रोकड शेष को निर्धारण करने वाल्व तत्व: - Factors determining Cash balances
रोकड शेष को निर्धारण करने वाल्व तत्व: - Factors determining Cash balances
किसी उपक्रम में कितना नकद-कोष रखा जाये इसका उत्तर देना अति कठिन है।
प्रायः नकद-कोषो के आकार पर निम्न तत्वों का निर्णायक प्रभाव पड़ता है -
(1) व्यापारिक साख की उपलब्धता (Availabitliy of Trade Credit) - यदि कोई व्यापारिक फर्म किसी लाइन में काफी समय से काम कर रही है और बाजार में उसकी ख्याति काफी अच्छी है तो उसको आसानी से व्यापारिक साख उपलब्ध होगी। व्यापारिक साख की आसानी से उपलब्धि नकदी की कम आवश्यकता पर बल देती है। इसके विपरीत जिन फर्मों को साख की सुविधा नहीं मिलती उन्हें अधिक नकद - कोष रखने होंगे। यही कारण है कि व्यवसाय की स्थापना के प्रारम्भिक वर्षों में अधिक नकद-कोषों की आवश्यकता होती है और ज्यों-ज्यों व्यापार विकसित होता है उसकी आवश्यकता कम होती जाती है।
(2) प्राप्त - विपत्रों की स्थिति (Position of Account Receivables) – यदि फर्म को अपने प्राप्य बिलों का भुगतान समय पर बिना किसी बाधा के मिलता रहता है तो वह फर्म कम नकद कोष से भी काम चला सकती है।
(3) व्यवसाय की प्रकृति (Nature of Business) विभिन्न उद्योगों की प्रकृति के अनुसार भी कुल सम्पत्तियों की तुलना में तरल कोषों का अनुपात न्यूनाधिक होता है। फिर भी कुल सम्पत्तियों की तुलना में तरल कोषों का अनुपात अधिकांश व्यवसायों में पाँच से दस प्रतिशत की बीच रहता है। किसी भी उपक्रम विशेष में नकद कोषों और उनका कुल सम्पत्तियों से अनुपात आदि के विषय में प्रबन्धकों द्वारा उचित नीति का निर्धारण विगत अनुभव एवं प्रचलित परम्परा के साथ-साथ बहुत कुछ अपने अन्तर्ज्ञानि के आधार पर भी किया जाता है।
(4) स्टॉक रखने की स्थिति (Investment position in Inventories ) यदि व्यवसाय इस प्रकार का है कि जिसमें कच्चे माल का स्टॉक एवं तैयार माल (finished goods) का स्टॉक अधिक मात्रा में रखा जाता है तो नकद-कोषों की अधिक आवश्यकता पड़ेगी। इसके विपरीत इसकी उल्टी स्थिति होगी।
(5) माल की माँग - प्रकृति (Nature of Product's Demand) किसी व्यापारिक फर्म द्वारा यदि ऐसे चतुस्यें बेची जाती हैं जिनकी मनुष्य को प्रतिदिन आवश्यकता पड़ती है एवं वह प्राय: लगातार खरीदता रहता है तो ऐसी स्थिति में अधिक नकद-कोषों की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। क्योंकि इसके क्रय-विक्रय में रोकड़ का प्रवाह नियमित रूप से होता रहता है। इसके विपरीत पूजीगत वस्तुओं के उत्पादकों को अधिक रोकड़ शेषों की आवश्यकता पड़ती है।
(6) नकदी के अन्तर्वाहों की स्थिति (Cash Inflow Determined by Cash Budget) = नकदी- बजट का निर्माण उन सभी सम्भावनाओं पर प्रकाश डालता है जिनके द्वारा फर्म में नकदी का प्रवेश होता है। किस-किस तिथि को कितनी मात्रा में धन का आगमन होगा, यह रोकड़ बजट द्वारा निर्धारित होता है और इससे नकदी-कोषों की आवश्यकताओं का समुचित निर्धारिण किया जा सकता है। यदि आवश्यकता के समय ही रोकड़ का अन्तर्वाह होना है तो कम रोकड शेषों से ही काम चल जायेगा।
