शिक्षा में तकनीकी की भूमिका की निम्नलिखित है - Following is the role of technology in education
शिक्षा में तकनीकी की भूमिका की निम्नलिखित है - Following is the role of technology in education
शिक्षण-अधिगम उपकरण (Providing Effective Teaching-Learning Tools):
तकनीकी द्वारा प्राप्त कई उपकरणों तथा अनुप्रयोगों को शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को रोचक एवं अंतःक्रियात्मक बनाने के लिए व्यवहार में लाया जाता है। जैसे- मल्टीमीडिया CDs, PPT प्रेजेंटेशन, एनीमेशन, ग्राफिक, इंटरएक्टिव वीडियो, डिजिटल रिपॉजिटरी, ओपन एजूकेशनल रिसोर्सेज, इंटरएक्टिव व्हाइट बोर्ड, वेब 2.0 टूल (ब्लॉग, ग्रुप, विकी, सोशल नेटवर्किंग), हैंडीकेम, डिजिटल कैमरा, स्मार्ट फोन, मोबाइल एप्लीकेशन (ई-पाठशाला, ई-मेरिटेशन, गूगल ट्रांसलेट एन्क्राटा आदि), डाक्यूमेंट्री कैमरा, भाषा प्रयोगशाला, वीडियो कांफ्रेंसिंग आदि ।
तकनीकी-शिक्षणशास्त्रीय ज्ञान (Creating Demand of Techno-pedagogical Content Knowledge):
शिक्षा में तकनीकी के अंतक्षेप के कारण आज आवश्यकता है
कि शिक्षकों को शिक्षण शास्त्रीय ज्ञान के साथ-साथ तकनीकी शिक्षण शास्त्रीय ज्ञान भी दिया जाय जिससे उनमें पाठ्यवस्तु की प्रकृति एवं जटिलता तथा अधिगम अनुभव के अनुसार उपयुक्त तकनीकी के प्रयोग का ज्ञान तथा कौशल विकसित हो।
अध्यापक शिक्षा कार्यक्रम के विचारशील अभ्यास ( Emerging as Effective Tool for Reflective Practices in Teacher Education Programme):
शिक्षण-अधिगम व्यवस्था की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक है कि शिक्षक व्याख्याता के साथ-साथ चिन्तनशील अभ्यासकर्ता हो जो अपने शिक्षण की कमियों का पता लगाकर उसमें आवश्याक सुधार लाये तथा अपने शिक्षण के लिए एक प्रभावकारी प्रारूप का निर्माण कर सके इसके लिए अध्यापक-शिक्षण कार्यक्रम में विशेषकर शिक्षण अभ्यास के दौरान वीडियो रिकॉर्डिंग, ब्लॉग, ग्रुप, ई पोर्टफोलियो, CCTV, इंटरएक्टिव वीडियो, एनीमेशन आदि का प्रयोग किया जाता है। यह स्व-मूल्यांकन के साथ-साथ समूह-साथी मूल्यांकन को भी प्रोत्साहित करता है जो विचारशील चिंतन की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करता है।
संप्रेषण के माध्यम (Serving as Media for Communication):
सूचना के संप्रेषण के लिए आज कई माध्यम या साधनों का उपयोग किया जा रहा है जिसने सूचना संचार को नया स्वरुप प्रदान किया है। सूचना की विषय-वस्तु आज मल्टीमीडिया के रूप में उपलब्ध है। दो या दो से अधिक प्रारूप (टिक्स्ट, चित्र, ग्राफ, वीडियो, ओडियो एवं एनिमेशन) का उपयोग एक साथ सूचना के विषय-वस्तु को विकसित करने के लिए किया जा रहा है। सूचना के संचार के लिए वेब या इन्टरनेट (वेबिनार, e-मेल, ब्लॉग, ग्रुप, यू ट्यूब, LMS, प्रोफेशनल कम्यूनिटी इत्यादि), टेली कांफेरेंसिंग, PPT प्रेजेंटेशन, मल्टीमीडिया CDs, डाक्यूमेंट्री कैमरा आदि का उपयोग किया जा रहा है। इसके अलावा CCTV, e-समाचार, एजूकेशनल दूरदर्शन, एजुकेशनल रेडियो (EDUSAT- ज्ञानदर्शन, ज्ञानवाणी) आदि का उपयोग भी सूचना के संप्रेषण के लिए शिक्षा के क्षेत्र में किया जा रहा है।
गत्यात्मक एवं संलग्न अधिगम (Making the Learning More Dynamic, Engaged and interactive):
तकनीकी का एकीकरण कक्षा को अंतःक्रियात्मक बनाने में सहायता करता है।
