विद्यालय पाठ्यचर्या की स्त्रीवादी दृष्टि से व्याख्या - Feminist interpretation of school curriculum
विद्यालय पाठ्यचर्या की स्त्रीवादी दृष्टि से व्याख्या - Feminist interpretation of school curriculum
विद्यालयी पाठ्यचर्या को जेंडर संवेदनशील बनाने के लिए इसे विद्यार्थियों के सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश में विद्यमान जेंडर अस्मिता चुनौतियों से जोड़ने की आवश्यकता है। विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम में ऐसे प्रकरण सम्मिलित किए जाएँ जिससे बच्चें जेंडर विमर्शों की समीक्षा कर सकें। इन विमर्शों को पढ़ाने के लिए वाद-विवाद, प्रश्नोत्तरी, विचार-विमर्श, संघर्ष समाधान जैसे युक्तियों को व्यवहार में लाया जाना चाहिए। विद्यालयी पाठ्यचर्या के स्त्रीवादी उन्मुखीकरण के लिए ऐसे शिक्षक एवं शिक्षिकाएँ जो स्त्री अध्ययन में कार्यरत हैं, सामाजिक कार्यकर्ता जो स्त्री सशक्तिकरण के लिए कार्य कर रहे हैं तथा स्त्रीवादी आलोचकों के अनुभवों को पाठ्यचर्या के साथ एकीकृत किए जाने की आवश्यकता है। स्त्रीवादी या जेंडर विमर्शों को विद्यालय पाठ्यचर्या में समावेशित करने के लिए विभिन्न आकादमिक विषयों के शिक्षण तथा पाठ-सहगामी गतिविधियों के आयोजन के लिए अंतरानुशासनिक उपागमों को व्यवहार में लाया जाना चाहिए।
उदाहरण के लिए यदि शिक्षक को भौतिकी विषय में '21वीं सदी में अंतरिक्ष तकनीकी का विकास' नामक प्रकरण को पढ़ाना है तो वे कल्पना चावला तथा सुनीता है विलियम्स जैसे महिला अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का उदाहरण देकर बच्चों को विभिन्न अंतरिक्ष तकनीकी उपलब्धियों से परिचित कराते हुए समाज में स्त्रियों की बदलती भूमिका के प्रति उनका ध्यान आकर्षित कर सकते हैं। जीव विज्ञान में प्रजनन तंत्र जैसे प्रकरण को पढ़ाने के लिए किशोर एवं किशोरियों के शारीरिक बदलाव तथा इसके प्रतिफल उनके प्रति समाज में लोगों का बदलता व्यवहार भी एक स्त्रीवादी विमर्श बन सकता है सामाजिक विज्ञान विषय में 'विभिन्न समुदायों की जीवन शैली' प्रकरण के अध्ययन के लिए 'समाज में स्त्री एवं पुरुषों के बीच कार्य का विभाजन' विषयक विमर्श के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है। इन विमर्शों को पाठ्यक्रम में समावेशित करने के लिए शिक्षकों को विज्ञान, भूगोल, नागरिक शास्त्र, साहित्य आदि कई विषयों के अवधारणाओं को पाठ से जोड़ना पड़ता है। साथ ही-साथ पाठ सहगामी गतिविधियों जैसे वाद-विवाद, निबंध प्रतियोगिता, नाटक मंचन के लिए स्त्रीवादी विमर्शों को विषयक के रूप में चुना जा सकता है तथा बच्चों से यह अपेक्षा की जा सकती है
कि वे विभिन्न अकादमिक विषयों से प्राप्त ज्ञान को मिलाकर अपने उत्तर या विचार बिंदु तैयार करें। विभिन्न विषयों के प्रत्ययों को कार्य विभाजन, शरीरिक विषमताएँ, लैंगिकता, विवाह प्रथा, पितृत्व व्यवस्था, परिवार, जाति, समुदाय, अर्थव्यवस्था, आधुनिकता आदि विषयक से जोड़कर पढ़ाया जाना चाहिए ।
परंपरागत जेंडर संवेदना शून्य आकलन पद्धति में बालिकाएँ कई बार शिक्षकों से घबराकर (अपने रुढ़िवादी सामाजिक अस्मिता के कारण) या पारिवारिक समस्याओं के कारण प्रश्नों के जवाब नहीं दे पाती या जवाब देने में हिचकिचाहट महसूस करती हैं, जिससे उनकी प्रतिभा का सही रूप से मूल्यांकन नहीं हो पाता जेंडर समानता को प्रोत्साहित करने के लिए आकलन एवं मूल्यांकन हेतु वैकल्पिक आकलन युक्तियों जैसे- साक्षात्कार, स्व-मूल्यांकन समूह साथी मूल्यांकन अवलोकन, पोर्टफोलियो आदि को प्रयोग में लाया जाना चाहिए।
ये युक्तियाँ उनके प्रत्यक्ष तथा प्रच्छन्न दोनों ही व्यवहारों का समुचित रूप से आकलन करने के लिए सक्षम होती हैं।
विभिन्न विषयों के पाठ्य पुस्तक तथा अन्य पाठ्यचर्या सामग्री में स्त्रीवादी विमर्शों, स्त्रियों से जुड़े उदाहरण एवं प्रसंगों, उनके चित्रों, कहानियों, जीवनवृत्त आदि को उपयुक्त स्थान दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए- साहित्य की कहानियों या कविताओं में महिला कवियों तथा कहानीकारों के रचनाओं को सम्मिलित करना चाहिए । ऐसी रचनाएँ जो स्त्रियों के उत्कर्ष तथा संघर्ष का परिदृश्य प्रस्तुत करती हैं, उन्हें विशेष रूप से शामिल करना चाहिए। सामाजिक विज्ञान में विभिन्न प्रकरणों के विवरण के साथ स्त्रीवादी विमर्शों, जहाँ-जहाँ संभव हो, अवश्य जोड़ना चाहिए । मौलिक अधिकारों तथा मौलिक कर्तव्यों को पढ़ाते वक्त वर्तमान समाज में स्त्रियों की स्थिति को प्रसंग के रूप में लिया जा सकता है। इसके द्वारा बच्चों में जेंडर संवेदनशीलता का विकास होता है।
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