परिवार , पालन शैली - family, parenting style
परिवार , पालन शैली - family, parenting style
पालन शैली
सभी मानवीय संबंधों में बच्चे और माता-पिता के बीच का संबंध अनोखा होता है। ऐसे संबंधों में माता-पिता की विशेष भूमिका होती है क्योंकि शिशु अपने जीवन के लिए माता-पिता पर पूर्ण रूप से निर्भर करता है। बच्चे का परिवेश, उसके माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्य मिलकर जो बातावरण बनाते हैं, उससे निर्मित होता है। अपने बच्चे के साथ पालन शैली का तात्पर्य उस पद्धति से है जिससे माता-पिता तथा अन्य सदस्य उसकी देखभाल करते हैं, और उसके साथ अंतः क्रिया करते हैं। यह सभी क्षेत्रों में बच्चे की बुद्धि एवं विकास को प्रभावित करता है।
माता-पिता अपने बर्चा के विकास के परिवेश को किस तरह गढ़ते हैं, यह बहुत सीमा तक पालन-शैली (या बच्चों की देखभाल की प्रक्रिया) पर निर्भर करता है। आप दो परिवारों के बीच, दो भिन्न-भिन्न समुदायों के बीच तथा दो भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के बीच बच्चों के लालन-पालन की प्रक्रिया में अंतर पाएंगे। कारण यह है कि विभिन्न संदर्भों में बच्चों से क्या व्यवहार अपेक्षित है यह अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए पश्चिमी (यूरोपीय) समाज में बच्चों में अधिकांशतः स्वतंत्रता, स्वायत्तता और खुली अभिव्यक्ति के विकास पर बल दिया जाता है दूसरी और भारतीय समाज में आजापालन, दूसरों की देखभाल तथा परिवार या समाज के लिए अपनी निजी इच्छाओं और रुचियों के त्याग पर बल दिया जाता है।
माता-पिता अपने अनुशासन लागू करने के तरीके से एकदूसरे से अलग हो सकते हैं, प्रोत्साहन एवं दंड के लिए उचित व्यवहार के चयन में अपनी शिक्षण शैली (जैसे- किसी विशेष कार्य को करने हेतु बच्चों को आदेश देना या उसके समर्थन में तर्क रखना), तथा बच्चों के प्रति स्नेह प्रदर्शन इत्यादि में भी भिन्नता पाई जाती है। अध्ययनों से निम्नांकित चार तरह की मुख्य पालन शैलियों का परिचय मिलता है।
सत्तावादी- निरंकुश (Authoritarian & Autocratic ) इस शैली में माता-पिता अपने बच्चों पर कड़ा नियंत्रण रखते हैं तथा बच्चों को अपने विचारों को स्वतंत्रतापूर्वक या खुलकर व्यक्त करने की अनुमति नहीं होती। बच्चों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी इच्छाओं को प्रकट न करें। यहां माता-पिता का अधिकार और अनुशासन ही सर्वोच्च होता है। जब बच्चे अपने पालनकर्ता या अभिभावक के विचारों से विमुख होते हैं तब उन्हें कड़ी सजा (यहाँ तक कि शारीरिक दंड) दी जाती है। इस शैली द्वारा जिन बच्चों का पालन-पोषण होता है उनमें सामाजिक योग्यताओं की कमी होती है। ऐसे बच्चों में समस्याओं से पीछे हटने की प्रवृत्ति सामाजिक पहल लेने का अभाव तथा सहजता की कमी होती है। वे सदैव अपने निर्णय लेने के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं कि कौन-सा व्यवहार उचित है? ऐसे बच्चों में सामान्यतः बौद्धिक निष्पादन के लिए प्रेरणा की कमी होती है।