जब टेक्स्ट के साथ-साथ चित्र, ग्राफ, ओडियो, वीडियो, एनीमेशन आदि का उपयोग पाठ्यवस्तु के संचालन के लिए किया जाता है तो शिक्षार्थियों, जिनकी अधिगम शैली अलग-अलग होती है, उन सभी को पाठ्यवस्तु को समझने में आसानी होती है । यह पाठ्यवस्तु को अधिक रोचक बना देती है, जो शिक्षार्थी के ध्यान केन्द्रण को पूर्ण कक्षा के दौरान सुनिश्चित करता है । कक्षा के दौरान PPT प्रेजेंटेशन, डाक्यूमेंट्री कैमरा, इंटरएक्टिव वीडियो, इंटरएक्टिव वेब आदि का प्रयोग शिक्षक एवं शिक्षार्थी एवं शिक्षार्थी शिक्षार्थी के मध्य अंतः क्रिया को बढ़ावा देता है। तकनीकी का उपयोग कर शिक्षक अधिक से अधिक शिक्षार्थियों के साथ आसानी से पहुँच सकता है तथा उनके साथ संवाद स्थापित कर सकता है एवं उनके प्रतिपुष्टि एवं जिज्ञासा को शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का हिस्सा आसानी से बना सकता है।
पाठ्यवस्तु का संवर्धन (Enriching the content of the Lesson):
शिक्षक मल्टीमीडिया साधनों, वेब रिसोर्सेस, इंटरएक्टिव वीडियो, विंडोज मूवी मेकर, माइक्रोसॉफ्ट वर्ड, माइक्रोसोफ्ट एक्सेल, पिकासा आदि का प्रयोग कर पाठ्यवस्तु का संवर्धन कर सकता है।
वैकल्पिक आकलन (Promoting Alternative Assessment):
वैकल्पिक आकलन, विशेष रूप से अधिगम के लिए आकलन एवं अधिगम के रूप में आकलन के लिए e-पोर्टफोलियो, रयूबीस्टार, ब्लॉग, फोरम आदि का उपयोग किया जा रहा है। डाटा बेस मैनेजमेंट सिस्टम (माइक्रोसॉफ्ट एक्सेस) का उपयोग स्टूडेंट प्रोफाइल तैयार करने के लिए किया जाता है।
अधिगम को सुगम बनाना (Serving as Facilitator in the Process of Learning):
शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में तकनीकी का समावेश अधिगम को सुगम बनाने में सहायक होता है। यह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में शिक्षार्थियों की संलग्नता सुनिश्चित कर तथा उनके द्वारा पाठ्यवस्तु या समस्या के समाधान के खोज की प्रक्रिया को निर्देशित कर सीखने की प्रक्रिया को सुगम बनाता है।
स्व-अधिगम (Promoting Self Learning):
तकनीकी का उपयोग स्व-अधिगम को प्रोत्साहित करता है। कंप्यूटर असिस्टेड लर्निंग, वेब बेस्ड लर्निंग (ऑनलाइन कोर्स, इंटरएक्टिव वेब, मल्टीमीडिया साधन ), वेब रिसोर्सेज आदि का उपयोग स्व-अधिगम को बढ़ावा देता है। इनका उपयोग कर शिक्षार्थी अपनी विशिष्ट क्षमता, अधिगम शैली तथा अधिगम दर के साथ सीखता है।
जीवन-पर्यंत अधिगम (Promoting Life - Long Learning):
तकनीकी द्वारा शिक्षार्थी जीवन पर्यंत विषयगत ज्ञान को अद्यतन करने तथा इसके विस्तार के लिए कार्य कर सकता है। इस दिशा में वे वेब रिसोर्सेज, इंटरएक्टिव वेब, वेबिनार, प्रोफेशनल कम्युनिटी, वीडियो कांफ्रेंसिंग (स्काइप) आदि का उपयोग किया जा सकता है।
मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा (Promoting Open and Distance Learning):
तकनीकी जैसे फोरम, चैट, ब्लॉग, वीडियो कांफ्रेंसिंग, LMS आदि का प्रयोग मुक्त तथा दूर शिक्षा व्यवस्था को सशक्त बना सकता है। आज मुक्त शिक्षा व्यवस्था में ऑनलाइन कोर्सेस का उपयोग भी किया जा रहा है।
जन-शिक्षा (Promoting Mass Education):
जन शिक्षा (प्रौढ़ शिक्षा, जनसंख्या शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, साक्षरता कार्यक्रम, जागरूकता कार्यक्रम) के लिए एजूकेशनल रेडियो, एजूकेशनल दूरदर्शन, समाचार (ई-समाचार, ई-न्यूज़लेटर) सोशल मीडिया, प्रोफेशनल कम्यूनिटी आदि को व्यवहार में लाया जा सकता है ।
