इमैनुएल कॉट - IMMANUEL KANT

इमैनुएल कॉट - IMMANUEL KANT


परिचय:


इमैनुएल कॉट का जन्म सन् 1724 में जर्मनी के कोनिग्सबर्ग नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता मोची थे और घोड़ो के जीनसाजी का कार्य करते थे और माता साधारण गृहणी थी। ये दोनों धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। ऐसे धर्म प्रधान परिवार में कॉट लालन पालन हुआ। काण्ट की शिक्षा अपने नगर के एक सामान्य स्कूल में शुरू हुई। इन्होंनेउच्च शिक्षा कोनिग्सवर्ग विश्वविद्यालय में प्राप्त की।


इमैनुएल कॉट एक महान गणितज्ञ, वैज्ञानिक, दार्शनिक तथा शिक्षाविद के रूप में जाने जाते है। इनका दार्शनिक चिंतन गणितीय तर्क और वैज्ञानिक विधि पर आधारित है। इनके अनुसार शिक्षा वह है जो मनुष्य को भौतिक जगत को समझने में सहायता करे और साथ ही उसमें धर्म के प्रति आस्था और ईश्वर के प्रति विश्वास उत्पन्न करे। शारीरिक, मानसिक, बस्तु जगत का ज्ञान, धर्म के प्रति आस्था नैतिक गुणों का विकास आदि शिक्षा के उद्देश्य है। उन्होंने शिक्षा की पाठ्यचर्या में भाषा साहित्य, दर्शन, तर्कशास्त्र, गणित, विज्ञान एवं तकनीकी विषयों को प्रमुख स्थान दिया है।

बौद्धिक तर्क और इन्द्रियानुभव को प्रमुख शिक्षण विधि माना है। शाश्वत नैतिक नियमों के पालन को सच्चा अनुशासन माना है। शिक्षक को अध्ययनशील एवं चिंतनशील होना चाहिए। मनुष्यों को व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए विद्यालयों की आवश्यकता पर बल दिया है। कांट सभी प्रकार की शिक्षा के पक्षधर थे। उनके अनुसार धर्म आस्था का विषय है।


काँट का शैक्षिक दर्शन (Educational Thoughts of Kant)


कॉट ने शिक्षा पर स्वतंत्र रूप से कोई विचार व्यक्त नहीं किए हैं पर इनके दार्शनिक चिंतन की तत्व मीमासा जान मीमासा और आचार मीमांसा से शिक्षा संबंधी अर्थ निकाले जा सकते हैं। कॉट गणितज्ञ एवं वैज्ञानिक पहले थे, दार्शनिक बाद में इनके अनुसार वास्तविक शिक्षा वह है जो व्यक्ति को भौतिक जगत को समझने में सहायता करे और साथ ही उसमें धर्म के प्रति आस्था और ईश्वर के प्रति विश्वास उत्पन्न करे।


कॉट एक तरफ मनुष्य को भौतिक जगत का जान कराना चाहते थे और दूसरी तरफ उसे सत्संकल्पी जीव बनाना चाहते थे। जान प्राप्ति के संबंध में इनका मत था कि सच्चा ज्ञान इन्द्रियानुभवों को बौद्धिक प्रत्ययों की कसौटी पर घिसकर प्राप्त किया जा सकता है और ये दोनों कार्य मानव अपने मस्तिष्क के द्वारा कर सकता है।


शिक्षा के उद्देश्य (Aims ofEducation) :


कॉट के अनुसार मनुष्य शरीर एवं मन का योग है। अतः सर्वप्रथम उसके शरीर का उचित विकास होना आवश्यक है। कॉट ने स्पष्ट किया कि मनुष्य जो कुछ भी इन्द्रियानुसार करता है उसके वास्तविक स्वरूप को तर्क द्वरा ही समझा जा सकता है। अतः उसकी मानसिक शक्तियाँ का विकास होना आवश्यक है।

