विद्यालय गतिविधियों की स्त्रीवादी दृष्टि से व्याख्या - Feminist interpretation of school activities
विद्यालय गतिविधियों की स्त्रीवादी दृष्टि से व्याख्या - Feminist interpretation of school activities
विद्यालयी शिक्षा को जेंडर समावेशी बनाने के लिए विद्यालयी संस्कृति को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। यह अवधारणा है कि पूर्व एवं प्राथमिक शिक्षा के लिए शिक्षिकाएँ, शिक्षकों से बेहतर होती हैं क्योंकि वे छोटे बच्चों का ध्यान आसानी से रख सकती हैं। इसी प्रकार से बालिकाओं के पठन कौशल पर उनके लेखन कौशल की तुलना में अधिक ध्यान दिया जाता है, वहीं बालकों को लेखन कौशल के विकास के लिए अधिक प्रोत्साहित किया जाता है। इस प्रकार के पूर्वाग्रह या सोच में अनिवार्य परिवर्तन किया जाना चाहिए।
माध्यमिक विद्यालय स्तर पर गणित तथा विज्ञान जैसे विषयों के शिक्षण के लिए शिक्षकों को अधिक उपयुक्त माना जाता है, वहीं भाषा, कला, संगीत, कढ़ाई बुनाई, गृह विज्ञान जैसे विषयों के लिए शिक्षिकाओं को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
इसके अलावा विद्यालय में बच्चों को पानी पिलाने, विद्यालय की साफ़-सफाई आदि के लिए भी महिलाओं को अधिक उपयुक्त माना जाता है। इस विद्यालयी परंपरा को भी परिवर्तित किया जाना चाहिए जब विद्यालय में अभिवावक सम्मलेन, कार्यशाला या संगोष्ठी, वार्षिकोत्सव जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं तो कक्ष या हॉल के सजावट की जिम्मेदारी शिक्षिकाओं एवं बालिकाओं को दी जाती है, जो कहीं-न-कहीं समाज द्वारा प्रदत्त उनके रुढ़िवादी भूमिका का समर्थन करता प्रतीत होता है। इन विद्यालयी रिवाजों में बदलाव लाकर विद्यालय गतिविधियों में जेंडर समानता को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
बालक एवं बालिकाओं के विद्यालयी यूनिफार्म में भी असमानता देखने को मिलती है। बालिकाओं को स्कर्ट, सलवार या फ्रॉक पहनने के लिए बाध्य किया जाता है,
उन्हें लड़कों की तरह पैंट पहनने की अनुमति नहीं दी जाती जो उनके लिए अधिक आरामदायक हो सकता है। बालिकाओं या किशोरियों को वृत्तिक परामर्श प्रदान करते वक्त उन्हें गृह विज्ञान, कला तथा मानविकी जैसे विषय चुनने की सलाह दी जाती है। वहीं बालकों को गणित, विज्ञान तथा तकनीकी जैसे विषयों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस प्रकार विद्यालयी परंपरा समाज में विद्यमान जेंडर आधारित कार्य या वृत्तिक विभाजन का प्रबलन करता है। इस दिशा में बदलाव लाने की नितांत आवश्यकता है।
कभी-कभी बालक किसी घटना या प्रसंग पर भावुक होकर रोने लगते हैं तो यह कहा जाता है कि क्या वे बालिकाएँ हैं, उनका हृदय क्या बालिकाओं की तरह कमजोर है
तथा उन्हें एक पुरुष के समान दृढ व्यवहार करने की सलाह दी जाती है। वहीं दूसरी ओर यदि बालिकाएँ क्रिकेट, फुटबाल, कुश्ती आदि खेलों में हिस्सा लेना चाहती हैं तो उन्हें कमजोर बताकर झिड़क दिया जाता है।
विद्यार्थी क्लब द्वारा जब कोई कार्यशाला, प्रदर्शनी, मेला आदि गतिविधियों का आयोजन किया जाता है तो बालकों को समान खरीदने, प्रदर्शनी या कार्यशाला का प्रारूप तैयार करने, मॉडल या चार्ट का अवधारणा मानचित्रण करने एवं इसके कठिन अवयवों की रूपरेखा तैयार करने तथा तकनीकी व्यवस्था उपलब्ध करने का कार्य प्रदत्त किया जाता है, वहीं बालिकाओं को भोजन परोसने, कमरे की सजावट करने, सभी के बैठने की व्यवस्था करने तथा मॉडल या चार्ट आदि में रंग भरने तथा अन्य कलाकारी करने की जिम्मेदारी दी जाती है। इस प्रकार की परंपरा के संवर्धन को रोकने की आवश्यकता है।
विद्यालय में जब संगीत, पेंटिंग, रंगोली, कक्षा सजावट जैसी गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं तो इसमें बालिकाओं को सहभागिता करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। वहीं बालकों को समाज में उनकी परंपरागत भूमिका का एहसास कराते हुए इन गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए हतोत्साहित किया जाता है, जिससे उनमें ऐसे गतिविधियों तथा बालिकाओं के क्षमताओं के प्रति उपेक्षा का भाव पैदा होता है। वहीं दूसरी ओर विज्ञान प्रतियोगिता, वाद-विवाद, निबंध लेखन आदि के लिए बालकों को विशेष रूप से प्रेरित किया जाता है, जिससे उनमें समाज के श्रेष्ठ वर्ग का हिस्सा होने का एहसास कराया जाता है। इन गतिविधियों में बालिकाओं की भागीदारी की अवहेलना की जाती है। साथ-ही-साथ इन गतिविधियों के प्रकरण में महिला वैज्ञानिक, महिला समाजकर्ता, महिला शिक्षाविद तथा महिला राजनीतिज्ञ का स्थान न के बराबर होता है जो जेंडररुदियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समृद्ध करता है।
अंतरविद्यालय स्तर पर जब कोई प्रतियोगिता जैसे विज्ञान ओलंपियाड, प्रदर्शनी, वाद-विवाद एवं निबंध जैसी प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं तो बालिकाओं की उपेक्षा कर बालकों का चयन प्रतियोगिता के लिए किया जाता है। क्योंकि यह माना जाता है कि बालक, बालिकाओं की तुलना में विद्यालय के आस- पास तथा नजदीकी समुदायों एवं राज्यों के परिवेश से अधिक परिचित हैं तथा प्रतियोगिता के दौरान उत्पन्न होनेवाली बाधाओं का बालिकाओं की तुलना में अधिक साहसपूर्ण ढंग से सामना कर सकते हैं। यह विद्यालयी रीतियाँ समाज में विद्यमान इस अवधारणा को संवर्धित करता है कि स्त्रियाँ, पुरुषों की तुलना में कम साहसी तथा सक्षम होती है। उनका कार्य क्षेत्र अपने घर या अधिक-से अधिक आस-पड़ोस तक ही सीमित होता है। उन्हें नजदीकी समुदायों तथा राज्यों के परिवेश, शिक्षा एवं प्रशासन व्यवस्था की जानकारी पुरुषों की तुलना में बहुत कम होती है। अतः बालिकाएँ अंतरराजकीय तथा अंतरसामुदायिक स्तर पर आयोजित होनेवाले विद्यालयी प्रतियोगिताओं के लिए अयोग्य मानी जाती हैं।
विद्यालय में आयोजित होनेवाले प्रार्थना सभा में संगीत या प्रार्थना के आयोजन की जिम्मेदारी बालिकाओं को दी जाती है तथा बालकों को सुविचार तथा समाचार कथन जैसी गतिविधियों को आयोजित करने का उत्तरदायित्व होता है। यह कही न कहीं समाज के जेंडर रुढ़िवादी विचारधारा का समर्थन करता है।
उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि विद्यालय पाठ्यचर्या, शिक्षणशास्त्र एवं विद्यालयी गतिविधियों में स्त्रीवादी तत्वों को समावेशित कर बच्चों में समाज में विद्यमान जेंडररुढ़ियों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण पैदा किया जा सकता है तथा उन्हें इनसे निदान के उपाय भी सुझाए जा सकते हैं ताकि बालक एवं बालिकाएँ एक-दूसरे का सम्मान करें तथा समाज द्वारा प्रदत्त अपने अस्मिता की व्यापक समीक्षा कर सकें।
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