गुणवत्तापरक शिक्षा की सार्वभौमिकता (Promoting Universalisation of Quality Education):
तकनीकी द्वारा देश के सुदूर इलाकों को मुख्यधारा के साथ जोड़ा जा सकता है। शिक्षकों की कमी, विद्यालयों की कमी तथा शिक्षण-अधिगम संसाधनों की कमी को बहुत हद तक पूरा कर तथा मुक्त विद्यालयों के सशक्तीकरण द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता का संवर्धन किया जा सकता है तथा शिक्षा को देश के कोने-कोने तक पहुँचाया जा सकता है। तकनीकी द्वारा NIOS केन्द्रों, NGOs तथा सरकारी विद्यालयों के साथ जोड़कर गुणवत्तापरक शिक्षा की सार्वभौमिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है। NCERT द्वारा चल रही ई-पाठशाला परियोजना द्वारा गुणवत्तापरक शिक्षण-अधिगम सामग्री तथा गुणवत्तापरक शिक्षकों की कमी को दूर किया जा सकता है। स्कूल काम्प्लेक्स में विद्यमान सभी स्कूलों को तकनीकी (इंट्रानेट, वीडियो कांफ्रेंसिंग ब्लॉग, ग्रुप आदि) द्वारा जोड़कर संसाधनों तथा शिक्षकों की कमी को बहुत हद तक पूरा किया जा सकता है।
सतत वृत्तिक विकास (Continuous Professional Development):
वेबिनार, वीडियो कांफ्रेंसिंग, ब्लॉग, फोरम, सोशल मीडिया, विकीएडुकेटर,
ऑनलाइन कोर्स (MOOCS) द्वारा शिक्षक विद्यालयी शिक्षा तथा अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे नए-नए विकास तथा अभ्यासों से अवगत हो सकता है तथा अपने वृत्तिक ज्ञान तथा क्षमता को अद्यतन कर सकता है।
विद्यालयी प्रशासन एवं प्रबंधन (School Administration and Management):
LMS, डाटा बेस मैनेजमेंट सिस्टम, CCTV, ब्लॉग, फोरम, वीडियो कांफ्रेंसिंग आदि के माध्यम से विज्ञापन, भर्ती परीक्षा, ऑनलाइन परीक्षा, स्टूडेंट प्रोफाइल, उपस्थिति रजिस्टर, सत्रीय कार्य, रिपोर्टिंग, BRC या CRC स्तर पर होनेवाले बैठक, संगोष्ठी, कार्यशाला आदि की व्यवस्था सुचारु रूप से की जा सकती है।
पाठ-सहगामी क्रियाएँ (Co-Scholastic Activities):
स्पीकर, माइक्रोफोन, वीडियो रिकॉर्डिंग, PPT, इंटरएक्टिव वीडियो, एनीमेशन, वर्चुअल फील्ड एक्सपीरियंस, वर्चुअल लैब, विंडोज मूवी मेकर, पिकासा, विंडोज मीडिया प्लेयर, डाक्यूमेंट्री कैमरा आदि के माध्यम से पाठ-सहगामी क्रियाओं के संगठन को सुव्यवस्थित किया जा सकता है।
स्पष्ट है कि शिक्षा में तकनीकी की विशेष भूमिका है। इसने शिक्षा के स्वरुप को ही परिवर्तित कर दिया है। प्रत्यक्ष शिक्षा का स्थान वेब बेस्ड लर्निंग तथा ब्लेंडेड लर्निंग लेता जा रहा है। पाठ तथा पाठ सहगामी गतिविधियों के प्रभावकारी आयोजन के लिए मल्टीमीडिया उपागम का सहारा लिया जा रहा है। इसने वैकल्पिक आकलन की व्यस्था को इंटरएक्टिव वेब 2.0 उपकरणों के प्रयोग द्वारा प्रोत्साहित किया है। इसने मुक्त तथा दूरस्थ शिक्षा व्यवस्था को वीडियो कांफ्रेंसिंग तथा LMS द्वारा सशक्त बनाया है। इसने अध्यापक शिक्षा के अभ्यास शिक्षण कार्यक्रम तथा शिक्षकों के सतत वृत्तिक विकास को भी बढ़ावा दिया है। इसके द्वारा गुणवत्तापरक शिक्षा की सार्वभौमिकता, स्व-अधिगम, जीवन पर्यंत अधिगम तथा जन शिक्षा को एक नयी दिशा मिली है । अतः आज तकनीकी एकीकृत शिक्षा की आवश्यकता अनिवार्य प्रतीत होती है।
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