भारतीय संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि - Historical Background of Indian Constitution

भारतीय संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि - Historical Background of Indian Constitution


31 दिसंबर, 1600 को स्थापित चंद व्यापारियों की कंपनी ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक शारी चार्टर के जरिए 15 वर्ष के लिए भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ क्षेत्रों के साथ व्यापार करने का एकाधिकार प्राप्त कर लिया। उस चार्टर में कंपनी का संविधान, उसकी शक्तियां तथा उसके विशेषाधिकार भी निर्धारित कर दिए गए थे।


सन 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद युगल साम्राज्य धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगा और सन 1757 में प्लासी के युद्ध में सिराजुदौला को हराकर अंग्रेज़ों ने भारत पर कब्जा कर लिया। सन 1773 में रेग्युलेटिंग एक्ट बनाकर ब्रिटिश संसद ने कंपनी के शासन के लिए एक लिखित संविधान तैयार किया। आगे चलकर चार्टर एक्टर 1833 के माध्यम से भारत में अंग्रेज़ी शासन के अधीन सभी क्षेत्रों में सारे सिविल, सैन्य मामले, राजस्व की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण प्रत्यक्ष रूप से गवर्नर-जनरल ऑफ इंडिया-इन- कौंसिल ( परिषद भारतीय गर्वनर जनरल) को सौंप दिया गया।

गवर्नर जनरल की सरकार 'भारत सरकार' और उनकी परिषद भारत परिषद' के नाम से जानी गई। इस चार्टर ने गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया इन कौंसिल को कुछ शर्तों के अधीन भारत में संपूर्ण क्षेत्रों के लिए कानून बनाने की शक्तियां प्राप्त हो गई। सन 1853 में चार्टर एक्ट, 1853 लाया गया, जिसने पूर्व के जारी चार्टर में प्रदत्त शक्तियों में कई एक परिवर्तन कर दिया। गवर्नर जनरल की विधायी शक्तियां तो बनी रही किंतु उसकी परिषद में छह विशेष सदस्य जोड़कर उसका विस्तार कर दिया गया और सदस्य को विधायी पार्षद' कहा गया, किंतु परिषद में बैठने तथा मतदान करने का अधिकार नहीं था। परिषद में गवर्नर जनरल, कमांडर-इन-चीफ, मद्रास, बंबई, कलकत्ता और आगरा के स्थानीय शासकों के चार प्रतिनिधियों समेत सदस्यों की संख्या बारह हो गई। इस चार्टर में विधायी कार्यों और कार्यपालक अधिकारों के बीच विभाजन कर लिया गया। इसके बाद भारत में उत्तम प्रशासन के लिए एक्ट 1858 का एक्ट बनाकर कंपनी से लेकर सारे कार्यभार व शक्तियां ब्रिटेन के क्राउन में निहित कर दी गई और शासन सीधे • प्रिंसिपल सेक्रेटरी ऑफ स्टेट' के माध्यम से इंग्लैंड के क्राउन द्वारा किया जाने लगा।


सन 1861 में भारतीय परिषद एक्ट, 1861 अस्तित्व में आया।

इसके माध्यम से भारत में अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना के बाद पहली बार भारतीय लोगों को विधायी कार्यों के साथ जोड़ा गया तथा गवर्नर जनरल की परिषद की विधायी शक्तियों का वि सरकारों में निहित कर दिया गया। किंतु इस विकेंद्रीयकरण कर के बंबई तथा मद्रास की सरकारों में निहित कर दिया गया। किंतु इस एक्ट से भारतीय जनता की कोई आकांक्षा पूरी नहीं हो पा रही थी लिहाजा इस एक्ट के प्रति लोगों में आक्रोश बढ़ा।


सन 1885 में गठित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष डब्ल्यू-सी बनर्जी के जमाने से ही विधान परिषदों में सुधार तथा उसके विस्तार की मांग की जाती रही और यही मांग कांग्रेस के अगले कई सम्मेलनों में दोहरायी जाती रही। सन 1889 में कांग्रेस ने अपने सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित कर गवर्नर जनरल की परिषद तथा प्रांतीय विधान परिषदों में सुधार तथा उनके पुनर्गठन के लिए एक योजना की रूपरेखा तैयार करके ब्रिटिश संसद में पेश किए जाने वाले बिल में शामिल करने का सुझाव दिया।

