शिक्षणशास्त्र की स्त्रीवादी दृष्टि से व्याख्या - A feminist definition of pedagogy

शिक्षणशास्त्र की स्त्रीवादी दृष्टि से व्याख्या - A feminist definition of pedagogy


समाज में विद्यमान जेंडर रुढीवादी विचारधाराओं को दूर करने तथा बालिकाओं को समाज के एक सशक्त अंग के रूप में विकसित करने के लिए यह आवश्यक है कि वे स्वयं अपनी आवश्यकताओं एवं समाज द्वारा प्रदत्त अपनी भूमिका की आलोचनात्मक समझ विकसित करें तथा अपने समस्याओं के समाधान हेतु आवश्यक प्रयास करें। इस दिशा में स्त्रीवादी शिक्षण अभ्यास द्वारा स्त्री सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसके अंतर्गत बालिकाओं के आवश्यकता, अनुभव, अभिक्षमता एवं अभिरुचि के अनुसार अधिगम अनुभवों के चयन पर विशेष बल दिया जाता है जिससे कक्षा में उनकी अभिव्यक्ति को व्यापक स्थान दिया जा सके। इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि वे एक आलोचनात्मक पर्यवेक्षक के रूप में अपने समस्याओं का अध्ययन करें चाहे समस्याएँ कोई समाजिक, आर्थिक या राजनीतिक विमर्श हो या पाठ संबंधी अभ्यास प्रश्न। कक्षा विचार-विमर्श तथा प्रस्तुति में बालिकाओं की पहल तथा सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

इसके लिए आलोचनात्मक शिक्षणशास्त्र की युक्तियों जैसे संघर्ष समाधान तकनीक को व्यवहार में लाया जा सकता है। इसमें ऐसे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विमर्शों को पाठ संदर्भ के रूप में व्यवहार में लाया जाता है जो बालिकाओं के जीवन से जुड़े होते हैं तथा उनकी समाज में भूमिका तथा अस्मिता का निर्धारण करते हैं। जैसे- घर के आर्थिक वृत्ति में स्त्री की भूमिका, दहेज प्रथा, सरपंच सभा में स्त्रियों की भागीदारी, बाल विवाह, स्त्री शिक्षा, बच्चों की परवरिश, सामूहिक पर्व-त्योहार में स्त्रियों की भागीदारी आदि विषय जिससे स्त्रियों को प्रायः जूझना पड़ता है, उन्हें संघर्ष समाधान अधिगम रणनीति के लिए संदर्भ के रूप में व्यवहार में लाया जा सकता है। ग्राम पंचायत या स्थानीय सरकार जैसे प्रकरण के अध्ययन के लिए सरपंच सभा में स्त्रियों की भागीदारी जैसे राजनीतिक विमर्श को संघर्ष समाधान का हिस्सा बनाकर बच्चों में जेंडर समानता के प्रति जागरूकता तथा संवेदनशीलता पैदा की जा सकती है। वे शिक्षिका एवं अन्य सहपाठियों के साथ विचार विमर्श कर स्त्रियों के वैकल्पिक जीने के तरीके तथा समाज एवं राजनीति में उनकी बदलती भूमिका से परिचित होते हैं। परिणामस्वरूप सभी बच्चे, चाहे वे बालक हों या बालिकाएँ, उनमें जेंडर समानता का भाव पैदा होता है।


स्त्रीवादी शिक्षणशास्त्र समाज, राष्ट्र एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विद्यमान स्त्रीवादी मूल्यों को शिक्षण अधिगम अनुभवों का हिस्सा बनाकर बच्चों में जेंडर असमानता के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण पैदा करता है। मूल्यों जैसे स्त्रियों की समाज के सभी गतिविधियों में बराबर की सहभागिता, सरकारी पदों में स्त्रियों के लिए आरक्षण, विभिन्न वृत्तिक क्षेत्रों में स्त्रियों के क्षमताओं का सम्मान, स्त्रियों के अभिरुचि तथा अनुभवों को बराबर का दर्जा आदि को समावेशित कर शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार की जाती है। इसमें शिक्षकों के मान्यताओं तथा अभिप्रेरणा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यानि स्त्री समाज के प्रति उनके दृष्टिकोण सकारात्मक हैं या नकारात्मक । उन्हें समस्त प्रक्रिया के दौरान स्वयं से ये प्रश्न पूछते रहने चाहिए कि हम क्यों पढ़ाते हैं? तथा पढ़ने के उपरांत विद्यार्थी के सोच तथा व्यवहार में क्या परिवर्तन होगा?


स्त्रीवादी शिक्षणशास्त्र अन्य प्रगतिशील शिक्षणशास्त्र की भाँति ज्ञान को सामाजिक रूप से निर्मित मानता है।

इसके लिए ज्ञान का स्वरूप विषयनिष्ठ होता है क्योंकि यह व्यक्ति या समुदाय विशेष के विषयनिष्ठ अनुभवों तथा प्रत्यक्षीकरण को ज्ञान निर्माण का आधार मानता है। ज्ञान निर्माण या अधिगम के प्रक्रिया में बालकों एवं बालिकाओं के विभिन्न अनुभवों तथा विचारों को सम्मिलित कर उन्हें ज्ञान के बहुआयामी स्वरूप को देखने का अवसर प्रदान करता है, जिससे उनमें प्रकरण या विमर्श के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण पैदा होता है।


स्त्रीवादी शिक्षणशास्त्र के अंतर्गत शिक्षक एवं बच्चों तथा बालक एवं बालिकाओं को बराबर का दर्जा दिया जाता है। इसमें बच्चे विशेष रूप से बालिकाएँ अपनी सक्रिय सहभागिता के लिए प्रोत्साहित की जाती हैं। इसमें बालकों एवं बालिकाओं तथा बच्चों एवं शिक्षकों के मध्य पारस्परिक सामंजस्य का संबंध होता है।

वे दोनों एक-दूसरे से सीखते हैं न कि केवल शिक्षक से बच्चों या बालकों से बालिकाओं की ओर ज्ञान का स्थानांतरण होता है। बच्चा संप्रेषण प्रक्रिया का अहम हिस्सा होता है। शिक्षक के साथ-साथ बालक एवं बालिकाएँ भी अधिगम प्रक्रिया में संलग्न होते हैं, वे एक-दूसरे के भावनाओं, वे संस्कृति एवं विचारों का सम्मान करते हैं, उनके कुछ पारस्परिक लक्ष्य होते है जिन्हें पूरा करने के लिए वे एक-दूसरे की क्षमताओं को उपयोग में लाते हैं यह बच्चों में समाज में विद्यमान जेंडररुदियों के प्रति समीक्षात्मक दृष्टिकोण विकसित करता है। यह मानता है कि जेंडर ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया तथा बच्चों में समाज द्वारा प्रदत्त अपनी भूमिका के प्रति विचारशील चिंतन प्रवृत्ति विकसित करने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रभावशाली उपकरण है। यह केवल इस बात पर ही बल नहीं देता कि क्या पढ़ना चाहिए बल्कि यह भी बताता है कि किस प्रकार पढ़ना चाहिए?