मित्र मंडली, खेल तथा जनसंचार माध्यम - Friendship, Sports and Mass Media

मित्र मंडली, खेल तथा जनसंचार माध्यम - Friendship, Sports and Mass Media


मित्र मंडली मित्र मंडली (Peer Group) बच्चे के विकास को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है। मित्र मंडली का तात्पर्य समान आयु वर्ग या परिपक्वता स्तर के (हमउम) व्यक्तियों से है। मित्र मंडली परिवार से बाहर की दुनिया में तुलना एवं सूचना व्यवस्था के स्रोत के रूप में कार्य करती है। बच्चे भी अपने समान आयु के लोगों से अपनी सामाजिक तथा वौद्धिक योग्यताओं (क्षमताओं) के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। वे एक मानक की तरह कार्य करते हैं जिससे बच्चे आपसी क्रियाकलाप की तुलना करते हैं। बड़े होने पर बच्चे मित्र मंडली के साथ अधिकाधिक समय बिताना पसंद करते हैं। सामाजिक एकाकीपन अनेक समस्यात्मक व्यवहारों को जन्म देता है। ऐसे बच्चे विद्यालय से भागने से लेकर विभिन्न अपराधों तक में शामिल होते हैं। मित्र मंडली का आपसी संबंध चार प्रकार का हो सकता है-


लोकप्रिय बच्चे - ऐसे बच्चे मित्र मंडली द्वारा बहुत पसंद किए जाते हैं तथा प्रायः अच्छे दोस्त के रूप में पहचाने जाते हैं। उनमें उच्च मात्रा में सकारात्मक व्यवहार तथा निम्न मात्रा में नकारात्मक व्यवहार देखने को मिलता है। 


औसत बच्चे - ये बच्चे अक्सर समान उम्र के लोगों द्वारा पसंद किए जाते हैं तथा साधारणतः अच्छे दोस्त के रूप में नामित किए जाते हैं। उनका ऋणात्मक तथा धनात्मक व्यवहार साधारण स्तर का होता है। 


अस्वीकृत बच्चे - ये अपने समान उम्र के बच्चों द्वारा सक्रिय रूप से नापसंद किए जाते हैं तथा अच्छे मित्र के रूप में अक्सर नामित नहीं किए जाते हैं। इन लोगों का ऋणात्मक एवं सकारात्मक व्यवहार निम्न स्तर का होता है। विवादास्पद बच्चे साधारणतः ऐसे बच्चे समान उम्र के बच्चों द्वारा नापसंद किए जाते हैं

लेकिन अक्सर मित्र के रूप में नामित किए जाते हैं। इनका ऋणात्मक एवं सकारात्मक दोनों ही तरह का व्यवहार उच्च मात्रा में होता है।


खेलः बचपन में मित्र मंडली के बीच पारस्परिक अंतःक्रिया मुख्यतः खेल के माध्यम से जुड़ी होती है। खेल या क्रीडा एक आनंददायक कार्य है जिसमें जुड़ाव अपने लिए होता है। यह एक छोटे बच्चे के स्वास्थ्य के विकास के लिए आवश्यक है। खेल मित्र मंडली के सदस्यों के बीच जुड़ाव तनाव से मुक्ति, प्रौढ संज्ञानात्मक विकास तथा खोजबीन की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है। खेल इस संभावना को बढ़ाता है कि बच्चे एक-दूसरे के साथ परस्पर अंतःक्रिया करेंगे। खेल अतिरिक्त शारीरिक ऊर्जा तथा तनाव से बच्चे को मुक्त करता है।


जनसंचार माध्यम 


पिछले 40-50 वर्षों में बच्चों तथा किशोरों के जीवन में मीडिया ने क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है।

अखबार, पत्रिका, रेडियो, टेलीविजन, कम्प्यूटर तथा मोबाइल अधिकतर मध्यमवर्गीय परिवारों में मौजूद हैं। किशोर अपनी उम्र के बाकी किशोरों से जुड़ने के लिए मोबाइल का खूब उपयोग कर रहे हैं। इसी तरह टी. बी. हर घर में अपनी जगह बना चुका है। हालांकि कई शोध टी. बी के कारण बढ़े रहे दुष्प्रभावों को उजागर करते हैं जैसे बच्चों की पढ़ने की क्षमता और सृजनात्मक क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव, गुस्से का बढ़ना, सामाजिक समूहों का कम होना आदि। आजकल विद्यालयों में भी स्मार्ट कक्षाओं का प्रयोग किया जा रहा है। परंतु टी. बी. का सिर्फ नकारात्मक प्रभाव ही नहीं है। यदि टी. वी कार्यक्रम दिखाए जाएँ जिनमें बड़ों का भी सहयोग हो, तो बच्चे को सीखने में टी.वी. एक सुदृढ़ और प्रभावकारी माध्यम सिद्ध हो सकता है। टी. वी के माध्यम से संज्ञानात्मक भावनात्मक तथा सामाजिक विकास होता है। जन-संचार के कुछ सकारात्मक प्रभाव इस प्रकार हैं-


1) जन-संचार माध्यमों द्वारा बच्चों की जिज्ञासा शांत होती है। वे अपने आस-पास हो रही घटनाओं को समझ पाते हैं तथा उनमें जिज्ञासाओं का प्रसार होता है।


