जेंडर संवेदनशील शिक्षाशास्त्र, जेंडर की दृष्टि से विद्यालयी अनुभवों पर मनन एवं युक्तियाँ शिक्षकों की संवेदनशीलता - Gender sensitive pedagogy, reflections and tips on school experiences from a gender perspective, teachers' sensitivity

जेंडर संवेदनशील शिक्षाशास्त्र, जेंडर की दृष्टि से विद्यालयी अनुभवों पर मनन एवं युक्तियाँ शिक्षकों की संवेदनशीलता - Gender sensitive pedagogy, reflections and tips on school experiences from a gender perspective, teachers' sensitivity


जेंडर संवेदनशील शिक्षाशास्त्र एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था पर बल देता है जिससे बालिकाओं, शिक्षिकाओं व अन्य महिला कर्मियों के अधिकारों को संवर्धित किया जा सके ताकि वे विद्यालय के विभिन्न क्रियाकलापों में क्रमशः बालकों, शिक्षकों व अन्य पुरुष कर्मियों के समान सुविधाएँ एवं अवसर प्राप्त कर सकें।


यह लिंगों की समानता के आधार पर बालिकाओं, शिक्षिकाओं तथा अन्य महिला कर्मियों के अधिकारों की वकालत करता है। कक्षा गतिविधियों या अन्य विद्यालय गतिविधियों में बालिकाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने का प्रयास किया जाता है जिससे उनमें शिक्षक तथा विद्यालय के प्रति सौहार्द्रता का भाव बना रहे।

यह बालिकाओं की अभिव्यक्ति को उचित रूप से सुने जाने पर बल देता है ताकि वे अपनी सामाजिक अस्मिता एवं वास्तविक क्षमताओं में तुलना कर सकें।


जेंडर संवेदनशील शिक्षाशास्त्र स्त्रीवादी विचारधारा से स्वयं को जोड़ने का प्रयास करता है ताकि शिक्षा की व्यवस्था दोनों ही लिंगों के लिए समान रूप से संवेदनशील बनाई जा सके। यह विचारधारा किसी पर थोपी नहीं जाती वरन बालिकाओं के लिए सक्रिय सहभागिता तथा अपनी क्षमताओं के प्रयोग के व्यापक अवसर प्रदान कर उन्हें शिक्षकों तथा बालकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विभिन्न विद्यालयी एवं कक्षा संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए उत्तरदायी बनाया जाता है जिससे उनमें आत्मविश्वास एवं सशक्त होने का भाव पैदा होता है।


विद्यालयों में जेंडर संवेदनशील शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय के विभिन्न गतिविधियों या अनुभवों को स्त्रीवादी दृष्टिकोण से पुनर्गठित किया जाए। इन अनुभवों द्वारा बालिकाओं को यह एहसास कराया जाना चाहिए कि स्त्रियाँ समाज के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के समान सक्षम हैं तथा उनके पास पुरुषों के समान जीवन जीने के कई विकल्प हैं।


कक्षा अधिगम वातावरण: कक्षा में ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाना चाहिए जो जेंडर समावेशी हो । जहाँ बालिकाओं को बालकों के समान अपने अभिरुचि तथा अभिक्षमता के आधार पर अधिगम अनुभवों के चयन तथा संगठन की स्वायत्तता हो। उनकी अभिव्यक्ति को बालकों के समान प्राथमिकता दी जाए ताकि वे अपनी क्षमता की पहचान कर उसका विकास कर सकें।

कक्षा में बालकों के साथ-साथ बालिकाओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर अधिगम युक्तियों का निर्धारण किया जाना चाहिए ताकि बालिकाएँ अपनी जिज्ञासा एवं संशय को बिना किसी डर एवं हिचकिचाहट के शिक्षकों एवं अन्य विद्यार्थियों के समक्ष रख सकें। स्त्रीवादी विमर्शों तथा बालिकाओं के सामाजिक अस्मिता से जुड़ीं चुनौतियों को पाठ-प्रसंग के रूप में एकीकृत कर बालिकाओं को अपनी पाठ-संबंधी समस्याओं एवं व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान के लिए तैयार किया जा सकता है। बालिकाओं तथा बालकों दोनों को इन पाठ -संबंधी प्रसंगों पर विचारविमर्श, वाद-विवाद, प्रश्नोत्तरी, संघर्ष समाधान, भूमिका मंचन, घटना विवरण एवं कहानी कथन का हिस्सा बनाकर जेंडर समानता के प्रति जागरूक एवं संवेदनशील बनाया जा सकता है।


शिक्षण-अधिगम सामग्री: शिक्षकों द्वारा तैयार किए गए शिक्षण-अधिगम सामग्री की भाषा, जेंडर शून्य होनी चाहिए या स्त्री एवं पुरुष दोनों रूपों को व्यवहार में लाना चाहिए।

अधिगम सामग्री में स्त्री एवं पुरुष के उदाहरण, फोटो एवं चित्र समान रूप से दिखाई देने चाहिए। समान श्रेणीबद्ध स्तर पर तथा गैर- रुढिवादी भूमिकाओं में स्त्री एवं पुरुष के उदाहरण, फोटो एवं चित्र भी दिखाई देने चाहिए। किसी विमर्श को लेकर स्त्री एवं पुरुष दोनों की सोच या विचार को प्रस्तुत करना चाहिए।


पाठ-सहगामी गतिविधियाँ: पाठ-सहगामी गतिविधियों में बालिकाओं एवं बालकों दोनों की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। स्त्रीवादी विमर्शों को विभिन्न पाठ सहगामी गतिविधियों जैसे वाद-विवाद, नाटक, कहानियाँ, कविता-पाठ, प्रश्नोत्तरी, निबंध प्रतियोगिता, विद्यार्थी क्लब गतिविधियाँ आदि का हिस्सा बनाकर बालकों एवं बालिकाओं दोनों को इन गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। उनमें यह भाव पैदा किया जाना चाहिए कि स्त्री एवं पुरुष दोनों में क्षमताओं का भरमार हैं तथा वे जीवन के हर क्षेत्र में चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम हैं। इन गतिविधियों के आयोजन की जिम्मेदारी समान रूप से बालकों एवं बालिकाओं को दी जानी चाहिए, जिससे उनमें नेतृत्व, पारस्परिक सहयोग एवं सामंजस्य क्षमता का विकास हो सके।