भारत में स्त्री सशक्तिकरण के लिए सरकारी प्रयास - Government Efforts for Women Empowerment in India

भारत में स्त्री सशक्तिकरण के लिए सरकारी प्रयास - Government Efforts for Women Empowerment in India


महिला विकास पर भारत सरकार की नीति में स्वतंत्रता के बाद के परिवर्तन हुए हैं। सबसे उल्लेखनीय परिवर्तन पाँचवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान आया जब स्त्रियों के कल्याण से हटकर स्त्रियों के विकास पर जोर देने की नीति अपनाई गई। महिला तथा बच्चों के विकास एवं कल्याण के लिए केंद्र सरकार ने कई योजनाएँ शुरू की हैं तथा कई नीतिगत पहले की हैं जिनमें स्त्रियों के आर्थिक तथा सामाजिक सशक्तिकरण तथा सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन के उनके पहलुओं में बराबरी हासिल करने के लिए कदम भी सामिल हैं। इन कार्यक्रमों योजनाओं और कार्यकलापों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- 

1) स्त्रियों का सशक्तिकरण 

2) स्त्रियों का प्रशिक्षण तथा रोजगार, 

3) बालिका मे प्रति व्यवहारात्मक बदलाव, 

4) स्त्रियां के लिए समर्थन सेवाएँ 

5) स्त्रियों के अधिकार और कानून।


केंद्र सरकार का महिला तथा बाल विकास एवं कल्याण विभाग संसाधन जुटाकर, संगठित करके तथा जागरूकता फैलाकर स्त्रियों के लिए कई योजनाएँ कार्यन्वित कर रहा है। मुख्य योजनाएँ इस प्रकार हैं - 


1. किशोरियों की अधिकारिता हेतु राजीव गांधी योजना (आर.जी.एस.ई.ए.जी)


यह योजना 19 नवंबर, 2010 को प्रारंभ की गई थी, जिसका उद्देश्य 11-18 वर्ष की आयु वर्ग की किशोरियों को उनकी पोषाहार तथा स्वास्थ्य स्थिति में सुधार लाकर और विभिन्न कौशलों, जैसे- गृह कौशल, जीवन कौशल तथा व्यावसायिक कौशल उन्नत करके उन्हें अधिकारिता दिलाना है। प्रारंभ में इसे प्रायोगिक तौर पर देशभर के चुनिंदा 200 जिलों में कार्यान्वित किया गया है। 


2. स्त्रियों के लिए प्रशिक्षण तथा रोजगार कार्यक्रम (एस टी ई पी ) योजना


यह योजना गरीब स्त्रियों को कृषि, पशुपालन, डेयरी, मत्स्यपालन, हथकरघा, दस्तकारी, खादी तथा ग्रामीण उद्योगों, रेशम उत्पादन, सामाजिक वानिकी तथा बंजर भूमि विकास, जैसे- 10 पारंपारिक क्षेत्रों और खाद्य प्रसंस्करण और सेवाओं के दो नये क्षेत्रों का अद्यतन हुनर उपलब्ध कराती है,

ताकि उनकी उत्पादकता तथ आय सृजन में बढ़ोत्तरी हो सके। इस कार्यक्रम की पहुँच को और व्यापक बनाने और मजबूत करने के लिए योजना के कार्यान्वयन को नवंबर, 2009 में संशोधित किया गया था। योजना का उद्देश्य स्थानीय रूप से उपयुक्त क्षेत्रों को प्रवेश कराना है। 


3. राष्ट्रीय महिला कोष (आर एम के)


आर एम के (स्त्रियों हेतु राष्ट्रीय ऋण निधि) 31 करोड़ रुपये की आधारभूत निधि से 1993 में सृजित किया गया था। आरंभिक आधारभूत निधि 180 करोड़ रुपये से अधिक बढ़ गई है, जिसमें ऋण के कारण आरक्षित और निवेश तथा वसूली प्रबंधन तथा 69 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व जातीय आवंटन शामिल है। आय सृजन से ही आर एम के गरीब स्त्रियों के लिए असंगठित क्षेत्र में प्रवाह की बढ़ोत्तरी हुई है। आजीविका संबंधी गतिविधियों हेतु ऋण उपलब्ध कराकर यह गरीब स्त्रियों और उनकी अधिकारिता पर ध्यान केंद्रित करता है। आर एम के ने सूक्ष्म वित्तपोषण, बचत तथा ऋण, एस एच जी के स्थिरीकरण तथा गरीब स्त्रियों के लिए उपक्रम विकास करते हुए कई उन्नतिकरण उपाय किए हैं। 