इसके परिणामस्वरूप भारतीय परिषद एक्ट, 1892 लाया गया जिसके अंतर्गत गर्वनर जनरल की परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या दस और अधिकतम सोलह कर दी गई जो पहले न्यूनतम छह और अधिकतम बारह थी। अब परिषदों को विधायी कार्यों के अतिरिक्त वार्षिक वित्तीय विवरण या बजट पर विचार विमर्श करने का सशक्त अधिकार दे दिया गया तथा सदस्यों को कुछ शर्तों के अधीन लोकहित के मामले में सवाल पूछने की इजाजत दे दी गई। इस एक्ट के जरिए भारतीयों को अधिकार प्राप्त हुए तथा परिषद में निर्वाचित' सदस्यों के प्रवेश से एक नए दौर की शुरूआत हुई। सन 1906 में कांग्रेस ने अपने अधिवेशन में अंतिम लक्ष्य स्वराज' घोषित किया जो नरमपंथियों के लिए अंग्रेजी साम्राज्य के अधीन संसदीय स्वशसन और गरमपंथियों के अर्थ में स्वाधीनता माना गया। इस में जनता का और अधिक तथा वास्तविक प्रतिनिधित्व और देश के वित्तीय कार्यकारी प्रशसन पर और अधिक नियंत्रण के लिए विधान परिषदों में तुरंत मांग की गई।


राष्ट्रीय आंदोलन में गरमपंथियों की ताकत दिनोदिन बढ़ती जा रही थी, जो स्वाधीनता की मांग कर रहे थे और नरमपंथी ने भारतीयों के और अधिक तथा प्रभावी प्रतिनिधित्व के लिए अभियान चला रखा था।

इसका सकरात्मक प्रभाव यह रहा कि सेक्रेअरी ऑफ स्टेट फार इंडिया, लार्ड माले एवं तत्कालीन वायसराय लार्ड मिंटो दोनों ने मिलकर एक संवैधानिक सुधार प्रस्ताव तैयार किया जिसे मिंटो मार्ले सुधार प्रस्ताव कहा जाता है। इस प्रस्ताव के द्वारा विधान परिषदों का विस्तार किए जाने, उनकी शक्तियों और कार्यक्षेत्र को बढ़ाए जाने, प्रशासी परिषदों में भारतीय सदस्यों की नियुक्ति किए जाने तथा जहाँ पर परिषदें नहीं थीं, वहाँ परिषदें स्थापित करने और स्थानीय स्वशासन प्रणाली का और अधिक विकास करने को कहा गया।


उक्त प्रस्ताव को मद्देनजर भारतीय परिषद एक्ट, 1909 बनाया गया और इसके माध्यम से कई सुधार किए गए। इन सुधारों के बावजूद भी ये सुधार एक ज़िम्मेदार सरकार की आवश्यकता को पूरा नहीं कर पा रहे थे। 20 अगस्त, 1917 को माण्टेग्यू ने 'जिम्मेदार सरकार की स्थापना का वादा किया। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फार मोंटेग्यू और भारत के वायसराय लार्ड की संयुक्त रूप में मोंटफोर्ड रिपोर्ट, 1918 जुलाई, 1918 में प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट के आधार पर भारत शासन एक्ट 1919 बनाया गया। इस एक्ट का घोर विरोध किया गया।

भारतीयों द्वारा स्वयं अपने लिए संविधान निर्माण करने के लिए एक संविधान सभा का विचार उस एक्ट के विरोध में अंतर्निहित था।


श्रीमती एनी बीसेंट की पहल पर सन 1922 में केंद्रीय विधानमंडल के दोनों सदनों के सदस्यों की शिमला में आयोजित एक सम्मेलन में संविधान निर्माण के लिए एक सम्मेलन उबुलाने का निर्णय लिया गया और फरवरी 1923 में दिल्ली में आयोजित केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान मंडलों के सदस्यों के सम्मेलन में भारत को ब्रिटिश साम्राज्य की स्वशासी डोमिनियनों के समतुल्य रखते हुए संविधान के आवश्यक तत्वों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। 24 अप्रैल को सर तेज बहादुर समू की अध्यक्षता में हुए सम्मेलन में 'कामलनवेल्थ ऑफ इंडिया बिल' का प्रारूप बिल तैयार किया गया और यही प्रारूप बिल कुछ संशोधनों के साथ सन 1925 में दिल्ली में महात्मा गांधी की अध्यक्षता में संपन्न हुए सर्वदलीय सम्मेलन में रखा गया और वह बिल प्रारूप समिति को सौंप दिया गया। स्मिति ने बिल को प्रकाशित करके भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों के 43 नेताओं के हस्ताक्षर युक्त ज्ञापन के साथ लेबर पार्टी ने उसका भारी समर्थन किया किंतु लेबर पार्टी सरकार के पराजय की वजह से उस विधेयक पर कोई स्करात्मक कार्यवाही नहीं हो पाई। बाद में केंद्रीय विधान मंडल ने भारत का भावी संविधान भारतीयों द्वारा स्वयं बनाने के संबंध मोतीलाल नेहरू के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।


