पाठ्य-पुस्तकों की विशेषताएँ - Features of Text Books

पाठ्य-पुस्तकों की विशेषताएँ - Features of Text Books


अच्छी पाठ्य-पुस्तकों की कुछ विशेषताएँ होती हैं, वे ही विशेषताएँ उसके गुण का निर्धारण करती है। पाठ्य पुस्तकों के गुण को हम मुख्य रूप से दो दृष्टियों से देख सकते है। इन्हें पुस्तिकों के गुणों के दो रूप भी कहा जाता है। ये हैं-


1. आभ्यंतरिक,


2. बाह्य


आभ्यंतरिक गुण पुस्तक के वे भीतरी गुण है जो उसकी भाषा, शैली, पाठ्य विषय आदि की दृष्टि से होते हैं। बाह्य गुणों में पुस्तक का आवरण, मुद्रण, साज-सज्जा आदि होते हैं।


पाठ्य-पुस्तुकों के मुख्यक गुण निम्नलिखित हैं- 


1. सोद्देश्यता – प्रत्येक पाठ्य-पुस्तक की रचना कुछ उद्देश्यों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। पुस्तक में इन उद्देश्यों को पूरा करने की प्रेरणा विद्यमान होनी चाहिए। भाषा की पाठ्य-पुस्तक का उद्देश्य-भूगोल और विज्ञान का ज्ञान देना नहीं होता। अतः ऐसे विषयों पर आधारित पाठों का उद्देश्य केवल जानकारी प्रदान करना न होकर भाषा ज्ञान बढ़ाना है। अतः पाठों को भाषा-ज्ञान वृद्धि का उद्देश्य पूरा करना चाहिए। 


2. उपयुक्तता – मनोवैज्ञानिक, दृष्टि से मानव-व्यक्तित्व के विकास की कई अवस्थाएँ हैं; जैसे-बालावस्था, किशोरावस्था, प्रौढ़ावस्था आदि। इन अवस्थाओं की सामान्य प्रवृत्तियों के अनुकूल विषयों पर आधारित पाठ उपयुक्त होते हैं।


3. विषय विविधता - एक ही प्रकार के विषय पर आधारित अनेक पाठों की अपेक्षा अनेक विषयों पर आधारित अच्छे होते हैं। इस प्रकार साहित्य की विभिन्न विधाओं का पुस्तक में प्रतिनिधित्व होना चाहिए। गद्य, पद्य, नाटक कहानी, निबंध आदि सभी विषयों पर पाठ होने चाहिए।


4. रोचकता - जिन विषयों में छात्रों की रुचि होती है, उनके अध्ययन में वे ऊबते नहीं और उन्हें शीघ्र समझ लेते हैं। रुचि का सिद्धांत आज का एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है और इस सिद्धांत को शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में व्यवहृत किया जाना चाहिए।


5. जीवन से संबद्धता पाठ्य पुस्तक में आए हुए विषय जीवन से संबंधित होने चाहिए। जीवन से असंबद्ध विषयों को सीखने में छात्रों को कठिनाई होती है।


6. क्रमबद्धता – पाठ्य-पुस्तकों के पाठ क्रमबद्ध होने चाहिए। यह क्रम छात्रों की आयु के अनुसार होना चाहिए तथा विषयों को सरल से कठिन की ओर के सिद्धांत के आधार पर व्यवस्थित करना चाहिए। 


7. आदर्शवादिता – पाठ्य-पुस्तक में कुछ पाठ ऐसे हों जो विद्यार्थी को नया संदेश, नई प्रेरणा एवं नए आदर्श प्रदान करने में सक्षम हों।


8. व्यावहारिक – कुछ पाठ ऐसे भी होने चाहिए जो बालक की व्यावहारिक बुद्धि को विकसित कर सकें और उसे लोकाचार की शिक्षा दे सकें। 


9. स्तरानुकूलता - पाठ्य पुस्तकों की भाषा छात्रों के अनुकूल होनी चाहिए। प्रारंभिक कक्षाओं में इनकी भाषा बहुत सरल हो और शनै: शनै: व्यवस्थानुसार भाषा के स्तर को बढ़ाया जाए। 


10. शुद्धता - भाषा की दृष्टि से पाठ्य-पुस्तकों को शुद्ध होना चाहिए। यदि पुस्तक की ही भाषा अशुद्ध है तो यह आशा कैसे की जा सकती है कि छात्र उन्हें पढ़कर भाषा पर अधिकार कर सकेंगे। 


11. सार्थकता - पाठ्य पुस्तक का प्रत्येक शब्द सार्थक हो, प्रत्येक वाक्य तथा प्रत्येछक अनुच्छेद सार्थक हो। ऐसा न हो कि शब्द, वाक्य और अनुच्छेद अनावश्यक रूप से ठूस दिए गए हों। अनावश्यक शब्दों या वाक्यों को पुस्तक में स्थान नहीं मिलना चाहिए। से


12. संबद्धता - पुस्तक का प्रत्येक वाक्य दूसरे वाक्य से संबंधित हो। एक अनुच्छेद का दूसरे अनुच्छेद संबंध हो। एक अनुच्छेद के अंदर विभिन्न वाक्य एक-दूसरे से संबद्ध होने चाहिए। 