4. स्वयंसिद्धा


स्वयंसिद्धा स्त्रियों के सशक्तिकरणकी एकीकृत योजना है। यह योजना स्त्रियों के स्वसहायता समूहों (एस.एच.जी) के गठन पर आधारित है और इसका उद्देश्य संसाधन जुटाकर, जागरूकता फैलाकर तथा विभिन्न योजनाओं के अभिसरण के माध्यम से स्त्रियों को संपूर्ण अधिकार देना है। स्त्रियों का सर्वागीणसशक्तिकरण की इस कार्यक्रम का दीर्घकालीन उद्देश्य है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य इस प्रकार है


1. आत्मनिर्भर स्त्रियों के स्वसहायता समूहों (एस.एच.जी) की स्थापना ।


2. स्त्रियों की स्थिति, स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, स्वच्छता और सफाई, कानूनी अधिकार आर्थिक उत्थान तथा अन्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों के संबंध में स्वसहायता समूहों के सदस्यों में विश्वास तथा जागरूकता पैदा करना।


3. ग्रामीण स्त्रियों में बचत की आदत तथा आर्थिक संसाधनों पर उनके नियंत्रण को सुदृढ़ तथा संस्थागत बनाना।


4. स्त्रियों को लघु ऋण उपलब्ध कराने की सुविधा में सुधार लाना। 


5. स्थानीय स्तर की आयोजना में स्त्रियों को शामिल किया जाना।


5. स्वशक्ति परियोजना


स्व शक्ति परियोजना, जिसे ग्रामीण महिला विकास और सशक्तिकरण परियोजना के रूप में भी जाना जाता है। यह परियोजना महिला विकास निगम (डब्ल्यू. डी.सी.) के माध्यम से अन्य राज्य सरकारों के उपक्रमों और राज्यों के गैर-सरकारी संगठनों के जरिये बिहार, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तरखंड राज्यों में कार्यन्वित की गई है, जिसमें 57 जिले, 323 खंड और 7288 गाँव शामिल है। केंद्र स्तर पर एक परियोजना समर्थन इकाई (सी.पी.एस.डब्ल्यू.) परियोजना कार्यान्वयन के लिए तकनीकी तथा प्रबंधन सहायता प्रदान करती है।


स्वशक्ति ग्रामीण स्त्रियों के विकास तथा सशक्तिकरण की परियोजना है, जिसमें विश्व बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (आई.एफ.ए.डी.) दोनों द्वारा सहायता प्रदान की जा रही है। इस परियोजना का उद्देश्य स्त्रियों को कठिन परिश्रम तथा समय की कटौती संबंधी तरीकों का इस्तेमाल, स्वास्थ्य, साक्षरता और विश्वास वृद्धि तथा दक्षता विकास एवं आय-सृजन संबंधी कार्यकलापों में उनकी भागीदारी द्वारा आय पर नियंत्रण को बढ़ाकर उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने हेतु संसाधनों तक उनकी पहुँच को सुलभ बनाना है।


6. स्त्रियों के विकास और सशक्तिकरण हेतु दूरस्थ शिक्षा


इस परियोजना का उद्देश्य स्वैच्छिक सामाजिक कार्यकर्ताओं सामुदायिक आयोजनकों, सामाजिक व्यक्तियों, सुविधा प्रदान करनेवालों, स्व-सहायता समूहों के कर्मचारियों आदि को देश भर में दूरस्थ तरीके से स्त्रियों को स्व-सहायता समूहों के माध्यम से अधिकार प्रदान करने पर प्रशिक्षण हेतु प्रमाण-पत्र पाठ्यक्रम उपलब्ध कराना है।


यह परियोजना महिला तथा बाल विकास विभाग और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) द्वारा स्त्रियों के स्व-सहायता समूहों के जरिये सशक्तिकरण हेतु संयुक्त रूप से कार्यान्वित की जा रही है। चूँकि इस परियोजना का खर्च महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा वहन किया जाता है, तथापि प्रशिक्षण कार्यक्रम का विकास कार्यान्वयन 'इग्नू' का कार्य है।


