दलित नारीवाद आंदोलन का इतिहास व उनके प्रणेता - History of Dalit Feminism Movement and Their Leaders

दलित नारीवाद आंदोलन का इतिहास व उनके प्रणेता - History of Dalit Feminism Movement and Their Leaders


आज के समय में दलित नारीवाद का जो स्वरूप हमारे सामने दिखाई दे रहा है, उसकी एक लंबी पृष्ठभूमि रही है। दलित स्त्री विमर्श के सूत्र बौद्धकालीन थेरी गाथाओं से जोड़े जा सकते हैं। दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाली थेरी सुमंगला और पूर्णिमा दासी की कविताओं में नारीवाद की अभिव्यक्ति को साफ तौर पर देखा जा सकता है। आधुनिक काल में इसकी शुरुआत स्वतंत्रता पूर्व एवं स्वतंत्रता के पश्चात हुए अनेक महत्वपूर्ण दलित अधिकार आंदोलनों में हमें देखने को मिलते हैं। इन आंदोलनों और चिंतन का प्रभाव एक सुसंगत 'दलित नारीवाद' आंदोलन के रूप में 90 के दशक में हमारे सामने आता है। दलित नारीबादी आंदोलन को एक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने में अनेक चिंतकों/ बुद्धिजीवियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनमें ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, पेरियार, जाईबाई चौधरी, छत्रपति साहू जी महाराज, ताराबाई शिंदे, दुर्गाबाई देशमुख, डॉ. भीमराव अंबेडकर, रमाबाई आदि का महत्वपूर्ण योगदान है। समकालीन दलित नारीवादी चिंतकों में उर्मिला पवार, गोपाल गुरु, शर्मिला रेगे, उमा चक्रवर्ती, बजरंग बिहारी तिवारी, अनीता भारती आदि का नाम लिया जा सकता है। 


1. ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले का योगदान


दलित चिंतकों ने सामाजिक असमानता, शोषण और अस्पृश्यता से मुक्ति पाने में शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार माना है। दलित स्त्रियों के उत्थान हेतु शिक्षा के महत्व को सर्वप्रथम मूर्त रूप देने में ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले का नाम सबसे महत्वपूर्ण है। सन 1848 ई० में ज्योतिबा फुले ने दलित बालिकाओं को शिक्षा देने के उद्देश्य से पुणे के एक गाँव में स्कूल की स्थापना की। तत्कालीन सामंती परिस्थितियों के बीच दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोलना एक क्रांतिकारी कदम था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें समाज से बहिष्कार भी झेलना पड़ा। स्कूल खोलने के पश्चात उनके सामने स्कूल में पढ़ाने के लिए शिक्षक की आवश्यकता एक नई समस्या थी, क्योंकि यहाँ पढ़ाने के लिए कोई आसानी से तैयार नहीं हो रहा था। इस स्थिति को देखते हुए ज्योतिबा फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को प्रशिक्षित कर पढ़ाने का कार्यभार सौंप दिया। सावित्रीबाई फुले ने इस महत्वपूर्ण कार्य का बड़ी ही ज़िम्मेदारी के साथ बखूबी निर्वहन किया। इस तरह से घर से बाहर आकर पढ़ाने का काम करने वाली सावित्रीबाई प्रथम शिक्षिका थीं। लेकिन इस कार्य को जारी रखना तत्कालीन व्यवस्था के अनुसार उतना आसान नहीं था।

लोग इन्हें तंग करने के लिए रास्ते में उन पर गोबर और पत्थर फेंका करते थे। लेकिन सावित्रीबाई इन सारी परिस्थितियों से भी नहीं घबराई और अध्यापन का कार्य जारी रखा। ज्योतिबा फुले ने क्रमशः 1851 और 1852 में एक-एक स्कूल और खोला। सन 1855 में उन्होंने पुणे में एक प्रौढ़ पाठशाला की स्थापना की और 1852 ई० में मराठी पुस्तकों के प्रथम पुस्तकालय की स्थापना भी की। स्त्रियों के बारे में फुले के विचार क्रांतिकारी थे, वे स्त्री और पुरुष दोनों को बराबर समझते थे, और विवाह प्रथा में भी सुधार की बात करते थे। इस प्रकार अगर हम फुले के संपूर्ण विचार पर ध्यान दें तो हम पाते हैं कि फुले दंपति के विचार और उनके कार्यों ने दलित स्त्रियों में चेतना के बीजारोपण करने का कार्य किया। 