13. भाषाधिकार वर्द्धकता - पाठ्य-पुस्तकों की भाषा ऐसी होनी चाहिए कि छात्रों के शब्द-भंडार में वृद्धि और उनकी भाषा पर अधिकार बढ़ सके।


14. मौलिकता - पाठ्य पुस्तक के पाठों में मौलिकता को छिन्न-छिन्न नहीं किया जाना चाहिए। कभी-कभी अध्यापक संकलन करते समय लेखक के मूल लेख को छोटा कर देते हैं और लेख को इस प्रकार मौलिकता विहीन कर देते है, ऐसा नहीं होना चाहिए। जो पाठ नए लिखे जाएँ, उनमें ध्यान रहे कि अभिव्यक्ति की नवीनता बनी रहे। 


15. शैलीगत विविधता – प्रत्येक पाठ्य-पुस्तक में विभिन्न साहित्यिक विधाएँ तो होनी ही चाहिए, किंतु उन पाठों में श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, भयानक, वीर, शांत, आदि विविध रसों की कविताएँ हों और दोहा, चौपाई, कविता, सवैय, पद, तुकांत अतुकांत आदि विविध छंद हों।


16. नाम - पाठ्य पुस्तक के बाह्य गुणों में नाम का भी प्रभाव पड़ता है। पुस्तक का नाम सरल, संक्षिप्त स्पष्ट एवं आकर्षक हो। उससे विषय का भी किंचित आभास मिल जाना चाहिए।


17.आकार - पाठ्य-पुस्तक में पाठों का आकार बहुत छोटा या बड़ा न रहे। इस प्रकार संपूर्ण पुस्तक का आकार भी न बहुत छोटा रहे, न बड़ा। छोटी कक्षाओं में पृष्ठ संख्या कम रहे, किंतु बड़ी कक्षाओं में यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ती जाए।


18. कागज – कागज बहुत पतला न हो और ऐसा न हो जिसकी चमक आँखों पर पड़े। यह इतना पुराना भी न हो कि शीघ्र फट जाए और छात्र को वर्ष में दो बार नई किताब खरीदनी पड़े। छोटी कक्षाओं में बड़े आकार के कागज की पाठ्य-पुस्तक हो सकती है।


19. मुद्रण - पुस्तक की छपाई शुद्ध होनी चाहिए। अक्षर बहुत छोटे न हों। प्रारंभिक कक्षाओं में मोटे अक्षरों में छपाई हो और धीरे-धीरे ऊपर की कक्षाओं में अक्षर बारीक हो सकते है। अभ्यासार्थ दिए प्रश्नों के अक्षर मूल पाठ के अक्षर से भिन्न हों। शीर्षकों के लिए लिए भी अलग टाइप के अक्षर हों। शब्दों के बीच की दूरी एक वाक्य से दूसरे वाक्य की दूरी, अनुच्छेद-योजना आदि पर भी ध्यान रहे।


20. चित्र – चित्रों से विषय स्पष्ट हो जाते हैं। पुस्तक की उपयोगिता में वृद्धि के लिए चित्र होने चाहिए। प्रारंभिक कक्षाओं की पाठ्य-पुस्तकों में चित्र अवश्य हों। धीरे-धीरे ऊँची कक्षाओं में इन चित्रों की कमी होती जाए और उच् कक्षाओं में इन चित्रों की विशेष आवश्यकता नहीं।


21. जिल्द – पाठ्य-पुस्तकों की जिल्दा मजबूत होनी चाहिए। छोटी कक्षाओं में छात्र किताबें बहुत फाड़ते हैं और दुभाग्र्व्वश आजकल उन्हीं की जिल्द सबसे कमजोर होती है।


22. आवरण- पाठ्य पुस्तक का आवरण आकर्षक होना चाहिए। छोटे बालक रंग-बिरंगे चित्रों को बहुत पसंद करते हैं! अत: उनकी पुस्तकों के आवरणों में विभिन्न चित्र हों तो अच्छा है। ऊँची कक्षाओं की पुस्तकों के आवरण सादे, किंतु कलात्मक हों।


23. मूल्य पाठ्य पुस्तक का मूल्य उचित होना चाहिए, जिससे कि छात्र उसे सरलता से खरीद सकें और अभिभावकों पर अधिक भार न पड़े।


उपर्युक्त गुणों में प्रथम पंद्रह गुण पाठ्य-पुस्तकों के आभ्यं तरिक गुण हैं। इनमें भी निम्नलिखित प्रकार के गुणों का उल्लेख किया गया है


(अ) विषय-वस्तु की दृष्टि से आभ्यंतरिक गुण क्रम संख्याह 1 से 8 तक वर्णित हैं।


(आ) भाषा की दृष्टि से आभ्यंतरिक गुण क्रम संख्या 9 से 13 तक वर्णित हैं।


(इ) शैली की दृष्टि से आभ्यंतरिक गुण चौदहवें और पंद्रहवें हैं। 


(ई) पाठ्य-पुस्तकों के बाह्य गुणों में क्रम संख्या 16 से क्रम संख्या 23 तक की चर्चा की गई है।