चूंकि कॉट मनुष्य के जीवन के लिए वस्तु जगत का ज्ञान आवश्यक मानते थे इसलिए इनकी दृष्टि से शिक्षा का एक उद्देश्य वस्तु जगत का जान भी होना चाहिए। काँट धर्म को आस्था और ईश्वर को विश्वास का विषय मानते थे और यह मानते थे कि धर्म मनुष्य को नैतिक जीवन की ओर अग्रसर करता है। अतः इनकी दृष्टि से शिक्षा का एक उद्देश्य धर्म के प्रति आस्था और ईश्वर के प्रति विश्वास उत्पन्न करना होना चाहिए। कॉट शाश्वत नैतिक नियमों में विश्वास करते थे। वे कर्तव्य को व्यक्ति से ऊपर मानते थे। इसलिए इनकी दृष्टि से शिक्षा का एक उद्देश्य मनुष्य नैतिक गुणों का विकास करना होना चाहिए।


पाठ्यक्रम (Curriculum): 


कॉट विश्वविद्यालय में प्राध्यापक थे। वे ज्ञान की कई शाखाओं के ज्ञाता थे और उन विषयों पर व्याख्यान देते थे। ईश्वर में विश्वास करते थे और धर्म में उनकी गहरी आस्था थी।

उनकी दृष्टि से किसी भी देश की शिक्षा की पाठ्यचर्या में भाषा, साहित्य, दर्शन, तर्कशास्त्र, गणित, विज्ञान एवं तकनीकी को स्थान देना चाहिए। धर्म को वे आस्था का विषय मानते थे इसलिए इसे विद्यालयी शिक्षा की पाठ्यचर्या में स्थान देने को आवश्यक नहीं समझते थे। उनकी दृष्टि से धर्म सीखने का विषय नहीं बल्कि आस्था का विषय है।


शिक्षण विधियां  (Method of Teaching):


कॉट ने सबसे अधिक बल ज्ञान के स्वरूप और उसको प्राप्त करने की विधियों पर ही दिया है। ज्ञान को कॉट ने दो भागों में विभाजित किया है व्यावहारिक (भौतिक) ज्ञान और आत्मिक (आध्यात्मिक) ज्ञान भौतिक ज्ञान प्राप्त करने के संबंध में कॉट का मत है

कि यह ज्ञान तो केवल इन्द्रियानुभव द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, न कि बुद्धि द्वारा परन्तु वास्तविक जान की प्राप्ति के लिए इन्द्रियानुभव को बुद्धि द्वारा तर्क की कसौटी पर कसा जाना आवश्यक है। इन्होंने इन्द्रियानुभव के लिए मस्तिष्क की चार शक्तियों का क्रियाशील होना आवश्यक माना है। ये चार शक्तियाँ हैं: संवेदनशीलता, बुद्धि, भावना और संकल्पशक्ति इससे शिक्षण विधि के विषय में निम्नलिखित अर्थ निकलते हैं.


1. सीखने के लिए मस्तिष्क एवं इन्द्रियों को क्रियाशील किया जाए।


2. इन्द्रियों द्वारा ज्ञान का प्रत्यक्षीकरण किया जाए।


3. इन्द्रियों दवारा प्राप्त ज्ञान को तर्क की कसौटी पर कसा जाए। 


4. तर्क के आधार पर प्राप्त परिणामों की सत्यता की जाँच की जाए।


अनुशासन (Discipline) :


कॉट शाश्वत नैतिक नियमों में विश्वास करते थे और इन शाश्वत नैतिक नियमों के पालन को ही अनुशासन मानते थे। उनका तर्क था कि ईश्वर में विश्वास और धर्म में आस्था रखने वाले व्यक्ति ही शाश्वत नैतिक नियमों का पालन कर सकते हैं। इसलिए वे धर्म के प्रति आस्था एवं ईश्वर में विश्वास को अनुशासन का आधार मानते थे। कॉट एक अध्ययन शील शिक्षक और चिंतनशील व्यक्ति थे जो सादा जीवन जीते थे। वे शिक्षकों को इसी रूप में देखना चाहते थे।


कॉट किसी भी प्रकार की दासता को अनैतिक मानते थे। वे लोकतंत्र के समर्थक थे। उनकी दृष्टि से विदयार्थियों को हर प्रकार की स्वतंत्रता जैसे-अध्ययन क्षेत्र का चयन, इन्द्रियानुभव, तर्क और निर्णय करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, तभी वे वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।