सामाजिक विज्ञान शिक्षण के सामान्य सिद्धान्त - General Principles of Social Science Teaching

सामाजिक विज्ञान शिक्षण के सामान्य सिद्धान्त - General Principles of Social Science Teaching


शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को समाजोपयोगी बनाना है। सफल शिक्षण मूल सामान्य सिद्धांतो पर आधारित है। 


1) जीवन से सम्बन्ध स्थापित करने का सिद्धान्त


विषय वस्तु का छात्रों के वास्तविक जीवन के साथ सम्बन्ध स्थापित करना जरूरी है। जॉन ड्युई के अनुसार, *शिक्षा जीवन है।' छात्रों के पर्यावरण से विषयवस्तु का सम्बन्ध प्रस्थापित करने से ही विषयवस्तु का ज्ञान अधिक सुगमता और गति से प्राप्त कर सकते हैं। सामाजिक अध्ययन मानवीय सम्बन्धों का विश्लेषक होने के कारण वास्तविक जीवन का विषयवस्तु से सम्बन्ध प्रस्थापित करना जरूरी है। तात्पर्य, सामाजिक विज्ञान शिक्षण के पाठ्यक्रम वास्तविक जीवन से सम्बंधित होना चाहिए।


2) रूचि का सिद्धान्त


सफल शिक्षा के लिए विषयवस्तु के प्रति रूचि विकसित करना जरूरी है।

छात्रों में विषयवस्तु की रूचि से ही शिक्षण सफल होता है। जिस कार्य में रूचि होती है वह कार्य अपनी सारी शक्तियों का उपयोग कर पूरा करता है। रूचि विकसित होने पर ही छात्र विषय वस्तु का तल्लीनता से अध्ययन करेंगे। सामाजिक विज्ञान शिक्षण को सफल बनाने के लिए छात्रों में रूचि विषय वस्तु के प्रति रूचि होना जरूरी है। विभिन्न साधनों की सहायता से विषयवस्तु में छात्रों की रूचि निर्माण कर सकते हैं। पिन्सेंट के अनुसार "जब तक छात्रों में सक्रिय रूचि न होगी. तब तक शिक्षण का सर्वोत्तम कार्य नहीं होगा।"


3) प्रेरणा का सिद्धान्त


कियाशीलता उत्पन्न करने वाली आन्तरिक शक्ति प्रेरणा है जिससे व्यक्ति अपने लक्ष्य की और अग्रसर होता है। प्रेरित होने पर छात्र क्रियाशील होकर अपने कार्य में रूचि लेता है। उसका सकारात्मक परिणाम ज्ञानार्जन पर होता है। नया ज्ञान प्रेषित करने से पूर्व सामाजिक विज्ञान के शिक्षक को उन्हें सिखाने के लिए प्रेरित करना आवश्यक है। विभिन्न साधन एवं तंत्रों की सहायता से छात्रों को शिक्षक प्रेरित कर सकते है। 


4) क्रिया का सिद्धान्त


शिक्षा में क्रियाशीलता का महत्वपूर्ण योगदान है। सामाजिक विज्ञान शिक्षण में छात्रों को क्रियाशील बनाने के विभिन्न अवसर है। क्रियाशीलता शिक्षा का मुलभूत एवं मनोवैज्ञानिक आधार है। छात्रों को सक्रिय एवं समाज कुशल व्यक्ति बनाने के लिए सामाजिक विज्ञान शिक्षक को सदैव प्रयास करना चाहिए। रायबर्न के अनुसार, "छात्र की क्रियाशीलता का सिद्धान्त सम्पूर्ण शिक्षण में सर्वप्रथम महत्व रखता है।" 


(5) निश्चित उद्देश्य का सिद्धान्त


शिक्षा सोदेश्य क्रिया है। सामाजिक विज्ञान शिक्षण के उदेश्यों की पूर्णता पाठ्यक्रम एवं पाठ्य सहगामी क्रियाओं से की जा सकती है। निश्चित उद्देश्यों की पूर्णता के लिए निश्चित एवं नियोजित प्रयास की जरूरत है। शिक्षक एवं छात्रों को सामाजिक विज्ञान शिक्षण के उद्देश्य ज्ञात होना चाहिए। 


6 ) चयन का सिद्धान्त


छात्रों की योग्यता, रूचि, आवश्यकता के अनुसार उपयोगी एवं लाभप्रद ज्ञान का चयन कर छात्रों के लिए उपलब्ध करना आवश्यक है। रायबर्न के अनुसार, “चयन का सिद्धान्त अति महत्वपूर्ण है और शिक्षक के अच्छे चयन की योग्यता पर उसके कार्य की सफलता बहुत कुछ निर्भर रहती है।" सामाजिक विज्ञान शिक्षण में चयन की योग्यता का होना बहुत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। 


7) नियोजन का सिद्धान्त


नियोजन श्रम, समय एवं पैसा बचाता है। ज्ञान को छात्रों के सामने प्रस्तुत करने से पूर्व उसका नियोजन जरूरी है। शिक्षक के अध्यापन को सफल बनाने में नियोजन महत्वपूर्ण है। कक्षा अध्यापन से पूर्व पाठ्यांश, पाठ्य उद्देश्य, अध्यापन विधि एवं तंत्र, शैक्षिक साधन सामग्री, फलक लेखन आदि का पूर्व नियोजन जरूरी है। 


8) विभाजन का सिद्धान्त


विषयवस्तु को सुगम बनाने के लिए उनका प्रस्तुतीकरण क्रमिक सोपानों में होना चाहिए। सोपानों की रचना क्रमबद्ध ढंगसे होनी चाहिए जिससे वह एक सोपान से दूसरे सोपान तक पहुँच सके। 


9) लोकतान्त्रिक व्यवहार का सिद्धान्त


लोकतान्त्रिक पर्यावरण का निर्माण करना सामाजिक विज्ञान शिक्षण का प्रधान उद्देश्य है। लोकतान्त्रिक व्यवहार यह जीवन की विधि है। लोकतान्त्रिक व्यवहार का अर्जन जीवन में करना आज के युग में महत्वपूर्ण है। इसकी शुरुआत कक्षा एवं विद्यालय के वातावरण से होती है। शिक्षक का छात्रों के साथ का वर्ताव मित्र, सहयोगी एवं पथप्रदर्शक के रूप में होना चाहिए। कक्षा में छात्रों को लोकतान्त्रिक व्यवहारों की अनुमति शिक्षक द्वारा प्राप्त होनी चाहिए। कक्षा में और कक्षा के बाहर शिक्षक का वर्ताव पक्षपात रहित होना चाहिए। सामाजिक विज्ञान शिक्षण की सहायता से छात्रों में सहयोग, सहानुभूति, स्वतंत्र विचारणा, निर्णय क्षमता आदि गुणों का विकास कर सकते है।

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10) आवृत्ति का सिद्धान्त


छात्रों को अर्जित किए ज्ञान को स्थाई बनाने के लिए आवृत्ति की आवश्यकता होती है। मनोवैज्ञानिक थार्नडाइक ने आवृति के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। छात्रों की आवश्यकता के अनुसार आवृत्ति के सिद्धान्त का पालन कर सकते है।