उदार अनुज्ञापक (Indulgent-Permissive) - इस शैली को अपनाने वाले माता-पिता सहनशील तथा धैर्य की प्रवृत्ति वाले होते हैं बच्चों को दंड नहीं देते, आधिकारिक व्यवहार अथवा विचारों को नहीं थोपते, बच्चों पर परिपक्व व्यवहार के लिए दबाव नहीं डालते तथा बच्चों को निर्णय लेने की छूट देते हैं।
पालन की इस शैली के कई नकारात्मक परिणाम होते हैं। ऐसे बच्चे आक्रामक, स्वतंत्र निर्णय लेने में अक्षम तथा उत्तरदायित्वों से दूर भागने वाले होते हैं।
आधिकारिक-पारस्परिक(Authoritative & Reciprocal) - इस शैली में पालन प्रक्रिया की दोनों शैलियों के अवयवों को अपनाया जाता है। वे व्यवहार के स्पष्ट मानक तय करते हैं और उन्हें लागू करने के लिए बच्चों पर आवश्यकतानुसार अंकुश लगाते हैं। साथ ही माता-पिता अपने बच्चों में स्वतंत्रता एवं स्वायत्तता को बढ़ावा देते हैं। उन बच्चों से किसी समस्यामूलक विषय पर खुलकर विचार-विमर्श करते हैं तथा सहमति की ओर आगे बढ़ते हैं। इस शैली में माता-पिता तथा बच्चों, दोनों के अधिकारों को स्वीकार किया जाता है। यह पालन शैली बच्चों के संज्ञानात्मक विकास और क्रियाशीलता दोनों को बढ़ावा देती है। साथ ही सामाजिक उत्तरदायित्व को निभाने तथा आक्रामकता को नियंत्रित करने की क्षमता, आत्मविश्वास तथा अपने प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय लेने की क्षमता आदि को विकसित करने में मदद करती है।
तटस्थ असम्बन्ध (Indifferent Uninvolved) - कुछ माता-पिता अपने आप को माता-पिता की भूमिका में स्वीकार ही नहीं करते। वे अपने बच्चों के प्रति कठोर, असहयोगी तथा नकारात्मक या उपेक्षात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। माता-पिता के बीच भी संबाद प्रायः कम ही होता है। माता-पिता द्वारा प्रयुक्त इस शैली में बच्चों का विकास सीमित होता है। माता-पिता के ये व्यवहार बच्चों को सामाजिक रूप से स्वच्छंद और आक्रामक बना देते हैं। अतः माता-पिता के द्वारा अपनायी गई पालन-पोषण की शैली बच्चों के सामान्य तथा सांवेगिक विकास को विशेष रूप से प्रभावित करती है।
बच्चों के सहोदर भाई या बहन भी उसके विकास को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सहोदर भाई या बहन बच्चे की समस्याओं को समझने में सक्षम होते हैं तथा मातापिता की अपेक्षा वे शिशु के साथ संबाद करने में अधिक सहमत होते हैं। अग्रज सहोदर भाई-बहन उचित देखभाल करने वाले की भूमिका में भी होते हैं। जन्म लेने वाला प्रथम शिशु अपने माता-पिता के विशेष ध्यान का पात्र होता है तथा उस शिशु (बालक या बालिका) से माता-पिता को ऊँची अपेक्षा रहती है। माता पिता उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा करते हैं और उच्च उपलब्धि के लिए उस पर ज्यादा दबाव डालते हैं। बड़े सहोदर भाई या बहन से यह अपेक्षा की जाती है कि अपने से छोटे सहोदर भाई या बहन के साथ संयमित व्यवहार तथा उत्तरदायित्वपूर्ण संवाद बनाएँ। सामान्यतः पाया गया है कि जन्म क्रम में पहले और बाद वाले बच्चों की विशेषताएं भिन्न-भिन्न होती हैं। अपने छोटे सहोदर भाई या बहन की अपेक्षा पहले जन्म लेने वाला सहोदर (अग्रज सहोदर) संयमी, सहयोगी, परिपक्व, चिंतित तथा सामाजिक मानकों का पालन करने वाला होता है।
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