जेंडर आधारित समाजीकरण की प्रक्रिया - Gender Based Socialization Process

जेंडर आधारित समाजीकरण की प्रक्रिया - Gender Based Socialization Process


समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मनुष्य समाज के विभिन्न व्यवहार, रीति-रिवाज़, गतिविधियाँ इत्यादि सीखता है। जैविक अस्तित्व से सामाजिक अस्तित्व में मनुष्य का रूपांतरण भी समाजीकरण के माध्यम से ही होता है। समाजीकरण के माध्यम से ही वह संस्कृति को आत्मसात करता है। समाजीकरण की प्रक्रिया मनुष्य का संस्कृति के भौतिक व अभौतिक रूपों से परिचय कराती है। सीखने की यह प्रक्रिया समाज के नियमों के अधीन चलती है। समाजशास्त्र की भाषा में कहें तो समाज में अपनी परिस्थिति या दर्जे के बोध और उसके अनुरूप भूमिका निभाने की विधि को हम समाजीकरण के ज़रिए ही आत्मसात करते हैं। समाजीकरण व्यक्ति को सामाजिक रूप से क्रियाशील बनाता है। इसी के माध्यम से संस्कृति के अनुरूप आचरण करने का विवेक विकसित होता है। इसके लिए व्यक्ति द्वारा सांस्कृतिक मूल्यों का जो अभ्यंतरीकरण किया जाता है वह समाजीकरण का ही रूप है।


जेंडर का ताल्लुक समाज में स्त्री-पुरुष के बीच गैर-बराबरी के आईने से है। यह अंग्रेजी के 'सेक्स' या हिंदी के 'लिंग' से अलग है। 'सेक्स' का संबंध महिला-पुरुष के बीच शारीरिक बनावट के फर्क से है। वहीं, 'जेंडर' का संबंध महिला-पुरुष के बीच सामाजिक तौर पर होने वाले फ़र्क से है। पितृसत्तात्मक समाज की संरचना जेंडर - विभेद पर आधारित होती है। जैसे- बेटे की चाह, कन्या हत्या, स्त्री-पुरुष में भेदभाव व सामाजिक कामों में स्त्रियों का पुरुषों से नीचे का दर्जा जेंडर हमें इन सभी सामाजिक भेदभाव को समझने का नजरिया देता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो यह एक सूचना है, जो ज्ञान के रास्ते से होकर गुजरता है और हमें समाज में सोचने समझने का नजरिया देता है। कमला भसीन के अनुसार 'जेंडर सामाजिक-सांस्कृतिक रूप में स्त्री-पुरुष को दी गई परिभाषा है, जिसके माध्यम से समाज उन्हें स्त्री और पुरुष दोनों की सामाजिक भूमिका में विभाजित करता है।