उपहार तथा उद्यम - Gifts and Occupation

उपहार तथा उद्यम - Gifts and Occupation


उपहार बालक के समक्ष किसी न किसी किया का मूर्त रूप प्रस्तुत करते हैं और उन्हें बालक के विकास की अवस्थाओं के अनुरूप क्रम से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उदयम उन क्रियाओं को कहा गया है जो कि उपहारों से भासित होती हैं। उपहारों को क्रमपूर्वक प्रस्तुत करने से ही बालक में विभिन्न विचारों के लिए प्रेरणा उत्पन्न होती है और वह एक स्तर से दूसरे स्तर की और बढ़ता जाता है।


प्रथम उपहारः इसमें विभिन्न रंगो की छ ऊन की गैर्द होती हैं। बालक उनसे खेलता है और घुमाता है। यह घुमाना ही उद्यम है। ये ऊनी गर्द ही बालक को रंग, विशेष पदार्थ, रूप, गीत तथा दिशा का ज्ञान कराती है। द्वितीय उपहारः द्वितीय उपहार में सख्त लकड़ी के बने हुए घन गोला तथा बेलन (Cube Sphere and Cylinder) होते हैं। उद्यम के क्रम में बालक इन तीनों उपहारों की गतियों को देखता है।


तृतीय उपहार इस उपहार में आठ समान भागों से विभाजित एक बड़ा लकड़ी का घन होता है। यह आठ टुकड़े भी घनाकार होते है और बालक को यह बताते हैं कि खण्ड का इकाई से क्या संबंध है। इन घनों की सहायता से बालक अन्य पदार्थों की रचना कर सकता है जैसेकुर्सी, मेज, बेंच सीढ़ी इत्यादि।


अन्य उपहार इनके अतिरिक्त अन्य उपहार भी हो सकते है जैसे छड़ी तथा पटिया इत्यादि। इनसे खेलते समय, बालक को रेखाओं, धरातल तथा बिंदुओं एवं उनके पारस्परिक संबंधों का जान होता है। रचना की दृष्टि से बालक को कागजदफ्ती, बालू मिट्टी, लकड़ी तथा अन्य पदार्थो की सहायता से विभिन्न वस्तुओं को बनाने की शिक्षा दी जा सकती है।


किण्डर गार्टन पद्धति में शिक्षक निष्क्रिय व्यक्ति नहीं रहता है। इस पद्धति में उसका महत्व किसी भी प्रकार से कम नहीं होता है। जब बच्चों को उपहार दिए जाते हैं तो शिक्षक का कार्य होता है

कि उन्हें वह विभिन्न उद्यमों को बताए, जो कि उपहारों से संबंधित हो उन्हें कुछ क्रियाओं का प्रदर्शन करके भी दिखाना चाहिए। जब शिक्षक बालक को उपहार भेंट करता है तो वह उससे संबंधित गाना गाता है और इस प्रकार उनके मस्तिष्क में उपयुक्त विचार उत्पन्न करने में सहायता देता है।


पाठ्यक्रम (Curriculum):


फोबेल ने स्कूल के पाठ्यक्रम की ओर भी ध्यान दिया है। उन्होंने इसे चार भागों में विभाजित कर दिया है. (1) धर्म तथा धार्मिक शिक्षा (2) प्राकृतिक विज्ञान व गणित की शिक्षा (3) भाषा की शिक्षा तथा (4) कला एवं कला के उद्देश्य की शिक्षा विद्यालय का उद्देश्य यह नहीं है कि वह सभी बालकों को किसी न किसी कला अथवा सभी कलाओं में कुशल कलाकार बना दें, वरन् उसका उद्देश्य तो सभी मानवकापूर्ण एवं सर्वांग विकास कराना है।"