17 मई, 1927 को मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के बबई अधिवेशन में कांग्रेस कार्यकारिणी समिति से केंद्रीय तथा प्रांतीय विधामंडलों के निर्वाचित सदस्यों तथा राजनीतिक दलों के नेताओं के परामर्श से भारत के लिए एक संविधान निर्माण करने का प्रस्ताव रखा जो कुछ संशोधनों के साथ पारित हो गया। इसी प्रस्ताव को 28 दिसंबर, 1927 को परिवर्तित रूप में जवाहर लाल नेहरू ने मद्रास अधिवेश में रखा और उसे पास कर दिया गया और 19 मई, 1928 को बबई में आयोजित एक सर्वदलीय सम्मेलन में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में भारत के संविधान निर्धारित करने के लिए एक समिति गठित की गई। 10 अगस्त, 1928 को समिति ने 'नेहरू रिपोर्ट' नाम से प्रसिद्ध रिपोर्ट आई। यह भारतीयों द्वारा स्वयं के लिए संविधान बनाने के लिए पहला प्रयास था। इस रिपोर्ट में भारत के संविधान का प्रारूप डोमिनियम के सिद्धांत पर आधारित था।


1928 की नेहरू रिपोर्ट में शामिल संसद के प्रति उत्तरदायी सरकार, अदालतों पर लागू कराए जा सकने वाले मूल अधिकार, अल्प संख्यकों के अधिकार सहित मोटे तौर अभिव्यक्त संसदीय व्यवस्था की संकल्पना को ज्यों का त्यों 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने स्वीकार कर स्वाधीन भारत के संविधान में शामिल कर लिया।


सायमन आयोग और गोलमेज सम्मेलन के असफल हो जाने के बाद भारत शासन एक्ट, 1935 लाया गया, जिसे कांग्रेस ने पूरी तरह से मानने से इनकार कर दिया और संविधान सभा के मुद्दे पर प्रांतीय विधान मंडलों का चुनाव कांग्रसे ने जुड़ा और चुनाव में कांग्रेस विजयी रही।


सन 1940 के अगस्त प्रस्ताव के जरिए ब्रिटिश सरकार ने संविधान सभा की मांग को अधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया जिसमें नए संविधान के निर्माण के लिए भारतीयों से कराना कवयन दिया गया था तथा संविधान निर्माण निकाय द्वारा बनाए गए संविधान को स्वीकार करने के लिए कहा गया। जुलाई 1945 में इंग्लैंड में लेबर पार्टी की सरकार की वापसी होने पर यथाशीर्घ संविधान निर्माण निकाय के गठन के लिए बात कही गई। तत्पश्चात कैबिनेट मिशन ने संविधान के लिए बुनियादी ढांचे का प्रारूप पेश किया तथा संविधान निर्माण निकाय द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का कुछ विस्ताव के साथ निर्धारण किया। ब्रिटिश भारत के प्रातों को आवंटित 296 सीटों के लिए जुलाई-अगस्त, 1946 में चुनाव कराए गए, जिसमें कांग्रेस 208, मुस्लिम लीग, 73 और अन्य राजनीतिक दल कुल मिलाकर तथा स्वतंत्रता आठ जगहों पर विजयी रहें। 19 दिसंबर, 1946 दिन सोमवार, प्रातः ग्यारह बजे संविधान सभा का विधिवत उद्घाटन हुआ तथा 13 दिसंबर, 1946 को नेहरूजी ने उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया।

इसमें प्रस्तुत मार्गदर्शी सिद्धांत और दर्शन के आधार पर संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण का कार्य करना था और 22 जनवरी, 1947 को संविधान सभा ने उक्त प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।


14-15 अगस्त, 1947 को देश के विभाजन और आज़ादी प्राप्त कर लेने के बाद भारत की संविधान सभा कैबिनेट मिशन योजना के नियंत्रण से पूरी तरह से मुक्त हो गई। भारत के लोगों द्वारा निर्मित भारत के संविधान 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकार किया गया तथा 26 जनवरी, 1950 को पूरी तरह से लागू कर दिया गया। संविधान में 22 भाग, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां शामिल थी। मौजूद समय का हमारा संविधान समय-समय पर किए गए कुछ संशोधनों के साथ मौजूद है। कुछ अनुच्छेद संशोधनों के द्वारा निकाल दिए गए हैं और कुछ नए अनुच्छेद जोड़े गए हैं। किंतु सुविधा की दृष्टि से संविधान के भागों और अनुच्छेदों की मूल संख्याओं में परिवर्तन नहीं किया गया। वर्तमान में गणना के लिहाज से कुल अनुच्छेद 1 से 395 तक हैं किंतु वास्तव में उनकी संख्या 445 है। अनुसूचियों की संख्या 8 से 12 हो गई हैं। पिछले 53 वर्षों में 87 संविधान संशोधन विधेयक पारित हो चुके हैं।