जेंडर - gender
जेंडर - gender
इस शब्द का प्रयोग दो रूपों में होता है। पहले यह एक व्याकरणिक इकाई के रूप में प्रयुक्त होता था, जिसे हिंदी में लिंग कहते हैं। अंग्रेज़ी में हम मैस्कुलीन और फेमिनिन जेंडर के रूप में इसे देखते हैं। परंतु यहां जेंडर का संबंध किसी पुरुष अथवा स्त्री की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान से है। जैविक रूप में किसी का स्त्री या पुरुष होना एक प्राकृतिक घटना है, परंतु इसी के आधार पर जब समाज एक खास तरह का पूर्वग्रह या अवधारणा विकसित कर उसके लिए तमाम तरह के नियम कानून लगा देता है और जैविक लिंग के आधार पर कई प्रकार के भेद करने लगता है तो उसे जेंडर से जोड़ा जाता है। कहा जा सकता है कि जैविक पहचान से जुड़े होने के कारण जेंडर सामाजिक भेद की प्राचीनतम और (लगभग शाश्वत जैसी बना दी गई) व्यवस्था है। यह व्यवस्था किसी के स्त्री या पुरूष होने के आधार पर सामाजिक दृष्टि से भिन्न व्यवहार करती है। जेंडर का संबंध एक खास तरह की सोच या विचारधारा से है, जिसमें धार्मिक विश्वास, रीति रिवाज, मूल्य, परंपराएं आदि शामिल होती हैं जो नवजात बच्चे को जन्म से ही इस संरचना के अनुकूल बनाने का काम करती हैं। इस विचारधारा को स्वाभाविक रूप से सामाजिक व्यवस्था एवं संस्कृति का अंग बना दिया जाता है जो समाज में पीढ़-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहती है। यह व्यवस्था जीवन की मूलभूत जरूरतों, जैसे-वस्त्र, भोजन, भाषा आदि को जेंडर के आधार पर तय करते हुए इसे तार्किक जामा पहनाती है और इसे न्यायोचित सिद्ध करती है।
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