संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाएँ - four stages of cognitive development

संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाएँ - four stages of cognitive development


पियाजे का मानना था कि सभी बच्चे संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाओं से क्रमश: गुजरते हैं। इन अवस्थाओं को सामान्यतः विशेष आयुवर्ग के साथ जोड़ा जाता है पियाजे के अनुसार बच्चे किसी एक अवस्था से दूसरी अवस्था तक पहुंचने में कम या अधिक समय लगा सकता है या फिर वे किसी स्थिति में एक ही अवस्था की विशेषताएँ भी दर्शा सकते हैं या फिर किसी अन्य स्थिति में उच्चतर या निम्नतर अवस्था की विशेषताएँ भी दर्शा सकते हैं। अतः बच्चे की केवल आयु के आधार पर हम यह नहीं बता सकते कि वह किस प्रकार सोच रहा है। पियाजे आयु के स्थान पर चरण (Stage) को पसंद करते हैं जो आयु से व्यापक होता है।


शैशवावस्था संवेदी पेशीय अवस्था (0-2 वर्ष)


संज्ञानात्मक विकास के प्रारंभिक काल को संवेदी पेशीय अवस्था कहते हैं। इस अवस्था में बच्चा अपनी सांवेदिक इंद्रियों ( देखना, सुनना, चलना, छूना, चखना आदि) एवं पेशीय गतिबिधियों द्वारा सीखता है। ये बच्चे वस्तु स्थायित्व (Object Permanence) के विकास को दर्शाते हैं। इसका अभिप्राय है कि बच्चा यह समझने लगता है कि यदि कोई वस्तु उसके सामने उपस्थित नहीं है तो भी उसका अस्तित्व रह सकता है

यद्यपि बच्चा उसका इन्द्रियों से साक्षात् अनुभव नहीं भी कर पाता है। यहीं से बच्चों में मानसिक निरूपण (Mental Representation) की क्षमता का विकास होता है। वस्तु स्थायित्व (object permanence) से पहले बच्चों से चीजें लेकर छिपाना बहुत ही आसान होता है लेकिन इसके विकास के बाद बच्चे छुपायी गई वस्तु को यहां-वहां देखने और खोजने का प्रयास करने लगते हैं। इससे यह पता चलता है कि बच्चे को यह समझ है कि अपने सामने नहीं होने पर भी वस्तु मौजूद रहती है। संवेदी पेशीय अवस्था की एक मुख्य उपलब्धि यह भी है कि इसमें उद्देश्यपूर्ण कार्यों की शुरुआत होती है। इस अवस्था में बच्चे बड़ों के व्यवहार को दोहराते हैं। वे बड़ों की कही हुई बातों को याद रखकर उन्हीं के व्यवहार को उनकी अनुपस्थिति में दोहराते हैं। नकल उतारने जैसा व्यवहार (Deferred imitation) करते है। वे रोजाना दिखाने वाली गतिविधियों की नकल भी उतारते है तथा काल्पनिक गतिविधियाँ भी करते हैं। जैसे खाना बनाने आदि का अभिनय करना। ऐसे खेलों को बनावटी खेल (Make-Believe play) कहते हैं। 


पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (2-7 वर्ष )


संवेदी-पेशीय अवधि के अंत तक बच्चे बहुतसी क्रियाएं (Actions) करने लगते हैं।

इस अवस्था में बच्चे मानसिक संक्रियाएँ (Operation) करना प्रारंभ करते हैं। मानसिक संक्रिया से अभिप्राय है कि सोच के साथ क्रियाएँ करना एवं मन-मस्तिष्क में समस्या को हल करने का प्रयास करना। पूर्व संक्रियात्मक अवस्था में बच्चे निपुणता की ओर बढ़ते हैं परंतु वह अभी पूर्ण रूप से मानसिक संक्रियाओं के उपयोग में निपुण नहीं होते इसीलिए इसे पूर्व संक्रियात्मक अवस्था कहते हैं।


इस अवस्था में बच्चे हर कार्य शारीरिक क्रियाओं से न करके सांकेतिक मानसिक क्रियाओं द्वारा करने का प्रयास करते है। इस अवस्था में बच्चे शब्द, संकेत, चिन्ह, हाव-भाव आदि का प्रयोग कर पाते हैं। यह इस अवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उदाहरण के लिए बच्चे घोड़ा शब्द या घोड़े के चित्रों का प्रयोग या फिर तकिये पर बैठकर घोड़ा चलाने का प्रयास करते हैं, जबकि घोडा असल में सामने प्रस्तुत नहीं होता है। इस प्रकार प्रतीकों जैसे भाषा, चित्र, चिन्ह या हावभाव का प्रयोग करने की क्षमता जिससे हम किसी वस्तु या क्रिया को मानसिक प्रक्रिया द्वारा दर्शाते हैं

उसे लाक्षणिक कार्य (Semiotic functions) कहते हैं। जैसे खाली कप से पानी पीने का नाटक करना आदि। बच्चों के व्यवहार धीरे-धीरे विस्तृत होते जाते हैं। इस अवस्था में भाषा का विकास बहुत अधिक तेजी से होता है। 2-4 वर्ष के बच्चों की भाषा में 200 से 2000 शब्दों तक की वृद्धि होती है। 


