स्त्री विकास-प्रजनन एवं स्वास्थ्य - Female Development – Reproductive and Health

स्त्री विकास-प्रजनन एवं स्वास्थ्य - Female Development – Reproductive and Health


विकास की अवधारणा को अमल में लाने के लिए जरूरी है- शिक्षा, जिसके अभाव में राज्य और केंद्र की ओर से उठाए गए कल्याणकारी प्रयास व्यर्थ हो जाते हैं। भारतीय संदर्भ में देखें तो जो स्त्री ठीक से पढ़ी लिखी नहीं है, अंग्रेज़ी में बातचीत नहीं कर सकती वह सत्ता और उसके संवाहकों की दृष्टि में दोयम दर्जे का जीव ही बनी रहती है। भारत में वर्ग और वर्ण के आधार पर स्त्रियों के साथ भेदभाव किया जाता है मसलन उसकी अपनी इच्छा से गर्भधारण या गर्भपात कराने का मुद्दा- जो नैतिक और राजनीतिक रूप से जटिल और बहुआयामी है- स्त्री का वर्ग, उसकी जाति के आधार पर निर्णय लिया जाता है- वह भी राज्यसत्ता द्वारा। इस संदर्भ में यह ध्यान देना ज़रूरी है कि स्त्रीवादी विमर्श के केंद्र में प्राय: उच्चवर्गीय स्त्रियाँ ही रही हैं। अत: प्रतनन इत्यादि मामलों मे निम्नवर्गीय स्त्री की प्राथमिकताओं के विषय में हम विस्तृत समझ से परे रह जाते हैं। भारत में 14.5 प्रतिशत माताओं की मृत्यु का कारण असुरक्षित गर्भपात है। निम्नवर्ग की स्त्रियाँ आर्थिक अभाव, दरिद्रता, नैतिकता, लज्जा इत्यादि विभिन्न कारणें से अपने स्वास्थ्य की सही जानकारी न ले पाती हैं नही दे पाती हैं।

1972 में गर्भपात को वैधानिक करा दिया गया था, फिर भी हमारे अधिकांश राज्यों में अधिकांश स्त्रियाँ अन्यान्य कारणों से सुरक्षित गर्भपात नहीं करा पाती । अधिकांश दूर दराज़ के इलाकों में प्रशिक्षित स्त्री रोग विशेषज्ञ अनुपलब्ध हैं। जहां तक गर्भपात और स्त्री रोग किशेषज्ञ जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं, लेकिन अविवाहित या विधवा स्त्रियाँ, कम दम्र की लड़कियां ऐसी समस्याओं के समाधान के लिए निजी अस्पतालों या प्राइवेट डाक्टर के पास जाना उचित समझती हैं, क्योंकि गर्भपात कराने के लिए पिता या पति की सहमति अनिवार्य है। कई बार विवाहित स्त्री अपनी इच्छा से गर्भपात कराने को स्वतंत्र नहीं होती। इस सारी समस्या की जड़ में है समाज की पितृसत्तत्मक अधिरचना, जिसके कारण जब तक स्त्रियाँ नौकरशाही और उँचे पदों पर नहीं पहुँच जाएगी जब तक संपत्ति में उन्हें बराबरी का अधिकार नहीं मिलेगा, संख्या के अनुपात में विधायिका में स्त्रियों का स्थान सुनिश्चित करने जैसे विधेयक पास नहीं होंगे, संस्थाबद्ध स्त्री द्वेष और लिंगाधूत भेदभाव के कारण स्त्रियों के समुचित विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। स्त्रियों को एक ऐसे कार्यक्रम की आवश्यकता है जो उनपर पितृसत्ताक समाज के दबावों को समझे, उनकी पारिवारिक सामाजिक विवशताओं को समझे एक ऐसा स्वास्थ्य कार्यक्रम, जिसमें सलाह और इलाज के स्त्रि और पुरुष दोनों चिकित्सक उपलब्ध हों, उनकी बातों समस्याओं को ध्यान से सुनें, सिर्फ गर्भपात ही नहीं, बल्कि गर्भनिरोधकों और स्वस्थ संतति के लालन-पालन से जुड़ी समस्याओं की जानकारी और उपाय सुझाए। प्रजनन और स्वास्थ्य जैसे गोपनिय और निजी माने जाने वाले क्षेत्रों में स्त्रिसों के मुँह से उनकी समस्याओं को सुनना और जानना बहुत धैर्य और मानववादी कार्यकर्ताओं और चिकित्सकों की अपेक्षा रखता है। भारतीय ग्रामीण व्यवस्था में, जहाँ अशिक्षा और अंधविश्वास जड़ जमाए बैठे हैं- वहाँ अक्सर स्त्रियाँ अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को छुपाती हैं।