शिक्षकों के लिए कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत पर आधारित मार्गदर्शन - Guidance for teachers based on Kohlberg's theory of moral development
शिक्षकों के लिए कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत पर आधारित मार्गदर्शन - Guidance for teachers based on Kohlberg's theory of moral development
९. कोहलबर्ग के सिद्धांत के चरण 4, 5 और 6 समाज में नैतिकता के सबसे अच्छे चरण माने गए हैं। किन्तु बच्चों के नैतिक विकास के लिए एवं समाज निर्माण के लिए इन्हें सक्रिय रूप से सामाजिक बदलाव के क्रम में शिक्षा में शामिल करने की जरूरत है। चूंकि नैतिक सिद्धांत मात्र वयस्कों द्वारा सिखाये नहीं जा सकते बल्कि शिक्षा के माध्यम से ग्रहण भी किए जा सकते हैं इसलिए कक्षा में शिक्षण के द्वारा भी नैतिक विकास के लिए अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
२. बच्चों की तर्क शक्ति के विकास के लिए उचित अवसर उपलब्ध कराये जाएँ। ताकि उनमें तर्कों के आधार पर निर्णय लेने की क्षमता का विकास हो सके और वे नैतिक मूल्यों को समझ सके।
३. भिन्न-भिन्न स्तर के बच्चों की आवश्यकताएं भिन्न होती है। इसीलिए शिक्षकों को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप ही पाठ्यक्रम का निर्माण करके उनमें नैतिक विकास को संभव बनाना चाहिए।
४. कोहलबर्ग ने अपने सिद्धांत में बच्चों को समूहों में चर्चा का अबसर प्रदान करके उन्हें प्रोत्साहित किया। उसी प्रकार शिक्षक को भी समय-समय पर नैतिक मूल्यों के विकास के लिए कक्षा में नैतिक दुविधाओं को प्रस्तुत करना चाहिए जिससे बच्चों को अपने विचार सबके समक्ष रखने का अवसर प्राप्त होगा जो उनकी सोच को संशोधित करने और आपसी समझ को विकसित करने में सहायक होगा।
५. शिक्षकों को कक्षा में नैतिक मूल्यों, सोच व तर्क के निर्माण के लिए उचित पर्यावरण का निर्माण करना चाहिए। बच्चों को स्वयं के अनुभवों से सीखने के अवसर प्रदान करने होंगे।
६. बच्चों को स्व-संप्रत्यय (Self Concept) के साथ-साथ आदर्श का भी निर्माण करना चाहिए। इसके लिए शिक्षक और : अभिभावकों को देखना चाहिए कि बच्चे के स्व-संप्रत्यय और आदर्श स्वा के बीच अधिक अंतर न हो। इनमें अधिक अंतर होने से व्यक्तित्व और व्यवहार का संतुलन बिगड़ जाता है। इन दोनों के आधार पर ही उनके नैतिक और चारित्रिक व्यवहार का विकास होता है एवं इन्हीं के आधार पर नैतिक और चारित्रिक विकास करना चाहिए।
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