प्रबन्धकीय लेखा-विधि का विकास - Evolution of Management Accounting

प्रबन्धकीय लेखा-विधि का विकास - Evolution of Management Accounting


प्रारम्भ में लेखा - विधि का कार्य-क्षेत्र लेन-देनों के अभिलेखन तथा वित्तीय स्थिति और आय के आवधिक सारांश (अर्थात् चिट्ठा व लाभ-हानि खाता) के तैयार करने पर सीमित था । यद्यपि यह सारांश पर्याप्त उपयोगी होता है, व्यवसाय के बाह्य पक्ष इससे महत्वपूर्ण सूचनायें प्राप्त करते हैं किन्तु इससे भावी क्रियाओं के नियोजन और चालू क्रियाओं को निर्देशित और नियंत्रित करने में कोई सहायता नहीं मिलती है।


वैज्ञानिक प्रबन्ध आन्दोलन ने व्यवसाय के प्रशासन व कार्यवाहियों में प्रबन्धकों के मार्गदर्शन के लिए विश्वसनीय परिणामात्मक लेखा-समकों की सुविस्तृत मांग जागृत कर दी जिससे बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में लेखा विधि का पुराना स्वरूप अपर्याप्त सिद्ध हो गया।

समय व परिस्थितियों की मांग ने लेखपाल के दृष्टिकोण की विस्तृत बना दिया तथा लेखा-विधि में भूतकालीन घटनाओं के अभिलेखन के साथ-साथ वर्तमान और भावी घटनाओं को भी सम्मिलित किया जाने लगा और इस प्रकार लेखा-विधि के क्रमिक विकास से आज यह आधुनिक प्रबन्ध प्रौद्योगिकी का एक अभिन्न अंग बन गयी है।


इस प्रकार यद्यपि नियन्त्रणीय कार्य (controllership function), वित्तीय नियन्त्रण, क्रियात्मक शोध (operational research) प्रबन्ध सेवाये, प्रणाली कार्य-पद्धतियाँ और कार्य-विधि, उत्पादन नियोजन और प्रबन्ध से सम्बन्धित अन्य पद्धतियों के सम्बन्ध में पहले भी पर्याप्त सुना गया था ।


प्रबन्धकीय लेखा-विधि के विकास की प्रक्रिया लागत लेखा विधि में प्रमाप परिव्ययन" (Standard Costing) के समावेश से प्रारम्भ होती है। इस तकनीक के समावेश से प्रत्येक निरीक्षक को पूर्व-निर्धारित प्रमाणित परिव्ययों के सम्बन्ध में उसके वर्तमान निष्पादनों से अवगत कराया जाता है तथा संस्था में लागत नियन्त्रण को पुष्ट बनाया जाता है। इसी तरह बजटन तकनीक के विकास से भावी वित्तीय नियोजन के उसी विचार को चुनी गयी समयावधि में सभी क्रियाओं को सम्मिलित करने के लिए विस्तृत किया गया। इस तकनीक के समावेश से प्रबन्ध अपनी परिचालन योजनाओं (Operating Plans) के प्रत्याशित परिणामों का पूर्वानुमान भी लगा सकता है तथा परिणामों को सुधारने के लिये वह इन योजनाओं में परिवर्तन भी ला सकता है।


ऐतिहासिक प्रतिवेदनों में लेखापाल का सम्बन्ध केवल उन्हीं घटनाओं से होता है

जो कि हो चुकी हैं। किन्तु प्रबन्ध - नियोजन में मार्ग-दर्शन के लिये समंक विकसित करने में लेखापाल को समस्त सम्भावित विकल्पों पर विचार करना चाहिये जिससे प्रबन्ध सर्वोत्तम विकल्प का चयन कर सके। चूंकि व्यावसायिक व औद्योगिक संस्थाओं में कार्यकरण का स्तर या उत्पादन - मात्रा सामान्यतया एक महत्वपूर्ण स्वतन्त्र कारक होता है, अतः लागत, मात्रा और लाभ के बीच कार्यात्मक सम्बन्धों के मापन के लिये सम-विच्छेद विश्लेषण', 'लाभ- मात्रा विश्लेषण आदि तकनीकों का व्यापक विकास किया गया है। लागत मात्रा लाभ सम्बन्धों के सतत् और क्रमबद्ध विश्लेषण के लिये लोचदार बजटन और सीमान्त परिव्यय की तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। इन तकनीकों के द्वारा उत्पादन मात्रा के अतिरिक्त लागत कारकों के मूल्यों, उत्पादन पद्धतियों, उत्पाद मिश्रण और विक्रय मूल्य आदि कारकों में परिवर्तनों का लागत और आय पर पड़ने वालों प्रभावों का मूल्यांकन किया जाता है तथा सर्वोत्तम कार्य स्तर ज्ञात किया जाता है। इसे लाभ-नियोजन की तकनीक की सज्ञा दी जाती है। किसी प्रस्तावित योजना की स्वीकार्यता पर प्रबन्धकीय निर्णय के लिये 'विनियोजित पूजी पर प्रत्याय की दर, विक्रय मात्रा तथा बाजार भाग के आधारों का प्रयोग किया जाता है। इसी तरह पूंजीगत परियोजनाओं की तुलनात्मक वांछनीयता पर निर्णय के लिए अदायगी अवधि', असमायोजित प्रत्याय, समय समायोजित प्रत्याय आदि को आधार बनाया जाता है।