परिवार - Family

परिवार - Family


प्रत्येक समाज में परिवार का स्वरूप एक समान नहीं होता है। यह समाज के सांस्कृतिक मूल्यों पर निर्भर करता है कि उस समाज में परिवार किस प्रकार के होंगे। मानवशास्त्रियों एवं समाजशास्त्रियों ने विभिन्न आधारों पर परिवार के प्रकारों की विवेचना की है, जैसे-सत्ता, वंश -नाम, निवास, उत्तराधिकार तथा वैवाहिक रचना एवं गठन के आधार पर। यहाँ हम आदिवासी समुदायों में स्त्री की दशा को समझने के लिए केवल सत्ता और वंश नाम के आधार पर गठित परिवारों की विवेचना करेंगे, क्योंकि अन्य प्रकार के परिवार किसी न किसी तरह इनके अंतर्गत रखे जा सकते हैं।


सत्ता और वंश नाम के आधार पर परिवार को क्रमशः पितृसत्तात्मक एवं मातृसत्तात्मक तथा पितृवंशीय एवं मातृवंशीय परिवारों में बाँटा जा सकता है।


पितृसत्तात्मक परिवार का मुखिया पिता या घर का सबसे बड़ा पुरुष सदस्य होता है। परिवार की सत्ता उसी के हाथ में होती है। इस व्यवस्था में परिवार का परिचय पिता के वंश के आधार पर होता है

इसलिए ये पितृवंशीय भी होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बच्चों का परिचय पिता के वंश के आधार पर होता है और वे अपने पिता के ही उपनाम को ग्रहण करते हैं। बच्चों में भी लड़कों का वंश-परिचय जीवनपर्यंत पिता के वंश के आधार पर ही होता है जबकि लड़कियाँ विवाह के उपरांत पिता के बजाए पति का उपनाम ग्रहण कर लेती हैं। इस व्यवस्था में विवाह के उपरांत लड़की अपने पिता का घर छोड़ कर अपने पति के घर आकर रहने लगती है, अतः यह परिवार पितृस्थानिक भी होता है। इस प्रकार की पारिवारिक व्यवस्था में संपत्ति के उत्तराधिकारी भी पुत्र ही होते हैं। अनेक समाजों में मुखिया या ग्राम प्रधान का पद पिता की मृत्यु के बाद स्वतः ही उसके पुत्र को प्राप्त हो जाता है। धार्मिक कृत्यों और संस्कारों को करने का विशेषाधिकार भी पिता एवं पुत्रों को ही होता है। परिवार और समाज में लड़कियों की तुलना में लड़कों की स्थिति ऊँची होती है। भारत के ज्यादातर आदिवासी समूहों में इसी प्रकार के परिवार पाए जाते हैं। गद्दी, भील, भोटिया, टोडा, खस, गोंड, ओरॉव, संथाल आदि आदिवासी समुदायों में इसी व्यवस्था का प्रचलन है।


दूसरी तरफ, मातृवंशीय परिवार में बच्चो का वंश परिचय उनके माता के वंश के आधार पर होता है।

ऐसे परिवारों में संपत्ति पर अधिकार पिता का न हो कर माता का होता है तथा पारिवारिक संपत्ति की उत्तराधिकारिणी पुत्रियां होती हैं। ऐसी व्यवस्था में विवाहोपरांत पत्नी अपने पति के घर नहीं जाती। वह अपने ही घर रहती है और पति उसके घर जाकर पत्नी के परिवार का ही एक सदस्य बन जाता है या फिर समय समय पर उससे मिलने आता रहता है। इसलिए ये परिवार मातृस्थानिक भी कहे जाते हैं। ऐसे परिवारों में कुल देवियों की पूजा होती है तथा धार्मिक कार्यों को पुरोहित के रूप में करने का अधिकार स्त्रियों को होता है। इन परिवारों में परिवार की मुखिया स्त्री होती है और पारिवारिक या सामाजिक अधिकार भी स्त्रियों को मिलते हैं, परंतु इसका यह बिल्कुल भी अर्थ नहीं है कि माता को आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक समस्त अधिकार प्राप्त होते हैं। वास्तव में, ऐसी व्यवस्था में संपत्ति की देख-रेख का काम मामा (माता के भाई) के हाथों में होता है और उसे उससे संबंधित खरीद-फरोख्त के निर्णय लेने का अधिकार होता है। सामाजिक और राजनैतिक अधिकार भी पुरुषों को ही होते हैं। उदाहरण के लिए, मेघालय की खासी जनजाती मातृवंशीय होती है। इस समुदाय में मुखिया की मृत्यु के बाद उसका भाई या उसकी सबसे बड़ी बहन का सबसे बड़ा पुत्र (भांजा) या फिर उसकी बहन की पुत्री के पुत्र को ही मुखिया का पद संभालने का अधिकार होता है।

पुरुष उत्तराधिकारी की अनुपरिस्थिति में बड़ी बहन या फिर उसकी बड़ी पुत्री यह पद संभालती है। परंतु, कोई भी सामाजिक एवं राजनैतिक निर्णय आमसभा बुलाकर आम सहमति से लिया जाता है

इस सभा या बैठक में समुदाय के सभी वयस्क पुरुषों का भाग लेना अनिवार्य होता है, जबकि स्त्रियों के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। यह खासी समुदाय में प्रचलित एक लोकोक्ति से भी स्पष्ट होता है- "युद्ध और राजनीति पुरुषों के लिए हैं, जबकि संपत्ति और बच्चे स्त्रियों के लिए (War and politics are for men, while property and children are for women)" ( सेन, 1978)। इससे स्पष्ट है कि मातृवंशीय समुदायों में भी वास्तविक सत्ता स्त्रियों के नहीं वरन पुरुषों के हाथ में होती है। अतः मातृवंशीय परिवार मातृस्थानिक तो हो सकते हैं, पर पूर्णतः मातृसत्तात्मक नहीं होते हैं।


फिर भी, उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट है कि पितृवंशीय समाजों की तुलना में मातृवंशीय समाज में स्त्रियों की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशा बेहतर होती है।