फ्रेडरिक फ्रोबेल , फ्रोबेल का शिक्षा दर्शन - Friedrich Froebel, Froebel's Philosophy of Education
फ्रेडरिक फ्रोबेल , फ्रोबेल का शिक्षा दर्शन - Friedrich Froebel, Froebel's Philosophy of Education
परिचय
फ्रेडरिक फोबेल का जन्म सन् 1782 ई. में जर्मनी के एक गाँव ओवर बेसबारब में हुआ था। वे अभी अबोध शिशु ही थे कि उनकी माता का देहान्त हो गया। फलस्वरूप बचपन अत्यन्त ही उपेक्षित रहा। पिता पादरी थे, अतः समय के अभाव में बालक फोबेल की समुचित देखभाल करने वे सर्वथा असमर्थ थे। घर के धार्मिक वातावरण तथा स्थानीय प्राकृतिक सौंदर्य ने उनके मन पर गहरी छाप डाल दी इस प्रकार प्रारंभ से ही फोबेल ने विश्व की समस्त बस्तुओं में व्याप्त एकता का दर्शन किया। शिक्षा की किण्डरगार्टन बिधि के जन्मदाता फ्रेडरिक फ्रोबेल थे। बै ईश्वर की सत्ता का सर्वत्र दर्शन करने वाले महान आदर्शवादी दार्शनिक थे। उन्होंने घोषित किया कि सृष्टि के सभी पदार्थों में एक शाश्वत नियम व्याप्त रहता है। वस्तुतः यह सार्बभौम एकता ही ईश्वर है। फोबेल के इस नवीन शिक्षा दर्शन ने शिक्षा क्षेत्र में एक महान क्रांति को जन्म दिया।
फ्रोबेल का शिक्षा दर्शन (Froebel's Philosophy of Education)
फोबेल आदर्शवादी आध्यात्मवाद के पोषक थे। वह एक अद्वैतवादी दार्शनिक थी वह समस्त विश्व में ईश्वर की सत्ता का दर्शन करते थे और यही कारण है कि विश्व के समस्त प्राणियों में समस्त वस्तुओं में एक अक्षुण्ण आंतरिक एकता की वह घोषणा करते थे। उन्होंने वस्तुतः यह अनुभव किया कि विश्व की समस्त वस्तुओं तथा पदार्थों में एक शाश्वत नियम व्याप्त है। इसके आधार में सार्वभौम चेतना तथा अभिन्नता स्थित है। यही अभिन्नता तथा एकता ईश्वर है। यही फ़ोर्बल का दार्शनिक सिद्धांत है। फोबेल के शिक्षा दर्शन के मूल में भी यही आध्यात्मिक सिद्धांत है।
फ्रोबेल का विश्वास था कि प्रत्येक जीव अथवा प्राणी में ईश्वरीय सत्ता व्याप्त है। इस सत्ता अथवा शक्ति का विकास प्रत्येक प्राणी में अपने ढंग से होता है। वस्तुतः इस विकास के पीछे एक सुसंबद्ध प्राकृतिक योजना कार्य करती है। अतः फोबेल रूसों की तरह मूल प्रवृत्तियों के स्वतंत्र तथा पूर्ण प्रस्फुटन विकास को अत्यधिक महत्व देता है। इसमें कृत्रिम बाधायें अथवा नियम बाधक ही होते हैं। अतः स्वतः क्रिया द्वारा बच्चों का विकास स्वाभाविक एवं स्वस्थ रूप में होता है। फ्रोबेल चाहता है कि बच्चे स्वयं अपने मन से सक्रिय होकर अपनी प्रेरणाओं तथा भावनाओं को पूर्ण करने के लिए कार्य करें। उसके विचार में मिट्टी अथवा वस्तुओं के कार्य बच्चों से कराकर उनके जीवन को वास्तविक रूप से उन्नतिशील तथा विकासात्मक बनाया जा सकता है।
इसे ही स्वतः क्रिया अथवा रचनात्मक क्रियाशीलन द्वारा अभिव्यक्ति तथा विकास का मनोवैज्ञानिक सिद्धांत कहा जाता है।
फोबेल के शिक्षा दर्शन में समाज को बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। रूसो ने समाज से दूर प्रकृति की एकात गोद में शिक्षा की स्था की है, किंतु फोबेल ने शिक्षा के सामाजिक आधार को आवश्यक माना है। उसका विश्वास है कि व्यक्ति मूलतः सामाजिक है। अतः उसकी शिक्षा-दीक्षा तथा शैक्षणिक क्रियाएँ समाज में ही हो। वह कहता है कि शिक्षोपरात तो व्यक्ति को समाज में ही विभिन्न उत्तर दायित्वों का निर्वाह करना पड़ता है। इसलिए उसकी शिक्षा व्यवस्था भी समाज में ही होनी चाहिए जिससे उसे सामाजिक आचरणों का समुचित प्रशिक्षण प्राप्त हो तथा अपने दायित्वों का पूर्ण ज्ञान हो सके।
फोबल ने व्यक्ति को व्यावहारिक दक्ष एवं उपयोगी बनाने के लिए घरेलू परिश्रम साध्य कार्य करने की व्यवस्था को भी शिक्षा का आवश्यक अंग बताया है। खेल बोझ उठाना, जमीन खोदना, पानी खींचना, टेला अथवा पत्थर फोड़ना आदि क्रियाओं को अपने किण्डरगार्टन में समावेश किया। वस्तुतः उसने बालक शाला तथा समाज तीनों को समन्वित कर दिया। सामाजिक सहयोग के कार्य, स्वयं क्रिया तथा बौद्धिक क्रियाशीलन 'किण्डरगार्टन प्रणाली के प्राण है। वस्तुतः किण्डरगार्टन विद्यालय समाज का एक लघुरूप ही बन जाता है।
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