पचारिक पर्यावरण शिक्षा - formal environmental education
पचारिक पर्यावरण शिक्षा - formal environmental education
पर्यावरण शिक्षा की व्यवस्था तथा आयोजन औपचरिक तथा अनौपचारिक दोनों ही स्तरों पर किया जाता है । औपचारिक पर्यावरण की शिक्षा बालकों में सचेतना, बोध, कौशल तथा अभिवृत्ति का विकास करती है। औपचारिक पर्यावरण शिक्षा के चार समन्वित घटक माने गये है
(अ) पर्यावरण सचेतना
(ब) वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में सार्थकता
(स) स्त्रोत का संरक्षण तथा
(द) अपेक्षित विकास
इन घटकों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है-
(अ) पर्यावरण सचेतना- इसके अन्तर्गत व्यक्तियों में भौतिक, जैविक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के पक्षों की जागरूकता प्रदान की जाती है। पर्यावरण का जीवन प्रणाली से सम्बन्ध स्थापित करते है । वायु, जल, भूमि, सूर्य, प्रकाश तथा जीव जन्तुओं का मानव जीवन से सम्बन्ध बतलाना चाहिए जिनका जीवन से गतिशील सम्बन्ध है । मनुष्य सबसे महत्वपूर्ण प्रणाली है तथा उसका उत्तरदायित्व भी अधिक है।
(ब) वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में सार्थकता- पर्यावरण को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से सम्बन्धित करना चाहिए यहाँ परिस्थितियां स्थानीय हो, जिनका व्यक्ति से सीधा सम्बन्ध हो तथा उनकी जानकारी तथा अनुभव भी हो। प्रत्येक क्षेत्र की समस्याओं की प्राथमिकता भिन्न होती है।
(स) प्राकृतिक स्रोतों का संरक्षण- प्राकृतिक स्त्रोतों का प्रयोग वर्तमान पीढ़ी को इस प्रकार उपयोग करना चाहिए जिससे भावी पीढ़ी को भी कठिनाई का सामना न करना पड़े।
(द) अपेक्षित विकास- प्राकृतिक स्त्रोतों की उपयोगिता का लक्ष्य अपेक्षित विकास करना है। इसलिए स्त्रोतों का उपयोग समझदारी से करना चाहिए। सभी प्राकृतिक स्रोत सीमित है तथा जीवन प्रणाली की अभिवृद्धि की भी सीमा होती
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