वृद्धि और विकास कुछ विचारणीय मुद्दे - Growth and Development Some issues to consider

वृद्धि और विकास कुछ विचारणीय मुद्दे - Growth and Development Some issues to consider


अब तक आपने वृद्धि और विकास की अवधारणा तथा उनके विभिन्न चरणों की विशेषताओं के बारे में पढ़ा। अब हम उन मुझे के बारे में जानेंगे जो विकास की प्रक्रिया को समझने में महत्वपूर्ण अन्तर्दृष्टि प्रदान करते हैं। इनके द्वारा एक शिक्षक के रूप में हमें शिक्षार्थी के विकासात्मक आयामों को समझने में मदद मिलेगी।


सतत या असतत विकास


"एक बालिका अपनी खिलौना गाड़ी से खेल रही थी। इस दौरान वह खिलौना गाड़ी को चलाते हुए धरधर की आवाज करती है। इसे मोड़ते हुए वह पी-पी जैसी आवाज करती है।"


विकासात्मक मनोवैज्ञानिक इस उदाहरण की दो दृष्टियों से व्याख्या करते हैं। प्रथम दृष्टि के अनुसार बालिका का व्यवहार 'बड़झे जैसा है लेकिन उसमें कुशलता और पूर्णता का अभाव है। इस दृष्टि के अनुसार पसिक्व और अपरिपक्व के बीच केवल कार्य प्रदर्शन में जटिलता के स्तर का अंतर है।

अतः विकास की प्रक्रिया सतत होती है। इस दौरान व्यक्ति चिंतन व्यवहार और प्रदर्शन की कुशलताओं को समृद्ध करता रहता है। 

दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार विकास की अवस्था के कारण बालिका इस प्रकार का व्यवहार कर रही है। उम्र के बढ़ने पर उसकी सोच और व्यवहार में बदलाव होगा। इस बदलाव में केवल कुशलताओं में मात्रात्मक वृद्धि नहीं होती बल्कि गुणात्मक अंतर भी होता है जो उम्र में वृद्धि का प्रतिफल होता है। यह दृष्टिकोण विकास की अवस्था आधारित प्रक्रिया मानता है इस दृष्टि से विकास में विच्छिन्नता होती है और एक अवस्था का चरण दुसरे चरण के अवस्था से गुणात्मक रूप से भिन्न होता है


सार्वभौमिक या संदर्भबद्ध


जब हम यह मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का विकासक्रम एक होता है और एक समान विकास चरणों से होते हुए पूर्ण होता है तो यह दृष्टि विकास को सार्वभौमिक मानती है। जो सिद्धान्त इस मान्यता को स्वीकारते हैं

वे विकास के उन अवयवों पर बल देते हैं जो जैविकीय विशेषताओं के प्रतिफल होते हैं और प्रत्येक देश-काल में जिसकी पुनरावृत्ति होती है। इसके विपरीत जब हम यह मानते हैं कि व्यक्ति के विकास क्रम को उसका विकासात्मक संदर्भ प्रभावित करता है तो यह दृष्टि विकास को संदर्भबद्ध मानती है। जो सिद्धान्त इस मान्यता को स्वीकारते हैं वे संदर्भ और पारिस्थितिकी (ecology) के विभिन्न पहलुओं जैसे संस्कृति, अर्थव्यवस्था, भौतिक परिवेश, मूल्य आदि को महत्व देते हैं।


प्रकृति और पोषण (Nature & Nurture) का सापेक्षिक प्रभाव


विकास की प्रक्रिया में प्रकृति और पोषण के सापेक्षिक प्रभाव को लेकर भी विकास के अध्येताओं में बहस जारी है। जहाँ प्रकृति का अर्थ मानब की जैवकीय और वंशानुगत विशेषताओं से है वहीं पोषण का अर्थ परिवेश के भौतिक-सांस्कृतिक, सामाजिक सांस्कृतिक अवयवों और उनसे सीखने के संयुक्त प्रभाव से है।

प्रत्येक सिद्धान्त में इस सापेक्षिक प्रभाव को देखा जा सकता हैं। संज्ञानात्मक विकास से जुड़े सिद्धान्तों में आप ऐसी व्याख्याएँ पाएँगे


“एक वयस्क दवारा जटिल समस्या का समाधान इसलिए किया जा सकता है क्योंकि उम्र के अधिक होने के कारण उसके पास उच्च संज्ञानात्मक क्षमता है। एक वयस्क द्वारा जटिल समस्या का समाधान इसलिए किया जा सकता है क्योंकि समुदाय से अन्तःक्रिया के कारण उसे ऐसी समस्याओं से निपटने के तौर तरीके मालूम है।


ऊपर दिए गए पहले उदाहरण में संज्ञानात्मक विकास के लिए प्रकृति का योगदान अधिक है जबकि दूसरे उदाहरण में पोषण का योगदान अधिक है। प्रकृति और पोषण के सापेक्षिक प्रभाव को वैयक्तिक भिन्नता की व्याख्या दवारा भी देख सकते हैं। वैयक्तिक अंतर के लिए यदि प्रकृति उत्तरदायी है तो वह अंतर प्राकृतिक है और उसका बने रहना स्वाभाविक है। लेकिन यदि वैयक्तिक अंतर पोषण का परिणाम है तो यह प्रदत्त (दिया हुआ न हो कर निर्मित होगा। अतः इसे निर्मित करने वाली परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए।