फिल्म एवं वृत्तचित्र - Film & Documentary
फिल्म एवं वृत्तचित्र - Film & Documentary
हम सभी जानते हैं कि सफल ज्ञानार्जन आज बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि बच्चे के मन में सीखने की प्रबल प्रेरणा हो और उसे प्राप्त होने वाले अनुभव उसके लिए सार्थक और प्रयोजनशील बनाये जायें। जनसंचार माध्यमों में प्रमुख पहलू फिल्मों द्वारा भी पर्यावरण शिक्षा को अभिगम्य बनाया जा सकता है। दृश्य-श्रव्य साधन जनसाधारण में अभिरूचि उत्पन्न करके उसे पर्यावरण सम्बन्धी ज्ञानार्जन के लिए प्रेरित करते हैं। जिन स्थितियों में शब्द द्वारा प्रस्तुति बिल्कुल असहाय और असमर्थ हो जाती है, उस समय फिल्म या वृत्तचित्र अत्यन्त प्रभावी सिद्ध होते हैं। उस अध्यापक की स्थिति की कल्पना कीजिए जो अपने विद्यार्थियों को शब्दों के सहारे एक ऐसे जानवर का रूप बोध कराने का उपक्रम कर रहा हो, जिसे बच्चों ने कभी देखा ही न हो। वह जानवर की ऊँचाई, उसके रंग, सिर, पैर, कान तथा उसकी अन्य विशेषताओं का वर्णन करता है, लेकिन एक भी बच्चा उस जानवर के रूपाकार की ठीक-ठीक अवधारणा नहीं बना पाता ।
यदि उस जानवर को बच्चे प्रत्यक्ष देख लें तो वे उसकी कितनी सही अवधारणा बना सकते हैं। प्रत्यक्ष अनुभूति ही सम्पूर्ण प्रभावशील ज्ञानार्जन का आधार होती है | अतः पर्यावरण से सम्बन्धित ज्ञान विकसित करने के लिए कुछ फिल्मों या वृत्तचित्रों का निर्माण अतिआवश्यक है। भारत सरकार के फिल्म डिवीजन द्वारा भी बहुत अच्छे वृत्तचित्र तैयार किये गये हैं इनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय है- "ड्रम्स ऑफ मणिपुर आवर नेबर नेपाल, होली हिमालयाज, इटावा स्टोरी, खजुराहो, काल ऑफ द माउंटेन्स आदि जिनके द्वारा पर्यावरण के बारे में रूचि तथा अपनी संस्कृति एवं सभ्यता के प्रति प्रेम उत्पन्न किया जा सकता है ।" लगभग 10,000 छविगृह देश में ऐसे हैं, जिनमें 10 से 20 मिनट के लिए वृत्तचित्र दिखाया जाता है तथा इनमें लगभग हजारों लोगों को एक शो प्रतिदिन दिखाया जा रहा है। लगभग एक करोड़ लोग प्रति सप्ताह इस प्रकार के कार्यक्रम देख रहे हैं। यदि ये सभी पर्यावरण से जुड़े वृत्तचित्र हों तो पर्यावरण शिक्षा के क्षेत्र में फिल्में एक महत्वपूर्ण साधन सिद्ध हो सकती है, जिससे व्यक्ति तथा समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता का स्तर ऊँचा किया जा सकता है।
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