2. डॉ. भीमराव अंबेडकर का योगदान


डॉ. अंबेडकर ने 1942 ई. के नागपुर के सम्मेलन में बोलते हुए कहा था कि दलित समाज ने के कितनी प्रगति की है इसे मैं दलित स्त्री की प्रगति से तौलता हूं' यह कथन वही व्यक्ति कह सकता है,

जिसे समाज में एक स्त्री की मानवीय भूमिका और उसकी प्रतिबद्धता की बारीक पहचान हो। दलित अधिकारों और उनके शोषण के खिलाफ लड़ने वालों में बाबासाहब अंबेडकर का नाम अग्रगण्य डॉ. अंबेडकर पर फुले और छत्रपति साहू जी महाराज के विचारों का गहरा प्रभाव था। डॉ. अंबेडकर ने अपने आंदोलनों और विचारों के माध्यम से दलित पुरुषों में ही चेतना का प्रसार नहीं किया बल्कि इससे दलित स्त्रियों में भी चेतना का गहन प्रसार हुआ।


1920 में कोल्हापुर नरेश छत्रपति शाहू जी महाराज की अध्यक्षता में आयोजित भारतीय बहिष्कृत परिषद' की सभा में पहली बार दलित स्त्रियों ने हिस्सा लेकर अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज की। इस आंदोलन के बाद अनेक सामाजिक आंदोलनों में दलित स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी लगातार बढ़ती रही। 1927 में हुए महार सत्याग्रह आंदोलन, जिसमें मनु स्मृति का दहन व चावदार तालाब का पानी पीना शामिल था, इस घटना ने दलित स्त्रियों के जीवन में प्रतिदिन होने वाले शोषण के खिलाफ संघर्ष करने का भाव पैदा किया। दलित स्त्रियों को घर में पिसने के बाद बाहर भी अनेक तरह के मामले, जिनमें मजदूरी करने के लिए कम पैसे दिए जाना, शारीरिक शोषण, काम के घंटे नियत न होने जैसी समस्याओं से गुजरना पड़ता था।

स्त्री अधिकारों की रक्षा के लिए बाबासाहब ने 1928 में मुंबई में स्त्री मंडल की स्थापना की और इस स्त्री मंडल की प्रथम अध्यक्ष के में डॉ. अंबेडकर की पत्नी रमाबाई को चुना गया। स्त्री मंडल ने पूना के पार्वती मंदिर में प्रवेश के लिए संघर्षपूर्ण सत्याग्रह किया। स्त्री मुक्ति के बिना समाज का सांस्कृतिक तथा आर्थिक उत्थान अधूरा है। इस उद्देश्य को केंद्र में रखकर उन्होंने सन 1955 में हिंदू कोड बिल तैयार किया। यह बिल जीवन निर्वाह, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक, अल्पसंख्यक और अभिभावकता के कानून से संबंधित था। यही हिंदू कोड बिल' प्रत्येक तबके की स्त्रियों के अधिकारों का कानूनी दृष्टि से मूलभूत आधार बना। डॉ. अंबेडकर का मानना था कि स्त्री तथा समाज की उन्नति शिक्षा के बिना नहीं हो सकती, शिक्षित होकर ही स्त्री अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर सकती हैं। वे मानते थे कि परिवार में स्त्री शिक्षा ही वास्तविक प्रगति की धुरी है। स्त्री शिक्षा को अत्याधिक महत्व देते हुए उन्होंने कहा भी है कि, 'अगर घर में एक पुरुष पढ़ता है तो केवल वही पढ़ता है और यदि घर में स्त्री पढ़ती है तो पूरा परिवार पढ़ता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि बाबासाहब अंबेडकर के भाषणों, उनकी रचनाएँ एवं उनके आंदोलनों ने दलित स्त्रियों में संघर्ष और प्रतिरोध की चेतना का विकास किया, जिसने दलित नारीवादी आंदोलनों के लिए एक उर्वर जमीन तैयार की।