रूढ़ियों में बदलने का कार्य सामाजिक व सांस्कृतिक कारणों द्वारा किया जाता है।
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