इस अवस्था के दौरान बच्चों की वस्तुओं के विषय में सांकेतिक रूप में सोच केवल एक ही दिशा तक सीमित हो पाती है। उनके तर्क केवल एक ही दिशा में विकसित होते हैं। बच्चों के लिए उल्टा सोचना अर्थात किसी कार्य के चरणों को अंत से प्रारंभ तक सोच पाना मुश्किल होता है जैसे दो और दो चार होते हैं, वे यह तो सोच सकते हैं लेकिन चार में से दो कम होने पर दो होगा, यह सोच पाना मुश्किल होता है। अतः इस अवस्था के बच्चों के लिए प्रतिवर्ती सोच (Reversible thinking) मुश्किल होती है जैसे द्रव्य संरक्षण (Conservation) के दौरान बच्चा यह सोच नहीं पाता है कि यदि अलग प्रकार के बर्तनों में पानी की मात्रा बराबर है यदि हम चौड़े बर्तन के पानी को लंबे बर्तन में डालने के बारे में सोच सके।


संरक्षण का अर्थ है कि किसी वस्तु की संख्या द्रव्यमान और भार पर उसके रूप परिवर्तन का प्रभाव नहीं पड़ता।

उदाहरण के लिए यदि दस टॉफियों को पास-पास रखा जाए या दस्तूर या फिर पंक्तियों में रखा जाए या वृत्ताकार परंतु सभी ही रूपों में टॉफियों की संख्या समान ही रहेगी।  


पियाजे के अनुसार इस अवस्था में बच्चे केवल एक ही तर्क पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाते हैं। जैसे गिलास वाले जल संरक्षण कार्य के दौरान बच्चे केवल गिलास में पानी की ऊँचाई पर ध्यान दे पाते हैं। उनसे उस दौरान, एक स्थिति में एक से अधिक तर्कों पर ध्यान नहीं दिया जाता है जिसे विकेंद्रीकरण (Decentering) भी कहते हैं। अतः इस अवस्था में बच्चे का सोचना वातावरण के प्रत्यक्ष इंद्रिय अनुभव तक ही सीमित बना रहता है।


पूर्व संक्रियात्मक अवस्था के दौरान बच्चे की सोच एक तरफ से आत्मकेंद्रित (Egocentric) होती है

अर्थात् बच्चे के लिए आसपास के सभी अनुभव उसी प्रकार होते हैं, जैसे उसके खुद के अनुभव हो। उदाहरण के लिए यदि दो साल की स्नेहा को चूहों से डर लगता है, तो उसके अनुसार उसकी उम्र के सभी बच्चों को चूहों से डर लगता है। इस अवस्था में बच्चे अपने ही दृष्टिकोण, भावों और प्रतिक्रियाओं तक ही सीमित रहते हैं। यही कारण है कि इस उम्र में बच्चे यह नहीं समझ पाते कि उनके सामने खड़े व्यक्ति का सीधा हाथ उसी दिशा में नहीं है जहां उनका अपना हाथ है।


पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था के बच्चों के लिए वस्तुओं को उनकी श्रेणी तथा उपश्रेणी में बॉटने (Categorization) में दिक्कत आती है। उदाहरण के लिए, यदि बच्चे को 16 फूल दिखाए जाएँ, जिनमें से 12 लाल और 4 नीले हो और उनसे पूछा जाए कि क्या लाल फूल ज्यादा है या कम तो बच्चा यह नहीं सोच पाता कि लाल और नीले फूल, एक बड़ी श्रेणी फूल में ही आते हैं। पूर्व संक्रियात्मक अवस्था के दौरान बालकों के बनावटी खेल और जटिल हो जाते है। वे दूसरे बच्चों के साथ मिलकर सामाजिक नाटकीय खेलों के दौरान मम्मी-पापा का नाटक करना, मैडम बनकर बच्चों को पढ़ाना आदि खेलते हैं। 


मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7-11 वर्ष) 


मूर्त-सक्रियात्मक अवस्था में बच्चे बातावरण में उपस्थित तार्किक स्थायित्व (logical Stability) को समझ पाते हैं। वह यह जान पाते हैं कि आकृति या आकार में परिवर्तन के बावजूद वस्तुओं की कुछ विशेषताएँ समान या अपरिवर्तित रहती है तथा यह परिवर्तन हम चरणों को अंत से प्रारंभ तक करके भी देख सकते हैं।


पियाजे के अनुसार बच्चे इस अवस्था में संरक्षण की समस्याओं के समाधान में सुधार कर पाते हैं। इस अवस्था में आ कर तर्क के तीन मुख्य पहलुओं का विकास होता है। पहला, यदि किसी वस्तु में कुछ जोड़ा या घटाया जाए तो वह समान रहती है चाहे उसके बाहरी रूप में परिवर्तन कर दिया जाए। इसे पहचान (Identity) कहते हैं। दूसरा प्रतिपूर्ति (Compensation ) है। अर्थात् यदि एक दिशा में बदलाव है तो दूसरी दिशा में भी बदलाव होगा जैसे यदि गिलास पतला है तो पानी की ऊँचाई में बृद्धि होगी।

