विद्यालय में मार्गदर्शन एवं परामर्श सेवा - Guidance and Counseling Services in the School
विद्यालय में मार्गदर्शन एवं परामर्श सेवा - Guidance and Counseling Services in the School
कोठारी आयोग के अनुसार मार्गदर्शन एवं परामर्श को शिक्षा का अभिन्न अंग समझा जाना चाहिए और इसे प्राथमिक स्तर से ही शुरू किया जाना चाहिए । इसी सिफारिश के अनुरूप ही विद्यालय की क्रियाओं तथा परामर्श कार्यक्रमों का नियोजन बच्चों की आवश्यकताओं एवं उनके विकास के विभिन्न चरणों के अनुसार ही किया जाना चाहिए ताकि वे बौद्धिक, सामाजिक, संवेगात्मक और व्यावसायिक क्षेत्रों में सुसमायोजित हो सकें। इस दृष्टि से बच्चों के विकास की अवस्था के अनुरूप तथा विभिन्न विद्यालय स्तरों के अनुरूप ही मार्गदर्शन कार्यक्रमों के उद्देश्य तय किये जाते हैं। संक्षेप में, विद्यालय के विभिन्न स्तरों पर मार्गदर्शन एवं परामर्श कार्यक्रमों के निम्नलिखित विशिष्ट उद्देश्य होने चाहिए-
1. प्राथमिक स्तर
1. विशिष्ट उद्देश्य- इस स्तर में 6 से 11 वर्ष की आयु के बच्चे अर्थात् कक्षा 1 से 5 तक के बच्चे शामिल किये जाते हैं। इस स्तर पर मार्गदर्शन एवं परामर्श कार्यक्रम के निम्नलिखित विशिष्ट उद्देश्य होते हैं
क. घर से विद्यालय में विद्यार्थियों का संतोषजनक परिवर्तन या समायोजन करवाने में सहायता करना ।
ख. मूलभूत शैक्षिक कौशलों को सीखने में आ रही कठिनाईयों के निदान में सहायता करना।
ग. विद्यार्थियों को विशेष शिक्षा प्रदान करने के लिए ज़रूरतमंद विद्यार्थियों को पहचानने में सहायता, जैसे- प्रतिभाशाली, पिछड़े तथा दिव्यांग बच्चे।
घ. विद्यालय छोड़ने वाले संभावित विद्यार्थियों को विद्यालय में ठहराए रखना।
ङ. विद्यार्थियों को उनकी आगामी शिक्षा या प्रशिक्षण की योजना बनाने में सहायता करना।
2. क्रियाएँ या गतिविधियाँ - इन उपर्युक्त विशिष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए प्राथमिक स्तर पर कुछ क्रियाएँ करनी होंगी। इस स्तर पर अध्यापक की केन्द्रीय भूमिका होती है क्योंकि अध्यापक बच्चों की रूचियों, योग्यताओं, आवश्यकताओं तथा प्रतिभाओं की खोज करने के लिए उत्तम स्थिति में होता है। प्राथमिक स्तर पर निम्नलिखित गतिविधियाँ या क्रियाएँ की जाती हैं ।
क. विद्यार्थियों के लिए अभिविन्यास कार्यक्रम- इसमें विद्यालय वातावरण के बारे में बच्चों को तथा उनके माता-पिता को बताया जाता है। उनके माता-पिता को विद्यालय तथा मार्गदर्शन कार्यक्रम में माता-पिता एवं अभिभावक की भूमिका आदि से परिचित कराया जाता है।
ख. निदानात्मक और मूलभूत कौशलों का परीक्षण इस प्रकार के परीक्षणों का उपयोग प्राथमिक कक्षाओं में खूब किया जाना चाहिए ताकि दोषपूर्ण पठन की पहचान एवं निदान जल्दी ही किया जा सके क्योंकि दोषपूर्ण पठन से बहुत ही अवांछित परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।
ग. प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की खोज विशिष्ट प्रतिभा वाले विद्यार्थियों की विभिन्न विधियों और प्रविधियों की सहायता से खोज की जाती है। इन प्रतिभाओं में वैज्ञानिक योग्यता, सृजनात्मक योग्यता, नेतृत्व क्षमता, नाट्य तथा गायन क्षमता आदि शामिल होती हैं।
घ. कुसमायोजित विद्यार्थियों की खोज विद्यालयों में विभिन्न रूप से कुसमायोजित विद्यार्थियों की खोज करना अति आवश्यक है।
इस प्रकार की खोज के लिए विभिन्न तकनीकों जैसे निरीक्षण, परीक्षणों इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। कुसमायोजनों और दोषों में सामान्य कुसमायोजन, आवेशपूर्ण व्यवहार, धीमी गति से सीखने वाले, न्यूनतम अभिप्रेरित बच्चे, वाणी दोष, अधिगम दोष, दृष्टि दोष, शारीरिक विकलांगता (दिव्यांग) तथा विशेष स्वास्थ्य समस्याएँ इत्यादि सम्मिलित हैं। इनके लिए उपयुक्त उपचारात्मक विधियों का प्रयोग किया जाता है ताकि यथासमय इनका उपचार किया जा सके। गरीबी, सामाजिक पिछड़ेपन आदि के निवारण के लिए विशेष विधियों का विकास करना पड़ेगा।
II. मिडिल स्तर ( उच्च प्राथमिक स्तर)
1. विशिष्ट उद्देश्य- कक्षा 6 से 8 तक मिडिल स्तर होता है। इन कक्षाओं में 11 से 14 वर्ष का आयु-समूह शामिल होता है।
इन वर्षों में बच्चा किशोर अवस्था में प्रवेश कर जाता है। यह अवधि कई बच्चों के लिए बड़ी कठिन होती है। इस अवस्था में कई बच्चों को परिवार, विद्यालय तथा समाज में समायोजन समस्याएँ प्रकट होनी शुरू हो जाती हैं। इस स्तर पर परामर्श एवं मार्गदर्शन के उद्देश्य निम्नलिखित हैं -
क. विद्यार्थियों को परिवार, विद्यालय और समाज में समायोजन में सहायता करना
ख. विद्यार्थियों की योग्यताओं, अभिरूचियों एवं रूचियों को पहचानना और उनका विकास करना ।
ग. विद्यार्थियों को विभिन्न शैक्षिक और व्यावसायिक अवसरों और आवश्यकताओं के बारे में सूचनाएँ प्राप्त करने के योग्य बनाना ।
घ. मुख्याध्यापक और अध्यापकों को उनके विद्यार्थियों को समझने तथा अधिगम को प्रभावी बनाने में सहायता करना।
ङ. विद्यालय छोड़ने वाले विद्यार्थियों को शैक्षिक और व्यावसायिक योजनाएँ बनाने में सहायता करना।
2. क्रियाएँ या गतिविधियाँ- उपर्युक्त उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित कार्यक्रम या क्रियाएँ की जा सकती हैं
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