संगठन के लिए शिक्षा और प्रशिक्षण, नेतृत्व संसाधनों का प्रबंधन तथा नियंत्रण, विश्वास-निर्माण और जानकारी संबंधी तत्वों जैसे क्षेत्रों को प्रशिक्षण पैकेज और पाठ्यक्रम मॉड्यूल में शामिल किया गया है।

पाठ्यक्रम डिजाइन में स्त्रियों के विश्वास, दक्षता तथा क्षमता, विशेषत: उद्यमशील दक्षता में वृद्धि करने के उद्देश्य से दक्षता का विकास में सहायता करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। उत्पादन दक्षता, सेवा सुपुर्दगी, प्रबंधन विपणन, वित्त तथा ऋण के विकास हेतु उपयुक्त कार्यनीतियों और योजनाओं की पहचान करने के लिए गैर-सरकारी संगठनों / सरकारी क्षेत्र में वास्तविक जीवन के अनुभवों को विस्तारपूर्वक बताया गया है। 


7. स्वाधार


कठिन परिस्थितियों का सामना कर रही स्त्रियों के लिए जैसे- वृंदावन, काशी आदि धार्मिक स्थानों पर अपने परिवारों द्वारा छोड़ी गई निराश्रित विधवाओं, जेल से छूटी ऐसी स्त्रियों जिनके परिवार में कोई नहीं है, प्राकृतिक आपदा के बाद जीवित बची ऐसी स्त्रियां बेघर हो गई हो तथा जिसका कोई सामाजिक आर्थिक अवलंब न हो, वैश्यालयों या अन्य स्थानों से छुड़ाई गई या भागी हुई स्त्रियों /बालिकाओं, यौन अपराधों की शिकार ऐसी महिलाओ/बालिकाओं, जिनका उनके परिवारों ने परित्याग कर दिया हो या जो विभिन्न कारणों से वापस अपने परिवारों में जाना चाहती हों,

आतंकवादी हिंसा की शिकार ऐसी स्त्रियों, जिनका परिवार में कोई न हो और न ही जीविका का कोई आर्थिक साधन हो, मानसिक रूप से बीमार ऐसी स्त्रियों, जिन्हें अपने परिवार या रिश्तेदारों का समर्थन प्राप्त न हो, की सुविधा के लिए केंद्रीय क्षेत्र में वर्ष 2001-2002 के दौरान विभाग द्वारा यह शुरू की गई थी।


इस योजना के अंतर्गत उपलब्ध सहायता पैकेज में आश्रय, भोजन, वस्त्र, स्वास्थ्य रक्षा और ऐसी स्त्रियों के लिए परामर्श, व्यवहारगत प्रशिक्षण आदि द्वारा शिक्षा, जागरूकता दक्षता उन्नयन और व्यक्ति विकास के माध्यम से उनके सामाजिक तथा आर्थिक पुनर्वास हेतु उपाय, ऐसी स्त्रियों के लिए हेल्पलाईन या अन्य ऐसी कोई सुविधा तथा विषादग्रस्त ऐसी स्त्रियों की सहायता और पुनर्वास के लिए आवश्यक अन्य किसी भी सेवा को शांति किया जाएगा।


8. बालिका समृद्धि योजना


बालिका समृद्धि योजना 2 अक्टूबर, 1887 को इस उद्देश्य के साथ शुरू की गई थी कि बालिका की समग्र स्थिति को ऊपर उठाना है और उसके प्रति परिवार तथा समाज के व्यवहार में परिवर्तन बना है।

इस योजना में भारत सरकार द्वारा परिभाषित गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों में (ग्रामीण अथवा शहरी क्षेत्र में) अगस्त, 1947 को या इससे पूर्व पैदा हुई दो बालिकाओं को शामिल किया गया है। 1 वर्ष 1997-98 और 1990-99 के दौरान यह योजना केंद्रीय क्षेत्र की स्थान परिव्यय के रूप में कार्यान्वित की गई थी। इसके अंतर्गत नवजात कन्या शिशुओं की माताओं को 500 रुपये का अनुदान देने हेतु डी.आर.डी.ए. तथा डी.यू.डी.ए. जैसी जिला स्तरीय कार्यान्वयन एजेन्सियों को धन राशि जारी की गई थी।