(7) भुगतान पद्धति ( Payment Policy) फर्म द्वारा अपने ऋणों का भुगतान करने की विधि, उनकी मात्रा एवं भुगतान विधि भी नकद-कोषों के स्तर को बहुत अधिक सीमा तक निर्धारित करते हैं।
(8) उधार लेने की शक्ति (Borrowing Capacity) यह व्यापारिक संस्था जो आकस्मिक स्थितियों में अधिक उधार लेने की स्थिति में है, अपने पास कम नकद-कोषों को रख सकती है। इसके विपरीत स्थिति में फर्म को अपने पास ही अधिक नकदी- कोषों की व्यवस्था करनी होगी।
(9) नकदी- कोषों का कुशल प्रबन्ध (Management of Cash) वह सस्था जो अपने नकदी कोषों का अधिक कुशलता पूर्वक प्रबन्ध कर सकती है उसे कम ही नकद-कोषों की आवश्यकता पड़ती है। अगर प्रबन्ध प्रत्येक रूपये का गहन उपयोग करता है तो कम रोकड़ से भी काम चल सकता है और यदि इतनी गहनता से काम नहीं करता है तो अधिक कोषों की आवश्यकता पड़ेगी।
(10) बैंकों से सम्बन्ध (Relations with Banks) नकदी के रखे जाने वाले शेषों का स्तर पर्याप्त मात्रा में इस बात पर निर्भर करता है कि फर्म के व्यापारिक बैंकों से कैसे सम्बन्ध है ? फर्म किस सीमा तक इस सुविधा का लाभ उठाना चाहती है या उठाती है ? बैंक उसे किस सीमा तक नकद साख (cash credit) और अधिविकर्ष (Overdraft) की सुविधा प्रदान करते हैं ? यदि बैंक से अगले वित्त वर्ष के लिए खड़ी - साख ( credit-line) का अनुबन्ध कर लिया जाता है तो प्रबन्धक निश्चित रह कर कम नकद-कोषों से भी व्यापार कर सकते हैं। ऐसी वचनबद्धता के बदले बैंक कुछ 'वायदा शुल्क (commitment charge) लेते हैं जो ब्याज की तुलना में कम ही होता है।
(11) रोकड वसूली नीति (Cash collection policy) – यदि फर्म अपने देनदारों से कुशलता तथा शीघ्रता के साथ वसूली करती है तो उसके फलस्वरूप कम रोकड़ भूमि की आवश्यकता होगी।
इसके विपरीत जब वह रोकड की वसूली की उदार नीति अपनाती है और कुशलता के साथ वसूली नहीं करती तो अधिक रोकड़ शेष की आवश्यकता होगी।
(12) क्रय-विक्रय की शर्तें (Term of purchase and sale) माल का क्रय या विक्रय फर्म किन शर्तों पर करती है, उसका भी प्रभाव रोकड शेष पर पड़ता है। यदि फर्म अपना माल उधार बेचने की नीति अपनाती है तो अधिक रोकड़ की आवश्यकता होगी। उसी प्रकार, यदि फर्म उधार क्रय की अपेक्षाकृत नकद क्रय की नीति अपनाती है तो अधिक शेष की आवश्यकता होगी। इसके विपरीत यदि फर्म नकद विक्रय और उधार क्रय करती है तो कम रोकड़ शेष की आवश्यकता रहेगी।
( 13 ) व्यापार का आकार (Size of trade) - छोटे पैमाने पर व्यापार करने वाली फर्म में कम रोकड़ की आवश्यकता होती है, जबकि एक बड़े आकार की फर्म को अधिक मात्रा में रोकड़ शेष बनाकर रखना होगा।
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