स्त्रीवादी दृष्टिकोण से शिक्षा के अवसरों की असमानता की व्याख्या - Explanation of inequality of education opportunities from feminist point of view
स्त्रीवादी दृष्टिकोण से शिक्षा के अवसरों की असमानता की व्याख्या - Explanation of inequality of education opportunities from feminist point of view
पिछले दो दशकों में महिला साक्षरता दर में वृद्धि राष्ट्रीय विकास के सूचक के रूप में दर्ज होती रहीं हैं। इस लिहाज से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों में लड़कियों के ज्यादा-से-ज्यादा दाखिले सुनिश्चित करना और लगातार उनकी शिक्षा जारी रखना शिक्षा नियोजन का एक बुनियादी लक्ष्य बन गया है। महिला साक्षरता व पढ़ाई जारी रखने तथा प्रजनन दर में गिरावट, इन दोनों सूचकों के बीच जो सकारात्मक सह-संबंध जोड़ा जाता है उससे भी महिला शिक्षा की माँग को बल मिला है। खासकर भारी आबादी वाले भारत जैसे देश के लिए विकास और शिक्षा से जुड़ी नीतियों को तय करने में इस तथ्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। चाहे सरकारी संस्थाएँ हों या गैर-सरकारी संस्थाएँ, सभी का जोर इसी पर है। उदाहरण के तौर पर, भारत सरकार द्वारा संचालित सर्व शिक्षा अभियान का आरंभिक वर्षों में लक्ष्य स्कूली शिक्षा से वंचित पाँच करोड़ नब्बे लाख बच्चों को स्कूल में दाखिल कराना था ।
इसमें लगभग साढ़े तीन करोड़ लड़कियाँ थीं। आज की तारीख में दाखिला अभियान और स्कूली ढाँचों के विस्तार के जरिए सर्व शिक्षा अभियान 98% बच्चों को स्कूली शिक्षा से जोड़ पाने में सफल हुआ है। वह जेंडर आधारित अंतर भी उल्लेखनीय रूप से कम हुआ है जिस पर सर्व शिक्षा अभियान का विशेष जोर था । इस पूरे विमर्श में अंतर्निहित मान्यता यह रही है कि अगर लड़कियों के स्कूल में लड़कियों को दाखिल कराया जाता है और वे लगातार स्कूल में पढ़ती रहे तो इससे स्वहमेव उनका सशक्तीकरण हो जाएगा। स्कूली शिक्षा उनके लिए जीवन के विभिन्न मोड़ों पर विकल्प मुहैया कराएंगी और उनका अपनी ज़िंदगी के फैसलों पर ज्यादा नियंत्रण होगा। इसमें दो राय नहीं कि स्कूली शिक्षा अपार असीम संभावनाओं का द्वार खोलती हैं, लेकिन शिक्षा जादुई ढंग से हमेशा लड़कियों की नई भूमिकाओं के लिए तैयार नहीं कर पाती। दूसरे संस्थानों की तरह स्कूली शिक्षा भी स्थापित सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों और कायदों की पुनर्रचना करती रहती है। इस तरह मौजूदा सत्ता संबंधों को यह बरक़रार रखती है। इससे जाहिर होता है
कि शैक्षिक कार्यक्रमों के लक्ष्यों में ज़रूरी नहीं कि एक लक्ष्य के रूप में सशक्तीकरण मौजूद ही हो । इसलिए लड़कियों और स्त्रियों की शिक्षा पर बात करते हुए पहले यह देखना महत्वपूर्ण है कि यह अपने केंद्र बिंदु में किन लक्ष्यों और नतीजों को समेटे हुए है।
निस्संदेह अस्सी के दशक की सरकारी नीतियों से लेकर शिक्षा की हाल-फिलहाल की बहसों एवं अध्ययनों में जेंडर की प्रमुखता रही है। लेकिन यह मुख्य रूप से संख्यात्मक कारकों के दायरे में ही सीमित रही है। शायद संख्यात्मक बढ़ोत्तरी को ठोस रूप में नापा-जोखा जा सकता है, इस दृष्टि से इस पर फोकस करना आसान भी है। चूँकि महिला साक्षरता के बेहतर आँकड़े विकसित देशों की सूची में शामिल होने के लिए निर्धारक तत्व होते हैं,