वर्ष 1999 में इस योजना की समीक्षा की गई थी और समेकित बाल विकास सेवा (आई.सी.डी.एस.) योजनाअवसरंचना के माध्यम से इस योजना के अंतर्गत जल प्रदान करने हेतु राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों को शत-प्रतिशत केंद्रीय सहायता देन हेतु इसका केंद्र द्वारा प्रायोजित योजना के रूप में पुननिर्माण किया गया। पुनः निर्मित योजना के अनुसार प्रस्ताव के बाद 500 रुपये की अनुदान राशि को बालिका के नाम पर बैंक या डाकखाने के ब्याज वाले खाते में जमा किया जाएगा। इसके अतिरिक्त बालिका प्रत्येक कक्षा उत्तीर्ण होन पर कक्षा एक के लिए 300 रुपये से लेकर दसवीं कक्षा के लिए 1000 रुपये तक की छात्रवृत्ति पाने की हकदार होगी। छात्रवृत्ति राशि को भी उपर्युक्त खाते में जमा किया जाएगा। खाते में जमा संचित राशि बालिका को 18 वर्ष की आयु पूरा करने तथा अब तक अविवाहित रहने पर दी जाएगी। 


9. कामकाजी स्त्रियों के लिए होस्टल


कामकाजी स्त्रियों के लिए दिन में बच्चों की देखरेख के केंद्रों सहित, होस्टल भवनों के निर्माण / विस्तार की योजना के अंतर्गत कामकाजी स्त्रियों के लिए होस्टलों के निर्माण हेतु स्त्रियों/सामाजिक कल्याण/महिला शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत स्वैच्छिक संगठनों, स्थानीय निकायों तथा सहकारी संस्थाओं, सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों, महिला विकास निगमों शैक्षणिक संस्थाओं तथा राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, ताकि महिलाएँ रोजगार खोज सकें तथा तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें। इस योजना का उद्देश्य घर से दूर रहने वाली कामकाजी स्त्रियों को सस्ता तथा सुरक्षित होस्टल आवास उपलब्ध करना है। इसमें एकल कामकाजी महिलाऐं, अलग तलाकशुदा महिलाएँ तथा ऐसी महिलाऐं जिनके पति शहर से बाहर हों, लक्षित लाभार्थी हैं। रोजगार के लिए प्रशिक्षण ले रही महिलाऐं तथा विद्यालय के लिए व्यावसायिक पाठ्यक्रम में पढ़ने वाली छात्राएँ भी होस्टल में रह सकती हैं। 


10. सामुदायिक परिसंपत्ति सृजन हेतु अधिक लाभ कमाने संबंधी विधियों के लिए सहायता


कुएँ से जल निकालने चारा तथा इंधन लकड़ी को एकत्र करने तथा काटने आदि जैसे कार्यों में स्त्रियों के कठिन परिश्रम ने स्त्रियों की आर्थिक कार्य तथा सामुदायिक कार्यकलापों से उन्हें प्राप्त होने वाले फायदों के स्तर को प्रभावित किया है। यह परियोजना कुछ ऐसी राशियों प्रदान करती है,

जिनसे स्व-सहायता समूह परिसंपत्तियों को सृजित करने के लिए समुदायों की प्रति गाँव 2,00,000 रुपये की अधिकतम सहायता की जा सकती है। स्व सहायता समूह अन्य विकासात्मक योजनाओं स्थानीय निकायों से अनुदान, समुदाय से दान राशि और अन्य योजनाओं के साथ अभिसरण के माध्यम से और अधिक धनराशि प्राप्त करने हेतु इस धनराशि का इस्तेमाल कर सकते हैं।


