गिजू भाई - giju bhai
गिजू भाई - giju bhai
जीवन परिचय
गिजू भाई का पूरा नाम गिरजाशंकर भगवान जी बधेका था। उनका जन्म सौराष्ट्र के चितलगाँव में 15 नवम्बर सन् 1885 को हुआ था। प्रारम्भ में वे बकील थे। बकालत छोड़कर वे शिक्षा जगत में आये तथा बच्चों के धुरन्धर बकील बन गए। सन् 1916 से 1939 तक वे शिक्षा के क्षेत्र में बाल-केंद्रित शिक्षा के लिए सतत् प्रयत्नशील रहे। उनका विश्वास था कि शिक्षा बच्चों के लिए है, न कि बच्चे शिक्षा के लिए वे बच्चों के प्रति संवेदनशील रहे। उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन में शिक्षा को बच्चों की मौलिक निधि के रूप में उजागर किया। वे बाल-किशोरों की शिक्षा के साथ-साथ प्रौढ शिक्षा के भी प्रबल समर्थक थे। 23 जून 1939 ई. को 54 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ।
गिजू भाई का साहित्य
• शिक्षा साहित्य : गिजू भाई की शिक्षा सम्बन्धी 15 मौलिक रचनाएँ हैं। इसके अतिरिक्त अपने अन्य साथियों के सहयोग से उन्होंने लगभग 223 पुस्तकें लिखी थी।
उनका साहित्य गुजराती में है। उसका अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है। उनका साहित्य बाल मनोविज्ञान, शिक्षा शास्त्र एवं किशोर साहित्य से संबन्धित है।
• शिक्षण पत्रिका :- माता-पिता और शिक्षक-शिक्षिका का सही मानस बनाने के लिए गिजू भाई ने गुजराती में एक छोटी शिक्षण -पत्रिका निकाली थी इस पत्रिका ने बाल संगोपन, बाल-शिक्षण, बाल संस्कार और बाल-जीवन के मर्म की जो शिक्षा दी, उससे हजारों परिवारों में प्रकाश फैला। इस साहित्य में जो मौलिकता, मर्मस्पर्शिता, सरलता, प्रेरणा और प्राण हैं, उसी से गिजू भाई अविस्मरणीय रहेंगे। गुजराली की ही भाँति इस पत्रिका के मराठी और हिन्दी संस्करण भी निकलते रहे।
• दिवास्वप्न :- बाल शिक्षा जगत में गिजू भाई की एक अनुपम कृति है दिवास्वप्न' दिवा स्वप्न की चर्चा करते हुए गिजु भाइक एक समकालीन साथी और सहयोगी स्वर्गीय श्री हरिभाई दद्विवेदी ने लिखा था दिवास्वप्न क्या है? प्राथमिक पाठशाला की एक स्वल्प समालोचना है। यह सारी पुस्तक कहानी की शैली में लिखी गयी है।
इस गुजराती पुस्तक का पहला प्रकाशन सन् 1931 में हुआ। सन् 1934 तथा 1962 में इसके हिन्दी अनुवाद छपे। राजस्थान शिक्षा विभाग ने भी उनकी त्रैमासिक पत्रिका 'नया शिक्षक में सन् 1948 में तथा मध्य प्रदेश शिक्षक प्रशिक्षण मण्डल ने भी सन 1985 में अपनी पलाश में इसे छापा
बालकेन्द्रित शिक्षा
गिजू भाई की आत्मा में बच्चों के लिए असीम प्यार तथा शिक्षा देने की सहानुभूति थी। वे शिक्षा को बालकेन्द्रित स्वरूप देकर सम्प्रेषण के पक्षधर थे। उनका शिक्षा दर्शन सौधा-सादा बाल-दर्शन था। इसी कारण उनकी शिक्षा पद्धति बालकेन्द्रित बन गयी थी। गिजू भाई ने बच्चों के हितार्थ बाल-केन्द्रित शिक्षा के महत्व को सदैव उच्च मानक पर स्थापित किया। उन्होने बाल केन्द्रित शिक्षा की शिक्षण विधियों, अनुशासन तथा शिक्षक-शिष्य सम्बन्धों को बतलाते हुए सम्पूर्ण जीवन को एक तपस्वी के रूप में पूरा किया।
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