तीसरा प्रतिबर्तन (Reversiblity) अर्थात् बच्चे बदलाब को अंतिम से प्रारंभिक चरण तक मानसिक रूप से सोच सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि चौड़े मुँह के बर्तन से लंबे मुंह के बर्तन में पानी डाला जाए, तो पानी की ऊँचाई का स्तर क्या होगा, वे यह सोच पाने में सक्षम होते हैं।


इस अवस्था में बच्चों में वर्गीकरण करने की क्षमता का विकास होता है। बच्चे एक विशेषता के आधार पर चीजों को समूह में बांट सकते हैं जैसे मुर्गा शतुरमुर्ग आदि सभी पक्षी की श्रेणी में आते हैं। वे वस्तुओं को छोटे से बड़े के क्रम और बड़े से छोटे के क्रम में भी लगा सकते है जिसे क्रमबद्धता (Seriation) कहते हैं। उदाहरण के लिए यदि राम, श्याम से लंबा है और श्याम, हिना से लंबा है तो राम, हिना से लंबा है।


इस अवस्था में वर्गीकरण, संरक्षण, क्रमबद्धता, प्रतिवर्तन आदि संज्ञानात्मक विशेषताओं के साथ ही बच्चे की सोच की एक जटिल और पूर्ण संरचना का विकास होता है।

इस अवस्था की एक सीमा यह है कि बच्चे की सोच केवल मूर्त स्थिति या भौतिक यथार्थ (physical Reality) तक ही सीमित होती है। बच्चा तर्क को केवल मूर्त स्थितियों में प्रयुक्त कर सकता है। वे काल्पनिक तथा अमूर्त समस्याओं के विषय में नहीं सोच पाते हैं। साथ ही वे उन स्थितियों के बारे में भी नहीं सोच पाते जिनमें एक साथ कई क्रियाओं का प्रयोग होता है। इनकी विशेषताओं का विकास बाद में घटित होता है।


अमूर्त-संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage ) ( 11 वर्ष की आयु से ऊपर)


इस अवस्था के दौरान बच्चों में अमूर्त संक्रियाओं का विकास होता है तथा वे बहुतसी क्रियाओं का प्रयोग एक ही समय पर कर पाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि बच्चा जिस स्थिति के बारे में सोच रहा हो उस स्थिति का पूर्व में कभी अनुभव भी किया हो। वह मात्र कल्पना द्वारा ही स्थिति को समझ पाता है।

उदाहरण के लिए यदि सभी किसानों ने खेती करना छोड़ दिया हो तो क्या होगा? इस अवस्था में आकर बच्चे में परिकल्पना आधारित (Hypothetical) निगमनात्मक तार्किक चिंतन का विकास होता है। यह समस्या समाधान की एक विधि है जिसमें बच्चा समस्या के सभी कारकों की पहचान करता है। तत्पश्चात निगमन विधि का प्रयोग कर प्रत्येक समाधान का विश्लेषण करता है। इस अवस्था में वे आगमन विधि का प्रयोग भी कर पाते हैं जिसमें पहले विशिष्ट स्थितियों का अवलोकन किया जाता है और फिर सामान्य निष्कर्ष तथा सिद्धान्त का निर्माण किया जाता है।


बच्चे यह समझ पाते हैं कि सभी लोगों के अलग-अलग विचार, दृष्टिकोण, भाव तथा प्राथमिकताएँ होती हैं। वे अपने विचारों को दूसरों की तुलना में आंकने लगते हैं। इस अवस्था केवच्चे वैज्ञानिक कल्पना के उपन्यासों में भी रुचि लेने लगते हैं। बच्चे सभी विकल्पों में से आदर्श विकल्प का चुनाव निगमन विधि द्वारा कर पाते हैं। बच्चे समाज, राजनीति में रुचि लेने लगते हैं क्योंकि वे एक आदर्श समाज की कल्पना कर पाते हैं। खुद के भविष्य का चुनाव कर सकते हैं। पियाजे के अनुसार अधिकतर वयस्क कुछ क्षेत्रों में ही अमूर्त संक्रियाएँ सोच पाते हैं जिनमें उनकी रुचि या अनुभव होता है। यह जरुरी नहीं कि वे हर क्षेत्र में अमूर्त रूप से सोच पाए। यह भी एक बिबाद (Debate) का विषय है कि क्या सभी बच्चे अमूर्त सक्रियात्मक अवस्था तक पहुंच पाते हैं? पहली तीन अवस्थाएँ प्रत्यक्ष रुप से उपस्थित होने के कारण सभी बच्चों में समान पाई जाती हैं। परंतु चौथी अवस्था आगमन-निगमन विधि तथा अमूर्त संक्रियाओं पर आधारित होने के कारण प्रत्यक्ष रुप से उपस्थित और अवलोक्य नहीं होती है। अतः यह कहना उचित नहीं कि अपने जीवन में सभी व्यक्ति पियाजे के संज्ञानात्मक विकास की अंतिम अवस्था तक पहुँच पाते हैं।