इसलिए लड़कियों एवं स्त्रियों की शिक्षा का उद्देश्य उपकरणवादी सोच से भी प्रभावित होता है। ऐसी स्थिति में उनकी शिक्षा दूसरे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने का महज साधन बन जाती हैं। शिक्षा की प्रक्रियाओं में समता के मुद्दे को हम किस तरह से समझते हैं, यह बात चर्चा का विषय कम बन पाती है। जेंडर की बातें, जेंडर भेदभाव दूर करने के मकसद से लड़कियों व स्त्रियों की रूढ़ छवियों को दूर करने और उन्हें समान मौके उपलब्ध कराने तक सीमित रह जाती है इन सबका एक बड़ा कारण है जेंडर को समझने का अराजनीतिक दृष्टिकोण जब तक जेंडर के इस आयाम को नहीं देखा जाएगा, सशक्तीकरण को लड़कियों एवं स्त्रियों की शिक्षा के लक्ष्य के रूप में स्थापित करना मुश्किल होगा। इसलिए शिक्षा के विमर्श में जेंडर को बुनियादी तौर पर समानता तथा समता के मुद्दों से जोड़कर देखना ज़रूरी है।
स्कूल के भीतर क्या हो रहा है, कक्षा में किस तरह से और क्या पढ़ाया जा रहा है, 'शिक्षित लड़के / शिक्षित लड़की' का क्या आदर्श गढ़ा जा रहा है, शिक्षक का रवैया क्या है
और सीखने वाली बच्ची उसे किस रूप में ग्रहण करती है, शिक्षक/शिक्षिका के अपनी जेंडर, वर्ग या जाति से जुड़ी पहचान के क्या अनुभव रहे हैं- इन पर प्रायः न तो नज़र रहती है और न ही इन पर कोई सवाल खड़े किए जाते हैं। 'स्त्रीत्व' और 'पुरुषत्व' को गढ़ने में स्कूली शिक्षा की भूमिका को लेकर शायद ही कभी शोध हुआ होगा।
अभी तक शिक्षा की विषय वस्तु क्या है और अलग-अलग पृष्ठभूमि की स्त्रियों के जीवन पर शिक्षा का क्या प्रभाव पड़ा है, ज्ञान क्या है, ज्ञान का निर्माण कौन करता है, किसके द्वारा किया गया ज्ञान निर्माण मुख्यधरा का हिस्सा बनता है- ये सब पहलू लगभग अछूते रहे हैं। इसलिए हमें यह ज़रूरत महसूस हुई कि स्त्रीवादी दृष्टिकोण से इन सब पहलुओं को समझने की कोशिश की जाए। स्त्रीवाद वह विचारधारा है
जो स्त्रियों के खिलाफ होने वाले मौजूदा भेदभावों को पहचानती है और न्यायपूर्ण मानवीय, सामाजिक व्यवस्था की रचना करने की दिशा में काम करती है। यह आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सभी मुद्दों पर अपना दृष्टिकोण विकसित करता है । स्त्रीवादी दृष्टि बिंदु ने सार्वजनिक व निजी, संस्कृति, घरेलूपन, श्रम, नागरिकता और यौनिकता आदि बुनियादी अवधारणाओं की व्याख्या की है और बहुत जगह उन्हें चुनौती दी है। स्त्रीवादी सिद्धांत इन अवधारणाओं पर नए तरीके से सोचने की ज़रूरत को भी सामने लेकर आए हैं। इसलिए शैक्षिक विमर्श के सार्वजनिक तर्क-विमर्शों में जेंडर को प्रतिष्ठित कराने के प्रयास में स्त्रीवादी दृष्टि बिंदु को सामने रखना आवश्यक है।
आमतौर पर जहाँ बाल शिक्षा की बात होती है, वहाँ वयस्क शिक्षा या फिर महिला शिक्षा की बात नदारद होती है। असल में शिक्षा को औपचारिक-अनौपचारिक, प्राथमिक उच्च शिक्षा तथा सरकारी-गैरसरकारी के बीच बाँटकर सीमाबद्ध कर दिया गया है।
इस विखंडन के दूरगामी परिणाम निकले हैं। दोनों क्षेत्र इतने अलग-थलग पड़ गए हैं कि वे एक-दूसरे के परिवेश में होने वाले स्वाभाविक बदलावों से अनजान रहते हैं। इन परिवर्तनों से पैदा हुई आवश्यकताओं से भी वे अनभिज्ञ रहते हैं। कभी कभी दोनों के बीच होड़ भी लगी रहती है। इसका नतीजा यह है कि जेंडर संवेदनशीलता के नाम पर स्कूली शिक्षा या पाठ्यपुस्तकों में जो परिवर्तन पिछले दिनों किए गए हैं, वे संकीर्ण तरीके से जेंडर व शिक्षा को समीप लाती है। उदाहरणार्थ पिछले दिनों स्कूली पाठ्यपुस्तकों में लड़कियों की सकारात्मक छवियों की संख्या बढ़ी है। लेकिन स्त्रियाँ पहले की तरह घर और बच्चों को संभालने की पारंपरिक भूमिका में ही दर्शाई जाती हैं। स्थिति यह है कि लड़की के लिए तो आदर्श बचपन की छवि गढ़ ली गई है, लेकिन वयस्क महिला के बारे में न के बराबर सोचा गया है। ये पाठ्यपुस्तकें सबूत हैं कि विकास के राष्ट्रीय लक्ष्य प्राप्त करने और जनसंख्या नियंत्रण के लिए स्त्री शिक्षा की आवश्यकता तो है
