लड़कियों की शिक्षा- असमानता और प्रतिरोध - Girls' Education - Inequality and Resistance
लड़कियों की शिक्षा- असमानता और प्रतिरोध - Girls' Education - Inequality and Resistance
लड़कियों की शिक्षा के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा लड़कियों को लड़कों के समान शिक्षा प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध नहीं हो पाना है । हमारे यहाँ शिक्षा के सभी स्तरों और लगभग सभी पक्षों पर लड़के तथा लड़कियों की शिक्षा में असमानताएँ पाई जाती हैं। लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर लड़कों की अपेक्षा कम मिल पाते हैं। प्रजातांत्रिक स्वरूप की रक्षा के लिए तथा लड़कियों की शिक्षा के प्रसार के लिए यह आवश्यक है कि लड़कियों को भी शिक्षा प्राप्ति के लिए पर्याप्त अवसर मिलें। वास्तव में लड़के तथा लड़कियाँ दोनों को शिक्षा के अवसर मिलने चाहिए। अतः यह आवश्यक है कि शैक्षिक अवसरों की समानता स्थापित करने के लिए विशेष प्रयास किए जाएँ।
यद्यपि आज का युग विज्ञान का युग है तथा विज्ञान ने अनेक रुढ़िवादी विचारों, अंधविश्वासों तथा दोषपूर्ण रीति-रिवाज़ों की उपयोगिता को सप्रमाण नकार दिया है,
परंतु फिर भी अनेक भारतीय अब भी इन रूढ़ियों, अंधविश्वासों तथा परंपराओं का पोषण एवं समर्थन करते हैं यही कारण है कि हमारे देश की जनसंख्या के एक बड़े वर्ग में लड़कियों की शिक्षा के प्रति अभी भी सीमित, संकुचित, रुढ़िवादी, एकांकी व संकीर्ण विचार पाए जाते हैं। छुआ-छूत, बाल-विवाह, पर्दा प्रथा जैसी रूढ़ियों के कारण अनेक बालिकाओं को शिक्षा से वंचित रह जाना पड़ता है। अनेक रुढ़िवादी व्यक्ति स्त्री के कार्य क्षेत्र को घर तक सीमित रखना उचित मानकर उसकी शिक्षा का विरोध करते हैं। उनके विचारों में लड़कियाँ शिक्षा प्राप्त करके समानता व स्वतंत्रता की माँग करती हैं, जो स्त्री चरित्रहीनता का सूचक होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार की समस्या और भी अधिक उग्र प्रतीत होती है। वास्तव में यह एक अत्यंत गंभीर समस्या है जिसके कारण अनेक स्त्रियाँ अनपढ़ रह जाती हैं अथवा कुछ वर्षों के अध्ययन के उपरांत ही शिक्षा छोड़ देती हैं। प्रायः देखा गया है कि कक्षा एक में प्रवेश लेने वाली प्रत्येक सौ लड़कियों में से केवल पैतींस लडकियाँ ही कक्षा पाँच में पहुँच पाती हैं
तथा लगभग बीस ही कक्षा आठ में पहुँच पाती हैं। निर्धनता, अशिक्षित माता-पिता, रूढ़िवादिता, लड़कियों की शिक्षा के प्रति संकुचित एवं नकारात्मक दृष्टिकोण, नीरस पाठ्यक्रम, अनाकर्षक विद्यालयी वातावरण, परामर्श व निर्देशन का अभाव, दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली, अध्यापिकाओं की कमी आदि, लड़कियों की शिक्षा में अपव्यय व अवरोधन के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी होते हैं । स्त्री शिक्षा के प्रसार के लिए अपव्यय व अवरोधन की समस्या को दूर करना होगा जिसके निराकरण हेतु उपरोक्त कारणों का निराकरण करना होगा।
अतः हम कह सकते हैं कि आज आवश्यकता इस बात की है कि इस प्रकार के रुढ़िवादी व धार्मिक अंधविश्वासों तथा परंपराओं के प्रति जनमानस का दृष्टिकोण बदला जाए। इसके अतिरिक्त स्त्रियों को भी अपनी शिक्षा के प्रति उदासीनता तथा विरक्तता की भावना का परित्याग करना होगा जन आंदोलन, प्रौढ़ शिक्षा का प्रसार तथा जनसंचार के साधन इस दिशा में महत्वपूर्ण सहायता कर सकते हैं।
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