यह परियोजना सरकारी या गैर-सरकारी सेवाओं को दोहराने के बजाय अंतर को पूरा करती है। परिसंपत्ति के सृजन के संबंध में निर्णय लेने की शक्ति समुदाय को प्राप्त होगी। सृजित परिसंपत्ति का इस्तेमाल और रख रखाव भी वृहत समुदा द्वारा किया जाएगा। परियोजना स्व-सहायता समूहों द्वारा 40 प्रतिशत परिसंपत्ति लागत राशि की व्यवस्था करने के बाद अपने हिस्से के 60 प्रतिशत का अंशदान करेगी। इसके अतिरिक्त अन्य स्रोतों से श्री धनराशि जुटाई जाएगी, तथार्थ कम से कम 10 प्रतिशत राशि गाँव वासियों द्वारा वहन की जाएगी, जो श्रम सामग्री के दान के रूप में भी हो सकती है।


11. स्त्रियों के संबंध में कानून


घरेलू हिंसा के सरक्षण विधेयक, 2002 स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत करने के उद्देश्य

में मई, 2002 को यह विधेयक मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने संबंधित विभाग की स्थायी समिति को भेजा था। स्थायी समिति ने 12/12/2002 को संसद में घरेलू हिंसा से संरक्षण विधेयक, 2002 पर अपनी सिफारिशों सहित 124 वीं प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था। 


स्त्रियों संबंधी – कार्य बल का प्रतिवेदन: योजना आयोग के उपाध्यक्ष श्री के.सी.पंत की अध्यक्षता में महिला संबंधी कानूनों और कार्यक्रमों की समीक्षा करने हेतु अगस्त, 2002 को गठित कार्य दल ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था। इस कार्यदल ने स्त्रियों संबंधी निम्नलिखित 22 कानूनों में संशोधन की सिफारिश की थी-


1. कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 


2. फॅक्टरी अधिनियम, 1948


3. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948


4. बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976


5. विधि व्यवसायी (महिला) अधिनियम, 1923


6. प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961


7. बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986


8. चलाचित्र अधिनियम, 1952


9. ठेका श्रम ( विनियमन और उत्पादन) अधिनियमन और सेवा शर्तें) अधिनियम, 1979


10. मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936


11. बागात श्रमअधिनियम, 1951


12. कर्मकार प्रतिकार अधिनियम, 1923


13. सती (निवारण) अधिनियम, 1987


14. महिलाओं का अशिष्ट निरूपण (निषेध) अधिनियम, 1948


15. परिवार न्यायालय अधिनियम, 1948


16. दंड प्रक्रिया संहिता, 1973


17. भारतीय दंड संहिता, 1960


18. अनैतिक पणन (निवारण) अधिनियम, 1956


19. दहेज निषेध अधिनियम, 1961


12. महिलाओं के लिए राष्ट्रीय संसाधन केंद्र (एन. आर. सी. डब्ल्यू) 


विभाग में महिलाओं के लिए राष्ट्रीय संसाधन केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव किया था, जिसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं-


1. चयनित प्रतिनिधियों, नीति योजनाकारों, प्रशासनकों, न्यायपालिका, पुलिस बैंकों, आदि के सदस्यों को महिला संबंधी मुद्दों पर जानकारी देना। 


2. निम्नलस स्तर पर श्रमिकों, नव-निर्वाचित पंचायत प्रमुखों, गैर-सरकारी संगठनों के सदस्यों इत्यादि के लिए नेतृत्व संबंधी प्रशिक्षण की सुविधा देना।


3. महिला विकास के क्षेत्र में सूचना आधार स्थापित करना तथा जानकारी का प्रचार-प्रसार करना और विकास में स्त्रियों के समकालीन मुद्दों पर आँकड़ों तैयार करने की भी सुविधा देना तथा सांमजस्य स्थापित करना।


4. महिला विकास से संबंधित मौजूदा कार्यक्रमों की निगरानी तथा मूल्यांकन की सुविधा देना तथा सामंजस्य स्थापित करना।


5. महिला विकास पर अनुसंधान से संबंधित नीति और कार्यक्रमों को शुरू और समन्वित करना।


6. महिला विकास के क्षेत्र में सक्रिय रूप से संस्थाओं तथा व्यक्ति विशेष को नेटवर्क की सुविधाएँ प्रदान करना। 


7. जेंडर-संवेदी तथा सहभागिता संबंधी आयोजना और कार्यान्वयन प्रक्रियाओं के बारे में महिला और बाल विकास विभाग की संस्थानिक क्षमता को सुदृढ़ करना।