परंतु उत्पादक एवं श्रमिक के रूप में उनकी आर्थिक भूमिका को हमेशा की तरह अनदेखा किया जाता है। लड़कियों और स्त्रियों की शिक्षा के गहरे रूप से प्रभावित करने वाले मुद्दों जैसे निर्धनता, परंपरा का निर्वाह, आधुनिकता, श्रम का बँटवारा आदि को स्कूली शिक्षा की विषय-वस्तु और पूरे ढाँचे में कोई जगह नहीं मिलती। यह सत्य है कि स्त्री अध्ययन का रिश्ता पिछले चार दशकों में महिला आंदोलन से रहा है और महिला आंदोलन के चिंतन एवं कार्यक्षेत्रों से भी वह प्रभावित रहा है। फिर भी स्त्री अध्ययन के लिए वयस्क महिला शिक्षा की कोई अहमियत नहीं रही है। इसका कारण यह है कि वहाँ न तो वह तात्कालिकता है जो महिला आंदोलन के अधिकार उल्लंघनों के मामले में होती है और न ही वह महिला समूहों या आंदोलनों के हस्तक्षेप का क्षेत्र है। इस क्षेत्र में यदि कभी-कभी कुछ हस्तक्षेप हुए भी हैं तो उनसे संबंधित मामलों में ज्ञान निर्माण को प्राथमिकता नहीं दी गई है। दुर्भाग्यवश सार्वजनिक क्षेत्र में वयस्क महिला शिक्षा से जुड़े मुद्दे बहस का विषय नहीं बन पाए हैं। वयस्क महिला शिक्षा में साक्षरता तक स्त्रियों की पहुँच का सवाल ही शिक्षा में जेंडर का सबसे बड़ा सरोकार बन जाता है ।
इस सरोकार में समाजीकरण, समावेशीकरण अथवा बहिष्करण आदि प्रक्रियाओं की बहुत कम समझ होती है। जब हम स्त्रियों के शिक्षा प्राप्त करने के प्रयासों को उनकी सामाजिक परिस्थिति के संदर्भ में समझते हैं, तभी हम जेंडर के साथ समता के प्रश्नों को भी बेहतर तरीके से समझ पाते हैं।
जब ज्ञान का सृजन करने वाले वे लोग होते हैं जो सत्ता में नहीं हैं यानी जब वे राजा, पुरोहित, अमीर, सवर्ण पुरुष, साम्राज्यवादी आदि नहीं होते हैं तो क्या होता है? जब लिखने वाली कलम ऐसे ताकतवर लोगों के हाथों में नहीं, बल्कि स्त्रीवादी लेखिकाओं व इतिहासकारों के माध्यम से मुस्लिम औरतों, दलित मर्दों या आदिवासी महिलाओं के हाथ में दिखाई देती है तो हमें एक अलग आवाज सुनाई पड़ती है
या हमें पढ़ने की एक नई शैली के दर्शन होते हैं। यही नहीं ज्ञान की विषय-वस्तु भी उस ज्ञान के रचनाकारों के अनुभवों से निर्धारित होने लगती है। इससे समाज में सत्ता के कार्य-व्यापार को समझने में भी मदद मिलती है। साहित्य में संकलित बहुत सारी रचनाएँ अपनी तीखी समालोचना या चीज़ों को बकायदा सर के बल खड़ा करके न केवल देखने का नया नजरिया प्रस्तुत करती हैं, बल्कि इस बात को भी उजागर करती हैं कि समूचा ज्ञान कहीं-न-कहीं अवस्थित है, वह निरपेक्ष नहीं होता। आर्थिक और सामाजिक संरचनाएँ अपनी सारी ताकत को वर्चस्वकारी ज्ञान को सींचने में क्यों लगा देती हैं और वे जानने के अन्य तरीकों को क्यों ओझल कर देती हैं। हाशियाकरण के किसी अनुभव से गुजरने और उसकी आलोचनात्मक समझदारी विकसित करने के बाद उस ज्ञान को एकदम पलट देने और नए सिरे से देखने की गुंजाईश बनती है। स्त्रीवादी शिक्षाविदों के लिए यह शिक्षाशास्त्र और इसके द्वारा की गई सत्ता व सामाजिक ढाँचों की व्याख्या तथा शिक्षा के अपने अनुभवों को केंद्र में रखकर अपने जीवन के यथार्थ को देखना बहुत महत्वपूर्ण रहा है। यह स्त्रियों के सिद्धांतों और शिक्षा पद्धतियों के निर्धारण में भी बहुत उपयोगी रहा है। दरअसल ज्ञान के हस्तांतरण की प्रक्रिया काफी जटिल है और इसमें बहस के कई बिंदु हैं । इस प्रक्रिया में बहुत साधारण कृत्यों के जरिए सत्ता सामने आती है। जैसे- कक्षा के भीतर कौन-से शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है और कौन से शब्दों को छोड़ा जा रहा है, इससे भी सत्ता तय होती है। जो लोग समुदायों के बीच काम कर रहे हैं, उनको न केवल इस बात से अवगत होना चाहिए कि ज्ञान के प्रभुत्वशाली रूपों तक पहुँच के जरिए वे किस तरह सत्ता का प्रयोग करते हैं, बल्कि उन्हें इस बारे में भी सचेत रहना चाहिए कि हाशिए पर खड़े लोगों के ज्ञान को किन तरीकों या प्रक्रियाओं से वैधता दी जा सकती है।
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