जेंडर - gender
जेंडर - gender
तीन दशकों से भारत में जेंडर, नीति निर्धारण एवं पाठ्यचर्या निर्माण में एक महत्वपूर्ण अवयव रहा है । जेंडर को मुख्यतया लड़कियों या स्त्री के परिप्रेक्ष्य में रखकर ही देखा गया है। इसे एक वियुक्त वर्ग के रूप में देखा गया है जो किसी भी मुद्दे से अलग है। उन्हें समान सुविधाएँ देने के संदर्भ में भी देखा गया है। शिक्षा में जेंडर समानता एक जटिल सोच है जो शिक्षा की प्रकृति एवं गुणवत्ता से जुड़ी है और इस बात पर केंद्रित है कि किस प्रकार शिक्षा, लड़कियों को अपने पसंद के विकल्प को चुनने एवं अपने अधिकारों के लिए खड़े होने में सक्षम बनाती है।
जेंडर एक सामाजिक संवर्ग कोटि है जो कि जैविक नहीं है। समाज ने व्यक्ति के लिए मुखौटो के रूप में लिंग आधारित कुछ विशेष कार्य सौंप दिए हैं जैसे एक महिला या पुरुष को समाज में कैसा व्यवहार करना है।
जिसके कारण यह विशिष्ट वर्गों में विभाजित है अन्यथा यह जैविक वर्ग ही रहता। जेंडर का संबंध एक ओर पहचान से है तो दूसरी ओर सामाजिक विकास की प्रक्रिया के तहत स्त्री-पुरुष की भूमिका से। जहाँ मनुष्य और मनुष्य के बीच अंतर किया गया और एक को स्त्री और दूसरे को पुरुष कहा गया। जेंडर के संबंध में विस्तार से बात करने से पहले कुछ बातें विमर्श के संदर्भ में हो जाएं। सरल शब्दों में कहा जाए तो यह एक सूचना है जो ज्ञान के रास्ते से होकर गुजरता है और हमें सोचने-समझने का नजरिया देता है। कमला भसीन के अनुसार 'जेंडर सामाजिक-सांस्कृतिक रूप में स्त्री-पुरुष को दी गई परिभाषा है, जिसके माध्यम से समाज उन्हें स्त्री और पुरुष दोनों की सामाजिक भूमिका में विभाजित करता है। यह समाज की सच्चाई को मापने का एक विश्लेषणात्मक औजार है'। मैत्रयी कृष्णराज लिखती हैं समाज में जितनी भी आर्थिक और राजनैतिक समस्याएं हैं, उनका संबंध जेंडर से है। 'जेंडर लिंग आधारित श्रम का विभाजन हैं जिसे पितृसत्ता ने सामाजिक अनुशासनों द्वारा तय किया, जिसकी संकल्पना को परिवार और आर्थिक आधार पर खोजना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त जेंडर एक विश्लेषणात्मक श्रेणी है जो सामाजिक संरचना व उसके जटिल व्यवहारमूलक संबंधों को स्त्री-पुरुष के बीच के संबंधों से जानने का प्रयास करता है' । शर्मिला रेगे जेंडर को विचार की प्रक्रिया मानती हैं साथ ही ऐसा वर्ग है जिसमें कुछ संबंधों कोरखा जाए और उनसे निर्मित संबंधों को जाना जा सके। उमा चक्रवर्ती भी सामाजिक संरचना को स्त्री की निर्मिति का कारण मानती हैं- 'स्त्री का परिवेश उसकी पराधीनता की प्रकृति को तय करता रहा है'।
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