8. चयनित क्षेत्रों में नीति आयोजना कार्यान्वयन तथा निगरानी में जेंडर संबंधी परिदृश्य को शामिल करना।


9. महिलाओं के मुद्दों की वकालत करना तथा नीतिगत समर्थन प्रदान करना।


10. महिलाओं के संपूर्ण विकास के लिए सभी या किसी एक कार्यकलाप को करना।


13. स्त्री शक्ति पुरस्कार


भारतीय इतिहास में पाँच प्रमुख महिला हस्तियों, यानि कन्नगी, माता जीजाबाई, देवी अहिल्याबाई होलकर, रानी लक्ष्मीबाई तथा रानी गैडिन्ल्यू के नाम पर वर्ष 1999 में विभाग द्वारा स्त्री शक्ति पुरस्कार के रूप में पाँच राष्ट्रीय पुरस्कार शुरू किए गए।

ये पुरस्कार प्रति वर्ष ऐसी स्त्रियों विशेष को सम्मान देने तथा उनकी उपलब्धियों को मान्यता देने के लिए दिए जाएँगे, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों पर विजय पाई हो और शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती, ग्रामीण उद्योग, बन और पर्यावरण सरंक्षण तथा कला और मीडिया के जरिए स्त्रियों के मुद्दों पर जागरूकता पैदा करने तथा स्वचेतना जगाने जैसे विभिन्न क्षेत्रों में स्त्रियों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया हो।


प्रत्येक पुरस्कार में एक लाख रुपये का नकद इनाम तथा प्रशस्ति-पत्र होता है। मानव संसाधन विकास मंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय चयन समिति द्वारा पुरस्कारों के लिए चयन किया जाता है।


14. स्त्री सशक्तिकरण में राष्ट्रीय महिला आयोग का योगदान


स्त्रियों के हितों एवं अधिकारों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 के अंतर्गत 31 जनवरी, 1992 को एक वैधानिक संस्था के रूप में राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया गया।

आयोग समाज में स्त्रियों की दशा में सुधार और उनके चहुँमुखी सशक्तिकरण की दशा में होने वाले प्रयासों में अग्रणी रहा है। महिला एवं बाल विकास विभाग भारत सरकार के अधीन वर्तमान में चार स्वायत्तशासी संगठन कार्य कर रहे हैं-


1. राष्ट्रीय महिला आयोग (राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990)


2. राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (निपसिड) सोसायटी पंजीयन अधिनियम, 


3. राष्ट्रीय महिला कोष (पंजीकृत सोसायटी)1860.


4. केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड (भारतीय कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अनुसार ये संगठन पूर्ण रूप से भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित है।


15. स्त्री सशक्तिकरण एवं पंचवर्षीय योजनाएं


भारत में स्वतंत्रता के पश्चात से ही विभिन्न वर्गों व क्षेत्रों को अधिक उत्पादक बनाने, उनके संतुलित व तीव्र विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाओं का प्रावधान रखा गया है।

इन योजनाओं में विकास से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों के साथ-साथ सर्वाधिक महत्वपूर्ण व आवश्यक विषय के रूप में महिला विकास के संबंध में भी प्रत्यक्ष रूप से अनेक कार्यक्रम बनाए गए हैं।


1. प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56) प्रथम पंचवर्षीय योजना में केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड की स्थापना द्वारा स्त्रियों की समस्याओं के निदान हेतु कल्याण मूलक विचारधारा पर ध्यान केंद्रित किया गया। इस बोर्ड ने सामुदायिक विकास के विभिन्न संचालित कार्यक्रमों में स्त्रियों के संगठन पर विशेष बल दिया। केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड ने ग्रामीण स्वैच्छिक संगठनों में अनेक परिवार व बाल विकास योजनाएँ प्रारंभ की तथा स्टेट सोशल वैलफेयर एडवाइजरी बोर्ड की स्थापना की।


2. द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) द्वितीय पंचवर्षीय योजना में अधिक दबाव कृषि पर था। इसी समय यह अवधारणा सामने आयी कि स्त्रियों को श्रम की दृष्टि से अत्यंत कठोर कार्यों के विरूद्ध संरक्षण देना चाहिए और उन्हें कठिनाइयों का सामना करने हेतु मातृत्व लाभ तथा शिशु पालन केंद्र आदि की व्यवस्था की जानी चाहिए।


3. तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-66)- इससे एक प्रमुख कल्याण मापक के रूप में स्त्रियों की शिक्षा को अति आवश्यक माना गया तथा उनके स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रमों, मातृ एवं शिशु कल्याण से संबंधित सेवाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण तथा परिवार नियोजन पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित किया गया।


4. चतुर्थ पंचवर्षीय योजना (1967-74) इसमें स्त्रियों की शिक्षा पर बल दिया गया और पारिवारिक कल्याण पर ध्यान केंद्रित किया गया।


5. पंचम पंचवर्षीय योजना (1974-79)- पंचम पंचवर्षीय योजना में स्त्रियों की आय व उनके संरक्षण को त्वरित गति से बढ़ाने हेतु स्त्रियों के प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया गया। स्त्रियों के लिए कार्यात्मक साक्षरता के कार्यक्रम की सिफारिश की गई जिसमें बाल सुरक्षा, पोषण, स्वास्थ्य तथा गृह अर्थव्यवस्था आदि कौशल व ज्ञान से स्त्रियों को परिपूर्ण किया जाए।


6. छठी पंचवर्षीय योजना (1980-85 )- इस योजना में पहली बार स्त्रियों के लिए कल्याण के स्थान पर विकास पर बल दिया गया। साथ ही स्त्रियों के विकास को अवरूद्ध करनेवाले निर्णायक तत्व के रूप में स्त्रियों तक साधनों की अपर्याप्त पहुँच की समस्या का अनुभव किया गया तथा पुरुष व स्त्रियों को सम्मिलित रूप से पट्टा आदि दिलाने का कार्यक्रम प्रारंभ किया गया।


7. सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) इस योजना में स्त्रियों से संबंधित अनेक कार्य करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। उन्हें देश के विकास के लिए एक निर्णायक स्रोत के रूप में चिह्नित कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की मुख्य धारा में उनके संगठन व एकता को लक्ष्य बनाया गया। इस योजना की दूसरी मुख्य विशेषता स्त्रियों को निर्णायक साधनों तथा उत्पादक स्रोतों के रूप में मान्यता देना था।


8. आठवीं पंचवर्षीय योजना ( 1992-97)- इस योजना के अंतर्गत 1993-94 में सेंट्रल सेक्टर स्कीम के अंतर्गत कृषि में स्त्रियों की दक्षता को बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान तथा केरल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग की योजना लागू की गई। इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण स्त्रियों को प्रसार तकनीकों तथा उन्नतशील कृषि में विभिन्न पहलुओं के विषय में जानकारी प्रदान की जाती है तथा महिला किसानों के लिए शैक्षिक भ्रमण तथा कृषि गोष्ठियों का आयोजन भी किया जाता है।


9. नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002)- नौवीं योजना में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग 'योग्य' का विस्तार 28 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में किया गया। महिला सशक्तिकरण इस योजना का प्रमुख लक्ष्य रखा गया। स्त्रियों में आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षिक विकास के लिए केंद्र सरकार ने अनेक सकारात्मक कदम उठाए। इसमें स्त्रियों के विकास के लिए 30 प्रतिशत धन महिला स्वयं सहायता संस्थानों के लिए आरक्षित किया गया। महिला स्वास्थ्य की तरफ समुचित ध्यान दिया गया, स्त्रियों के पोषण स्तर को सुधारने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए गए हैं, जैसे- दोपहर का भोजन, विशेष पोषण कार्यक्रम इत्यादि । सुरक्षा के क्षेत्र में भी स्त्रियों को अनेक सुविधाएँ उपलब्ध करवाई गई। बारहवीं तक की शिक्षा की निःशुल्क व्यवस्था की गई तथा स्त्रियों पर होने वाले अपराधों के लिए अनेक कानून बनाए गए।


10. दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-2007)- 29 जून 2001 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में योजना आयोग की पूर्ण बैठक में दसवीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण पत्र के प्रारूप को स्वीकार किया गया, जिसमें महिला विकास से संबंधित विभिन्न लक्ष्य निर्धारित किए गए।


11. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) इस योजना में विकास के 25 प्रमुख क्षेत्रों को चिह्नित किया गया, जिसमें महिला विकास को सामाजिक न्याय एवं महिला सशक्तिकरण तथा महिला एवं बाल विकास' के रूप में दो क्षेत्रों में स्थान दिया गया। योजनानुसार महिला सशक्तिकरण के लिए 41 सदस्यीय वर्किंग कमेटी का गठन किया गया।


16. ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्रियों व बच्चों के विकास कार्यक्रम


द्वारका (DWCRA) – यह कार्यक्रम सन 1983 में प्रारंभ किया गया। ग्रामीण स्त्रियों को सशक्त करना इसका उद्देश्य है। इस कार्यक्रम का लक्ष्य ग्रामीण विकास हेतु कार्यक्रम में उनकी भागीदारी में सुधार करना, उनकी आमदनी में सुधार, व्यावसायिक कौशल की प्राप्ति, उनके दैनिक कार्य बोझ में कमी तथा नारी प्रतिष्ठा का बेहतर अभिगम तथा कुछ सामाजिक सेवाएं देना है।


17. इंदिरा महिला योजना (आई.एम.वाई.)


इंदिरा महिला योजना स्त्रियों के एकीकृत विकास की योजना है। इस योजना में प्राथमिकता स्त्रियों के क्षमता- विकास तथा उनके पक्ष में आय अर्जन एवं जागृति संबंधी आवश्यकताओं पर ध्यान दिया जाता है और स्त्रियों की प्रगति के लिए चलाई गई सारी योजनाओं को समुद्धिष्ट करने का विचार किया गया है। अभी इसे देश के 200 ब्लॉकों में संचालित किया जा रहा है।


18. राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण नीति


2001 वर्ष 2000- 2001 के वार्षिक बजट में वर्ष 2001 को महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया गया था। इसी अनुक्रम में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के महिला एवं बाल विकास द्वारा राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण नीति-2001 की घोषणा की गई। इस नीति के मुख्य अंश इस प्रकार हैं-


इस नीति का लक्ष्य देश में स्त्रियों की उन्नति, विकास तथा शक्ति संपन्नता है, स्त्रियों के सामाजिक तथा आर्थिक नीतियों के माध्यम से विकासात्मक वातावरण का सृजन किया जाएगा तथा राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं अन्य सभी क्षेत्रों में स्त्रियों द्वारा समस्त मौलिक अधिकारों तथा मानवाधिकारों के वस्तुतः : उपयोग हेतु वातावरण तैयार किया जाएगा। आर्थिक जीवन में सभी क्षेत्रों में स्त्रियों की भागीदारी को सुनिश्चित किया जाएगा तथा दफ्तरों, घरों तथा अन्य स्थलों पर स्त्रियों के साथ होने वाली हिंसा के सभी रूपों को समाप्त करने हेतु कानूनी प्रणालियों का सुदृढीकरण किया जाएगा। नीति निर्धारण


1. कानूनी-न्यायिक पद्धति को स्त्रियों की आवश्यकता तथा सामाजिक सुरक्षा के प्रति अधिक संवेदनशील बनाया जाएगा तथा आवश्यक होने पर नए कानून का निर्माण किया जाएगा। 


2. धार्मिक तथा सामुदायिक नेताओं की भागीदारी तथा पहल पर स्त्रियों से संबंधित वैयक्तिक कानूनों एवं सामाजिक परंपराओं को स्त्रियों के पक्ष में परिवर्तन हेतु प्रोत्साहित किया जाएगा।


3. संपत्ति में स्त्रियों के अधिकार को पुरुष के अधिकारों के समान स्तर पर लाया जाएगा तथा विरासत के स्वामित्व संबंधी कानूनों में परिवर्तन किया जाएगा। वर्तमान के संदर्भ में देखा जाए तो इस नीति का पूर्ण परिपालन हो रहा है।


19. आदिवासी महिला सशक्तिकरण योजना


10 अप्रैल 2002 को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम द्वारा अनुसूचित जनजाति की स्त्रियों के विकास के लिए आदिवासी महिला सशक्तिकरण योजना की गई। इस योजना में अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के आर्थिक विकास हेतु रियायती दर पर वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।