2) जन-संचार के माध्यम में भाषा के ही अलग-अलग रूपों का प्रयोग होता है जिससे बालक अवगत होता है तथा उसकी भाषा का दायरा विस्तृत होता है।


3) बैन्ड्ररा (Bandura) के अनुसार, बच्चा अवलोकन द्वारा सीखता है। टी. बी पर दिखाए गए कार्यक्रमों को दोहराकर बच्चे नई नई बातें सीखते हैं। जनसंचार माध्यमों द्वारा बच्चे की सृजनात्मकता बढ़ती है तथा समस्या समाधान की प्रवृत्ति का विकास होता है। 

इन सकारात्मक पक्ष के साथ ही मीडिया बच्चों के पढ़ने का समय घटा कर उन्हें निष्क्रिय बनाकर, हिंसा का मॉडल उपलब्ध करा कर तथा संसार का एक अवास्तविक रूप उपलब्ध कराने की भूमिका निभाता है। शिक्षक बच्चे के विकास में समाज के प्राँठ लोगों का विशेष योगदान होता है

जैसे माता-पिता, दादी-दादा, शिक्षक आदि। परिवार के बाद यदि कोई वयस्क बच्चे के जीवन में अहम भूमिका निभाता है तो वह है-शिक्षक अपने दिन के कई घंटे बच्चे अपने शिक्षक की छत्र-छाया में रहता है। शिक्षक, बच्चे के सामाजिक तथा व्यक्तिगत विकास में एक अहम कड़ी होता है। जिन बच्चों को घर में भावनात्मक समर्थन नहीं मिल पाता तथा कई व्यक्तिगत समस्याएँ आती है ऐसे बच्चों के लिए शिक्षक एक मार्गदर्शक की भूमिका अदा करता है। शिक्षक बच्चे को सही दिशा में कार्य करने हेतु अग्रसर करता है। उन बच्चों के लिए जिन्हें स्कूल में सहपाठियों के दुर्व्यवहर का सामना करना पड़ता है, शिक्षक कक्षा में एक सौहार्दपूर्ण तथा स्नेहपूर्ण वातावरण बनाकर उन्हें प्रेरित करता है। शिक्षक बच्चों की व्यक्तिगत समस्याओं को सुनकर उनकी मदद भी कर सकते हैं। एक अच्छे शिक्षक को कक्षा के हर बच्चे के साथ एक सकारात्मक तथा सौहार्दपूर्ण व्यवहार रखना चाहिए। शिक्षक को सदैव एक प्रेरक के रूप में कार्य करना चाहिए। शिक्षण की पद्धति को रोचक तथा सृजनात्मक बनाना चाहिए ताकि बालक कुछ उपयोगी सीख सके। शिक्षक को बालकों के लिए उचित लक्ष्य रखने चाहिए ताकि बच्चे उन्हें पूर्ण कर सके। परंतु यह लक्ष्य उनके वर्तमान ज्ञान में वृद्धि करने वाला होना चाहिए। बच्चों को उस लक्ष्य तक पहुंचने में उनकी सहायता करनी चाहिए तथा उन्हें प्रेरणा देनी चाहिए।

शिक्षक को संयमी, अच्छा श्रोता, प्रेरणा दायक, मृदुभाषी तथा आदरणीय होना चाहिए। शिक्षक को अपने जीवन को आदर्शपूर्ण रखना चाहिए ताकि बालक उनकी उपस्थिति से ही बहुत कुछ सीख सके।


आपने संज्ञानात्मक विकास के बारे में पियाजे तथा बायगोत्सकी के विचारों के बारे में पढ़ा पियाजे के अनुसार बच्चों की चितन प्रक्रिया प्रौढ़ों से गुणात्मक रूप से भिन्न होती है। बच्चे अपनी समझ को समावेशन तथा समायोजन की प्रक्रियाओं द्वारा सक्रिय रूप से गढ़ते हैं। संज्ञानात्मक विकास चार अपरिवर्तनीय चरणों के क्रम में होता है। सांवेदिकपेशीय चरण में बच्चे वस्तु-स्थायित्व तथा कार्यों को विपरीत क्रम में करने की योग्यता विकसित कर लेते हैं। पूर्व-संक्रियात्मक चरण में प्रतीकात्मक चिंतन, आत्मकेंद्रिता तथा संधारण की क्षमता का अभाव पाया जाता है। मूर्त संक्रियात्मक चरण में बच्चे संधारण विपरीत दिशा में चिंतन, वर्गीकरण तथा क्रम में व्यवस्थित करने की क्षमताएँ प्रदर्शित करते हैं परंतु उनका सोचना उनके तात्कालिक वातावरण में विद्यमान वस्तुओं के साथ जुड़ा रहता है। प्रौढ़ों में पाया जाने वाला चिंतन तथा तर्क, जिसमें अमूर्त संप्रत्ययों का उपयोग किया जाता है औपचारिक संक्रियात्मक चरण में ही प्राप्त होता है। बायगोत्सकी ने सामाजिक बातावरण के विभिन्न पक्षों जैसे- परिवार, समुदाय, मित्र तथा विद्यालय की, बच्चों के विकास में भूमिका पर बल दिया है। उन्होंने बच्चे के निष्पादन में व्यक्त क्षमताओं के मापन की जगह उनकी प्रच्छन्न क्षमताओं (ZPD) के मूल्यांकन पर बल दिया।